!! एक अद्भुत काव्य – “प्रेम पत्तनम्” !!-( प्रेम नगर 10 – “नगर का परकोटा” ) : Niru Ashra

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!! एक अद्भुत काव्य – “प्रेम पत्तनम्” !!

( प्रेम नगर 10 – “नगर का परकोटा” )

गतांक से आगे –

यत्र निगमितहासपुराणसंहितादिसुवर्णखचितोत्त्तमागमबहुवर्णकर्कशतर्करत्नसकलसंदोहयत्नरचितो ललितोन्नतो विविधतत्सिद्धांतानलयंत्रावलिवलिलोदुर्जनाजितो विद्वत्जनसभाजितो विराजते सर्वतो नगरं सुपर्वपर्वतोपमाकार : प्राकार : ।।

अर्थ – प्रेम नगर में परकोटा बनाया गया …जो सुरक्षा की दृष्टि से मुख्य था …वेद , इतिहास , पुराण , संहिता आदि सुवर्ण उत्तम शास्त्र के अक्षर , कठोर तर्क रूपी रत्न आदि द्वारा निर्मित ..उन उन सिद्धान्तों के यन्त्र …अर्थात् तोप आदि युद्ध के विशेष यन्त्र समूह से युक्त ….विशाल कोट , जो सुमेरु पर्वत के समान विशाल था …उस कोट ( परकोटा ) का नगर में निर्माण किया गया ।

ओह ! प्रेम नगर की सुरक्षा में वेद , शास्त्र , पुराण आदि को रखा गया है । पहले नगर बनाये जाते थे तो उसकी सुरक्षा का ध्यान रखा जाता था …परकोटा बनाया जाता था ..जिसकी दीवार बहुत ऊँची होती थी , उसमें यन्त्र भी होते थे …जो अग्नि छोड़ते थे …ये सब नगर की सुरक्षा के लिए होता था ।

यहाँ बड़ा अच्छा रूपक प्रस्तुत किया गया है……कि “प्रेम नगर की सुरक्षा के लिए परकोटा बनाया गया”

उस परकोटा में वेद ,शास्त्र, पुराण आदि की ही ऊँची दीवार बनाई गयी ..सुन्दर भी दिखाई देना चाहिये …इसलिए इतिहास संहिता आदि को सुवर्ण के रूप में कहीं कहीं सजाया गया । तर्क , कर्कश तर्कों को …अग्नि यन्त्र ( तोप ) के रूप में रखा गया ।

विलक्षण है ये बात …वेद आदि का प्रवेश नही है इस नगर में …ये बताया गया है । नगर के भीतर तो प्रेम का ही आधिपत्य है …किन्तु इस अति कोमल अति सरस “प्रेम” की सुरक्षा तो आवश्यक है ना ! इसलिये सुरक्षा के लिए …वेद शास्त्र उनके कठोर सिद्धांत , उनके कठोर तर्कों को यन्त्र बनाया गया है …ताकि कोई इस नगर पर आक्रमण न कर सके । अद्भुत है ये बात ।


महाप्रभु श्रीबल्लभ जू के पास कोई सेठ जी गये , उन्होंने जाकर प्रश्न किया …क्या कर्मकाण्ड आवश्यक हैं ? सोचा नही था ..बाल कृष्ण के अनन्य निष्ठ महाप्रभु श्रीबल्लभ ऐसा भी उत्तर देंगे । उन्होंने उत्तर दिया …हाँ । आवश्यक है । फिर भक्ति ? सेठ जी का दूसरा प्रश्न था । महाप्रभु श्रीवल्लभ ने कहा …भक्ति अत्यन्त कोमल हैं ….उनकी सुरक्षा के लिये , कर्मकाण्ड आवश्यक है ।

कैसे ? सेठ जी का फिर प्रश्न ।

महाप्रभु ने उत्तर दिया …..जैसे काँटें फूल की सुरक्षा करते हैं ..ऐसे ही कर्मकाण्ड भक्ति की सुरक्षा करते हैं …..जैसे ..अगर वेद विरुद्ध आचरण तुम्हारा होगा …तो भक्ति तुम्हारी मनमानी होगी …..मनमानी होगी तो भक्ति स्वच्छंद हो जाएगी ….स्वच्छंद हो जाएगी ….तो जिसकी भक्ति हो रही है ….वो हट जाएगा और तुम्हारा अहंकार विराज जाएगा । इसलिये बाहरी आचरण तो तब तक आवश्यक है जब तक तुम देह के बंधन से बंधे हो ।


यहाँ लिखा है ….प्रेम नगर की सुरक्षा में जिस परकोटा का निर्माण हुआ उसमें वेद , पुराण , शास्त्र इन सबकी ऊँची दीवार खड़ी की गयी है …और कठोर तर्क आदि के यन्त्र लगाये गए हैं ..जिसे तोप कह सकते हैं , जिससे बाहरी शत्रु प्रेम नगर में प्रवेश न कर सके ।

बाहर ये सब हैं …वेद आदि । ठीक है …..

इसका अर्थ ये भी है ….कि जब तक आपका प्रवेश “प्रेम नगर” में नही है …आप इन सबका अभ्यास कीजिए ….वेद आदि पढ़िए ..शास्त्र का स्वाध्याय कीजिये …समय पर उठिये …समय पर स्नान कीजिये …मन्त्र जाप आदि खूब जपिए ….अपने सिद्धांत पर चलिये …और ये सब आपको इसलिए करना है कि कल आपको अपने प्रेम की सुरक्षा तो चाहिए ना ! मनमानी होगी …तो फिर वो और नुक़सान देय है ….हानि होगी ….हृदय में विराजे “प्रेम” का ही नुक़सान होगा ।

मुझ से एक “विप्र” युवक ने पूछा …मुझे निकुँज की उपासना में जाना है क्या करूँ ?

मेरा सीधा उत्तर था ….पहले शिखा ( चोटी ) रखो ….वो चौंक गया …निकुँज की उपासना में इसकी क्या ज़रूरत ? मैंने कहा ….उस रस तक पहुँचने के लिए तुम्हें अभी बहुत कुछ करना होगा ……मैं ये देख रहा हूँ कि तुम इतनी सी बात मान पाते हो या नही ? दो महीने में वो फिर आया ….और शिखा रखकर आया था …मुझ से बोला अब ? मैंने कहा …गायत्री मन्त्र जाप करते हो ? उसने कहा – नही …मैंने कहा …पहले गायत्री जाप करो …वो गया …और गायत्री जाप करने लगा …..तीसरी बार आया तो मैंने उससे कहा ….अब सन्ध्या बंधन करो ….सूर्य को जल दो । वो पूछना चाह रहा था …इन सबका निकुँज उपासना से क्या सम्बन्ध ….पर वो अब समझ रहा था ….उसने त्रिकाल सन्ध्या भी आरम्भ कर दिया ….इसके बाद जब वो आया तो मैंने उसे युगलमन्त्र के जाप में लगाया ….सवा लाख नित्य ….फिर गोपाल मन्त्र दिया और गिरिराज जी में इसी अधिकमास में उसने गोपाल मन्त्र का अनुष्ठान पूर्ण किया ….अब इन दिनों वो गिरिराज जी की तलहटी में बैठकर महावाणी जी का पाठ करता है ….और रसिकों की उत्तम स्थिति उसने पा ली है । मुझ से उसने पूछा था …अब क्या करूँ ? मैंने उससे कहा …अब सब छोड़ दो…गायत्री जाप , सन्ध्या आदि …अब बस युगलनाम जाप और महावाणी जी का पाठ । उसने मुझ से पूछा था …आपने ये “रस” पहले क्यों नही बताया ।

मैंने कहा …इस “रस” की सुरक्षा के लिये , पूर्व में ये सब आवश्यक था ।

अब तुम आनन्द से “प्रेम नगर” में विचरो ….क्यों की वहाँ वेद गायत्री शास्त्र तर्क आदि का प्रवेश नही है …..ये तो हमारी भक्ति प्रेम की सुरक्षा के लिए हैं ।

हे रसिकों ! ये बहुत गम्भीर बात है ….गम्भीर से भी गम्भीर ….प्रेम के नाम पर पाखण्ड उचित नही है ….प्रेम के नाम पर मर्यादा का त्याग उचित नही है …हाँ उस प्रेम नगर में पहुँचने के बाद ये सब स्वयं छूट जायेंगे , अपने आप । आपको छोड़ना नही पड़ेगा ….किन्तु पूर्व में ही शास्त्र मर्यादा का त्याग उचित नही है …..आपके हृदय में बसा प्रेम नगर उजड़ जाएगा ….बाहरी शत्रु आक्रमण कर देंगे ….सबसे बड़ा शत्रु तो सांसारिक अहंकार ही है ना ! देहाभिमान ही है ना ! किन्तु वेद शास्त्र आदि का पहले परकोटा लगा लो , मर्यादा सिद्धांत आदि की ऊँची दीवार खींच दो ….फिर प्रेम नगर में जाओ ….उसे सजाओ …उसे संवारो ….तब वेद छूटेंगे ही ….शास्त्र सब बाहर ही रह जायेंगे ….सिद्धांत बस प्रेम का अपना ही रहेगा …..किन्तु पहले ये वैदिक सिद्धांत का परकोटा आवश्यक है । नही तो कभी भी प्रेम नगर में आक्रमण हो जाएगा । और आक्रमण होगा तुम्हारे प्रवल शत्रु “सांसारिक अहंकार” का ।

अब आगे की चर्चा कल –

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