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August 30, 2025 6:54 pm

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કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

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!! परम वियोगिनी – श्रीविष्णुप्रिया !!-चतुश्र्चत्वारिंशत् अध्याय : Niru Ashra

!! परम वियोगिनी – श्रीविष्णुप्रिया !!-चतुश्र्चत्वारिंशत् अध्याय : Niru Ashra

!! परम वियोगिनी – श्रीविष्णुप्रिया !!

( चतुश्र्चत्वारिंशत् अध्याय : )

गतांक से आगे –

हे सजनी ! बोल न , क्या प्रियतम आवेंगे ? डर लगता है इस विरह सागर को देखकर , कैसे पार करूँगी ! मुझे विश्वास नही होता दिन से मास ,मास से बरस बीत गए ….अब तो इस शरीर ने भी आशा छोड़ दी है …..सखी ! बता न ! यदि हिमकर की किरणें नलिनी को जला देंगी तो मधुमास क्या करेगा ? यदि सूर्य का ताप ही अंकुर को जला देगा तो जलधर मेघ क्या करेगें ? यदि ये नवयौवन ही विरह में बीतेगा तो पश्चात् प्रीतम आकर क्या करेगें ? विष्णुप्रिया का ये क्रन्दन सुन कान्चना बोली – हे सखी ! निराश मत हो ….वे आरहे हैं …वे आयेंगे ।


माँ ! कान्चना कह रही थी कि तुमने स्वामी को जाने दिया …..कहाँ जाने दिया ? कहाँ गये वे ?

आज आखिर पूछ ही लिया विष्णुप्रिया ने अपनी सासु माँ से ।

हाँ , हाँ , मैं अपराधिन हूँ ….मैंने ही अपने पुत्र को जाने दिया …..किन्तु मैं करती क्या ?

माँ ! कहाँ जाने की आज्ञा दी स्वामी को आपने ? शान्त भाव से पूछ रही है ।

“नीलान्चल धाम” ……शचि देवि के मुख से ये सुनकर विष्णुप्रिया हिलकियों से रो उठी ….फिर पूर्व स्मृतियों में खो गयी ।

मुझे दो ही धाम प्रिय लगते हैं ….हे प्रिये ! एक वृन्दावन धाम और दूसरा नीलान्चल धाम ।

मैं तुम को वहाँ ले चलूँगा …..मुझे वहाँ की छवि अत्यंत करुणा से भरी लगती है …भगवान श्रीजगन्नाथ । तुम जाओगी ? नाथ ! आप के साथ मैं कहीं भी जा सकती हूँ …आप हों तो मुझे और क्या चाहिये । बोलती बहुत मीठा हो …..किन्तु आप से कम मीठा । अच्छा ! हम तो मिश्री खाते हैं …..तो हमें भी प्रसाद मिले । तभी निमाई ने अपने बाहुपाश में भर लिया था ।

प्रिया ! बहु ! शचिदेवि ने झकझोरा ये तो खो गयी थी पूर्व स्मृतियों में ।

हाँ , हाँ माँ !

बेटी !
अब हमारे पास उसकी स्मृतियाँ मात्र हैं …..नेत्रों से अश्रु बह चले शचि देवि के ।

माँ ! वो नही आयेंगे अब ? इस का क्या उत्तर दें शचि । वो बस आह भरती हैं …और अपनी बहु को समझाती और सम्भालती हैं ।

बेटी ! निमाई ने मुझ से एक बात कही थी …उसने कहा था मुझे अगर प्रसन्नता देनी है तो कृष्ण नाम लो ….कृष्ण का भजन करो …कृष्ण का गान करो …कृष्ण लीला सुनो ….उन्हीं के लिए सारे कर्म करो …..जो ये करेगा वो मुझे प्रिय होगा । ये निमाई ने कहा था । शचि देवि ने विष्णुप्रिया को ये बात भी बताई ।

कुछ देर मौन रहने के बाद विष्णुप्रिया हंसी ….नही मैं कृष्ण नाम नही लुंगी …..मेरे तो गौर हैं …वे ही मेरे कृष्ण हैं और वही मेरे राम हैं ….क्या अपना नाम भी मुझ से छीन लेंगे वे ? मैं “गौर हरि”गाऊँगी …मैं ‘गौर’ का भजन करूँगी …मैं ‘गौर’ का गान करूँगी …और ‘गौर लीला’ ही सुनूँगी ….वे रोक सकें तो रोक लें । फिर उन्माद चढ़ गया विष्णुप्रिया को ।

हवा चलती है और द्वार हिलता है तो प्रिया दौड़ पड़ती है – मेरे स्वामी आगये । वे आयेंगे …वे आवेंगे ….वे करुणा निधान हैं …जन जन पर अपनी करुणा बिखेरने वाले क्या मुझ दासी को वंचित रखेंगे ? वे आवेंगे । बोलो ना वे आवेंगे ना ! माँ ! तुम बोलो ….तुम उन्हें जानती हो तुमने उन्हें जन्म दिया है …बताओ वे आवेंगे ना ?

अपनी बहु को इस स्थिति में देखकर शचि माता का हृदय फट जाता ….वो रोती हुयी वहाँ से चली जातीं और बाहर जाकर अपना सिर दीवार पर पटकतीं । कान्चना उस समय विष्णुप्रिया का साथ देती …..उसे सम्भालती । उसे समझाती । “हाँ हाँ वो आयेंगे” कान्चना ने एक दिन आक्रामक होकर कहा । विष्णुप्रिया के आनन्द का ठिकाना नही …कान्चना के मुख से ये सुनते ही वो उछल पड़ी ….सच ! कान्चना! वे आवेंगे ? हाँ , सखी ! वे आवेंगे । कब ? भोलेपन से विष्णुप्रिया फिर पूछती ……कान्चना प्यार से कहती ….जल्दी ही । और पर्यंक में सुला देती ।

उन्माद इतना था कि प्रिया को पता ही नही कि वो धूल में सो रही है ….या पर्यंक में ।

रात मूर्च्छा में गुजरी प्रिया की ……सुबह का समय हुआ तब उसकी मूर्च्छा टूटी थी ।

जब प्रिया ने देखा वो रेशम के गद्दे में सो रही है …..वो ऐसे उछली जैसे कोई विषधर सर्प को देखकर उछलकर भागता है । उस समय घर में कोई नही था …कान्चना प्रिया को सोते देखकर अपने घर स्नान आदि के लिए चली गयी थी , शचिदेवि गंगा स्नान को गयीं थीं लेकिन वहीं निमाई की याद आई तो वो वहीं बैठ गयीं ….घर उनको भी काटने को दौड़ता है ।

प्रिया उठी ….उठकर उसने बड़े ध्यान से अपने बिस्तर को देखा ….रेशम के गद्दे हैं …कोमल गद्दे ….वो देखती रही ….फिर हंसने लगी ….वाह ! तेरा स्वामी वन वन में सन्यासी भेष में भटक रहा है और तू इस राजसी पर्यंक में सो रही है ! वाह ! कौपीन और कंथा धारण करके वो धूल में शयन कर रहे हैं और तू आभूषण साड़ी पहन कर यहाँ रजोगुण को भोग रही है । हाँ , तू भोग चाहती है …पर तेरे स्वामी विशुद्ध प्रेम चाहते हैं , प्रेम त्याग माँगता है …तुझ में त्याग नही है …तुझ में भोग की कामना है …इसलिए तेरे महान स्वामी ने तुझे त्याग दिया …तू उनके चरण धूल भी नही है ….तू तो सुख वैभव में जीना चाहती है …पर तेरा स्वामी महान वैराग्यवान है …देख ! तुझे लाज नही आती …अभी भी सुवर्ण के आभूषण लगाये घूम रही है …ये कहते हुए विष्णुप्रिया ने अपने आभूषण तोड़ कर फेंक दिये …..सोने के कंकण …उतार कर फेंक दिये …और ऐसे फेंक रही है ये विष्णुप्रिया जैसे ये नाग हों जो डस लेंगे ।

ये रेशमी साड़ी ? उतार दी विष्णुप्रिया ने वो साड़ी भी ….भस्म लिया और पूरे शरीर में लगा लिया …..गैरिक वस्त्र रंग लिया ….सिर में उन सुन्दर केशों को जटा बना ली …..और शान्त होकर बैठ गयी ……शान्त , परम शान्त ।

शचि देवि गंगा घाट से घर आईं …..तो वो चिल्ला उठीं …कान्चना ने आवाज सुनी माँ की तो वो दौड़ी ….और जो सामने का दृष्य था ….वो अच्छे अच्छे सुधियों को भी विचलित करने वाला था ।

सम्पूर्ण शरीर में भस्म लगाये गैरिक वस्त्र धारण करके …..वो गौरांगी ….नेत्र मुंद कर ध्यान कर रही है …..इस समय उसका मन तनिक भी विचलित नही है ….उसके नेत्र से अश्रु भी नही बह रहे ….वो शान्त है …वो पूरी तरह से शान्त है ।

रोती हुयी शचि आगे बढ़कर धड़ाम से गिर गयीं …..विष्णुप्रिया ने नेत्र खोले ….अपनी माता को सम्भाला …..और फिर शान्त …परम शान्त ।

धरती में सोना …..जब ज़्यादा ही जिद्द करे माँ तो एक या दो कौर भोजन का मुख में डाल लेना ….बाकी समय “गौर हरि” के नाम का जाप …..ये चलता रहा ….दिन बीते , मास बीते , वर्ष बीतने लगे …पर विष्णुप्रिया आस लगाये बैठी है …..कि वे आवेंगे ।

ओह , आज पाँच वर्ष पूरे हो गये निमाई के गृहत्याग किए । अब विष्णुप्रिया की आयु है बीस वर्ष की …नव यौवन खिला है ….रूप राशि अनुपम है ….किन्तु प्रियतम सन्यासी हैं …..वो जा चुके हैं इसे त्याग कर …..ये प्रतीक्षारत है ….पाँच वर्षों से इसकी यही पुकार है कि ….एक बार तो दर्शन दे जाओ ।

तभी –

सखी ! सखी ! सखी ! दौड़ते हुये आयी है ये कान्चना अपनी विष्णुप्रिया के पास ।

कान्चना! क्या है ? तू इतनी उद्विग्न क्यों है ? शान्त भाव से वो पूछती है ।

नवद्वीप में चर्चा है कि ….गौरांग देव नवद्वीप आरहे हैं …क्या ? विष्णुप्रिया के नेत्रों से आनन्द के झरझर अश्रु बहने लगे ….क्या ये सही सूचना है ? हाँ , मौसा जी चन्द्रशेखर आचार्य जगन्नाथ पुरी से आए हैं वही बता रहे थे कि उनसे गौरांग ने कहा ….एक बार अपनी जन्म भूमि जाने की इच्छा है ।

विष्णुप्रिया रोने लगी …..मुझे भी एक बार दर्शन की इच्छा है । कान्चना! वे आयेंगे ना ? फिर उन्माद चढ़ गया प्रिया के …..हाँ , हाँ , अब तो वे आयेंगे ही । ये कहते हुए अपनी सखी को कान्चना ने हृदय से लगा लिया था ।

शेष कल –

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