श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! श्रीकृष्ण के मथुरा आगमन से भयभीत कंस !!-भाग 2 : Niru Ashra

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श्रीकृष्णचरितामृतम्

!! श्रीकृष्ण के मथुरा आगमन से भयभीत कंस !!

भाग 2

यमुना के किनारे ये उद्यान हमें अच्छा लग रहा है………हम सब यहीं रहेंगे……क्यों बाबा ? अपनें नन्दबाबा कि और देखकर पूछते हैं ।

पर यहाँ कक्ष नही है …………..बस उद्यान है ………..आप लोग कैसे रहेंगे यहाँ ? अक्रूर के माथे पर चिन्ता साफ दीख रही थी ।

काका ! हम वनवासी लोग हैं ………हम वन में रहना ही पसन्द करते हैं ……हम सब यहाँ प्रसन्न रहेंगे.।……..सन्ध्या से कुछ घडी आगे ही समय गया था……..”अक्रूर ! मेरा लाला ठीक कह रहा है …..हम सबको यहाँ स्वतन्त्रता का अनुभव भी होगा……..लाला ! सूर्यास्त हो रहा है …….मैं यमुना स्नान करके ….सन्ध्या करके आता हूँ ………अक्रूर ! तुम निश्चिन्त होकर अपनें घर में जाओ ………..हम यहाँ प्रसन्न हैं ……यमुना जाते जाते नन्दबाबा अक्रूर को कहते चले गए थे ।

अक्रूर अपनें भवन कि ओर चले गए ।

भूख लगी है ……मोकूँ ………! मनसुख कन्हैया से कहता है ।

“ये आपके लिये महाराज कंस नें भेजा है” ……………एकाएक शताधिक सैनिकों नें उस उद्यान को घेर लिया था ………..।

ये क्या है ? श्रीकृष्ण पूछते हैं ।

फल, मिष्ठान्न , पकवान सुन्दर सुन्दर व्यंजन…….”.ये सब आपके लिये महाराज कंस नें भेजा है……आप रख लें ” कंस के सैनिकों ने कहा ।

ठीक है …..आप इसे रख दें और जाएँ ……….क्यों भैया बलदाऊ !

दाऊ जी यमुना स्नान करके आगये थे ।

हाँ और क्या ! और तुम सब सैनिक भी चले जाओ हमें आवश्यकता नही है तुम लोगों की ……बलभद्र जी नें कहा ।

“आपकी सुरक्षा के लिये हैं ये सब”………सिर झुकाकर वो प्रमुख सैनिक बोला था ।

हमें क्या होगा ? और हम बृजवासी हैं ………अपनी सुरक्षा स्वयं करना जानते हैं क्यों श्रीदामा ! ……..श्रीकृष्ण हँसते हुये श्रीदामा से बोले ।

पर सैनिक मानें नही ……..वो सब चारों ओर से उद्यान को घेरकर खड़े ही रहे ।

नन्दबाबा आगये सन्ध्या करके ………….सैनिकों को चारों ओर सुरक्षा में देखा तो गदगद् हो गए थे ये भोले बृजराज जी ।

अपनें वय के सखाओं से एकान्त में कह रहे थे ……..मैं अकेला आता था मथुरा तो कोई पूछता भी नही था …….पर आज मेरे साथ मेरा लाला आया है इसलिये कंस भी कितना आदर कर रहा है हमारा. …… …नन्द बाबा ये कहते हुये गदगद् हैं ।

बाबा ! भूख लगी है ………….श्रीकृष्ण ही बोले ….तो सब सखा बोलनें लगे …..भूख लगी है ………हाँ , हाँ माखन रोटी तेरी मैया नें रख दिया है …….तुम सबके लिये है ………..लाओ भोजन ….हम सब करेंगे ।

तात ! उसी मथुरा के उद्यान में बैठकर सबनें रात्रि का भोजन किया और रात्रि विश्राम भी वहीं किया था सबनें ।

उद्धव नें विदुर जी को बताया ।


तुझे अब हम तैल से स्नान कराएंगे …………..

नग्न , पूर्ण नग्न हो गया है कंस ………..उसको तैल कि धारा देकर उसका स्नान हो रहा है …………..

हाँ , मैं इसमें बैठूँगा ……….सामनें एक गधा जा रहा है कंस उसको पकड़ लेता है और उसमें बैठ जाता है …………

तभी पीछे से तलवार लिये दो बालक उसे काटनें के लिये दौड़ रहे हैं ………वो चीखता है …………वो चिल्लाता है …………….

कौन हो तुम ? क्यों मारना चाहते हो ?

हम देवकी के पुत्र हैं……..वसुदेव के सुत, मामा ! वो बालक इतना ही बोलते हैं ….और तलवार से ……….

तभी कंस का ये स्वप्न टूट जाता है ।

फागुन का महीना है… …….कंस जब उठा स्वप्न से ……तब स्वेद में ही वो नहाया हुआ था ।

वो काँप रहा है ………उसके कुछ समझ में नही आरहा कि क्या करें ? कैसे मरेगा वो देवकी का पुत्र …….वो आगया है यहीं मथुरा में ……..कंस भयभीत है ……वो भय के कारण तेजहीन भी हो गया है ।

*शेष चरित्र कल –

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