!! राधा बाग में – “श्रीहित चौरासी” !!
( रस का आसव – “रहसि रहसि मोहन पिय कैं सँग” )
गतांक से आगे –
ये रसासव है । रस का आसव । इसको जो पी लेता है …वह मत्त , उन्मत्त होकर बस …अपने ‘पी’ का नाम लेकर निर्द्वंद्व घूमता रहता है ।
उस को किसी से कोई मतलब नही होता , क्यों होगा ? श्रीनिभृतनिकुंजमन्दिराधीश्वरी श्रीराधा जिसकी महारानी हों , और महाराज , परम पुरुष शिखंडीमौलि श्रीकृष्णचन्द्र जू हों , परिकर ललिता रंगदेवि सुदेवी आदि हों …बृज , राज्य हो , और श्रीवृन्दावन रजधानी हो । पीना खाना क्या है ? अजी ! रसासव । शुद्ध रस ही रस का आसव …पीने को मिलता हो जहाँ ….
उस आनन्द की कल्पना से ही जीव कृतकृत्य हो जाता है …फिर उनकी बात ! जो इस रस में रह रहे हैं , इस रस को जी रहे हैं …इस रस के आसव को पी रहे हैं । ओह !
श्रीहित हरिवंश जू लिखते हैं – “रसासव गटकति”। मुँह से ? ना , नयनों से ।
“लोचन चषक रसासव गटकति”
रहसि रहसि मोहन पिय कैं सँग , री लडैती अति रस लटकति ।
सरस सुधंग अंग में नागरि , थेई थेई कहति अवनि पद पटकति ।।
कोक कला कुल जानि शिरोमणि , अभिनय कुटिल भुकुटियन मटकति ।
विवस भये प्रीतम अलि लंपट , निरखि करत नासा पुट चटकति ।।
गुन गन रसिकराइ चूड़ामणि , रिझवत पदिक हार पट झटकति ।
श्रीहित हरिवंश निकट दासीजन , लोचन चषक रसासव गटकति । 79 !
रहसि रहसि मोहन पिय कैं सँग…………..
क्या सुन्दर गान किया था गौरांगी ने …वीणा के झंकार में , उसकी वाणी में भी आज मधुरता के साथ मादकता भी थी , क्यों न हो….यहाँ सब रसासव पीकर मत्त रहने वाले लोग ही आते हैं ।
मैंने ये बात जब पागलबाबा से कही तो बाबा खूब हंसे ….बोले ….संसार के आसव ( शराब ) को पीकर तो लोग नाली में गिरते हैं …किन्तु इस रस-आसव को पीकर तो तुम निकुँज के किसी लता वृक्ष के नीचे ही गिरोगे …जहां स्वयं प्रियाप्रियतम आकर तुम्हें उठायेंगे ।
बाबा के मुख से ये बात सुनकर मुझे तो रोमांच हो गया था ।
कुछ देर ऐसे ही मौन में रहे …..फिर बाबा ने ध्यान करवाया ।
!! ध्यान !!
रास मण्डल बड़ा ही सुन्दर है …वो रास मण्डल जिसमें श्रीजी नृत्य कर रही हैं ।
शीतल हवा भी चल रही है …हवा शीतल ही नही है …सुगन्धित भी है ।
लताएँ भी झूम रही हैं ….लताओं में पुष्प खिले हैं उनमें भौंरों का झुण्ड भी है ।
पर रास मण्डल में दिव्य नृत्य हो रहा है ….नृत्य श्रीजी कर रही हैं ।
रास मण्डल के बाहर खड़े श्याम सुन्दर नृत्य देख रहे हैं …वो देह भान भी भूल गए हैं …..अपलक निहार रहे हैं अपनी किशोरी को ।
ये देख कर मुग्ध हो गयीं हैं श्रीराधिका जू …वो नीचे उतरीं और अपने प्यारे श्याम का हाथ पकड़ कर ऊपर रास मण्डल में ले आईं और कहने लगीं …प्यारे ! आप भी नृत्य दिखाओ । किन्तु कहाँ ! श्याम सुन्दर जड़वत हो गए हैं वो अपनी प्यारी के मुख अरविंद पर त्राटक साध लिए हैं ।
अब न उनके पलक गिर रहे हैं ….न कोई नयनों में हलचल हो रही है ।
पास में गयीं प्रिया जी ,और पास , और अपने मुख से श्याम सुन्दर के नयनों में फूंक मारने लगीं….एक दो फूंक से ही श्याम सुन्दर की त्राटक खुल गयी थी । हाँ , एकाएक नयनों को मींचते हुए श्याम सुन्दर बोले थे ।
अब चलो ना प्यारे ! देखो ये रास मण्डल भी हमारी प्रतीक्षा कर रहा है । आओ …ये कहते हुए प्रिया जी ने श्याम सुन्दर को रास मण्डल में खींच लिया था ।
बस फिर क्या था ….दोनों रसिक रसिकनी थिरक उठे थे । अब तो रास छटा निखर कर आई थी वो अनुपम थी ।
इसी अनुपम छटा का वर्णन करके हित सखी अपनी सखियों को बता रही है ।
अरी सखी ! देखो तो मेरी लाड़ली अपने प्रीतम मोहन के साथ कैसे आनन्द में भरकर धीरे धीरे लटक लटक कर रही हैं । सच कहूँ ! नृत्य की बारीकियों को ये ही समझती हैं …तभी तो हमारे श्याम सुन्दर भी इन्हीं से नृत्य सीखते हैं । हित सखी प्रिया जी के पक्ष से बोल रही है ।
ये क्या कह रही हो हित सखी ! क्या श्याम सुन्दर को प्रिया जी नृत्य सिखाती हैं ?
और क्या ? हित सखी स्पष्ट कहती है ….मेरी बात पर विश्वास न हो तो देखो …अभी सामने देखो ! प्रिया जी कितनी सुन्दरता से ताल बद्ध अपने श्रीचरण पटक रही हैं …बोल भी ..थेई थेई कहकर …किन्तु श्याम सुन्दर को प्रिया जी की ओर देखना पड़ रहा है …प्रिया जी का ही अनुसरण कर रहे हैं वो नृत्य में । हित सखी दिखाती है ।
कुछ देर तक सब इस नृत्य का आनन्द लेते हैं ….देख रहे हैं …देह भान भूल रहे हैं ….तभी हित सखी बोल उठती है …काम कला में भी निपुण हैं हमारी स्वामिनी…देखो , कैसे नयनों को नचा रही हैं …कामदेव भी देखे तो मूर्छित हो जाये …अरे कामदेव की यहाँ क्या चलेगी …श्याम सुन्दर रस लोभी बनकर प्रिया जी के पीछे हो लिए हैं …वो यन्त्रवत लग रहे हैं ..यन्त्री श्रीप्रिया जी हैं ।
देखो तो ! हित सखी फिर कहती है – आहा ! श्याम सुन्दर जब नृत्य करते हुए प्रिया जी के अत्यन्त निकट आजाते हैं तब उनको प्रिया जी के केश लटों की सुगन्ध मिलती है ..वो सुगन्ध श्याम सुन्दर में मूर्च्छा ला रही है । श्यामसुन्दर गिर ही पड़ते …किन्तु सम्भाल लिया है प्रिया जी ने , श्याम सुन्दर के नासिका को छू कर चुटकी बजाती हैं तो श्याम सुन्दर सावधान हो जाते हैं ।
अरी सखियों ! ये रस है , रस ही नही , रस का आसव है । हित सखी अपना हाथ छाती में रखकर आह भरते हुए कहती है ।
अब तो श्याम सुन्दर भी नृत्य अच्छा कर रहे हैं ! एक सखी ने कहा ।
हित सखी देखती है ….हाँ , अब अच्छा कर रहे हैं ! प्रिया जी ने चुटकी बजा दी और चमत्कार हो गया ….लाल जू को नृत्य करना आगया । हित सखी बहुत हंसती है ।
कुछ देर बाद हित ये भी कहती है …कि …लाल जू अब पूरी तरह अपनी प्रिया को रिझाने में लग गए हैं । वो लाड़ली को छू भी रहे हैं …नीलांबर को छू रहे हैं …हार को छू रहे हैं …तब हमारी लाड़ली भी उन्हें झटक रही हैं । ये कहते हुए हित सखी की वाणी अवरुद्ध हो गयी वो आगे कुछ बोल नही पाई ….क्यों की ये झाँकी ही ऐसी थी । हित सखी ही क्यों ….पूरा श्रीवन प्रेममय हो गया था । बहुत देर के बाद हित बोली – सखियों ! हमारे ऊपर कितनी बड़ी कृपा है लाड़ली की…कि – नित्य इस रस आसव का पान करती रहती हैं । मुख से तो हमने आसव पीया नही ? एक चंचल सखी पूछती है …”नयनों से”…सखियों ! हम उस रस आसव को नयनों से पीती हैं ।
नयनों को मटकाते बोली हित सखी ।
अब रास मण्डल से नीचे उतर गए हैं युगल , और गलवैयाँ दिये कुँज की ओर चल पड़े हैं ।
गौरांगी इसी पद का गायन करती है ….बाबा के नेत्र अभी भी बन्द हैं ।
“रहसि रहसि मोहन पिय कैं सँग”
शेष चर्चा अब कल –
