!! “श्रीराधाचरितामृतम्” 100 !!
श्रीराधारानी का यह विलक्षण रूप….
भाग 3
भोजन करना छोड़ दिया था गोप , गोपी वन्य जीवों नें भी……..
उद्धव ! तुम नही समझोगे विरह के कष्ट को…….प्राण चले जाएँ ……वह ठीक है …..पर प्रियतम न जाएं…..ललिता सखी नें कहा ।
दस दिन हो गए …………बस रो रहे हैं …….गोपियाँ बेसुध हैं …….गोप बालक मथुरा की सीमा में पागलों को तरह खड़े देखते रहते ……..गौओं नें भी घास चरना छोड़ दिया था………
ऐसी स्थिति वृन्दावन की हो गयी थी उद्धव ! उस समय हमारी स्वामिनी श्रीराधा नें इस वृन्दावन को सम्भाला ………..
हम अष्ट सखियाँ नित्य श्रीजी की सेवा में लगी रहती हैं ……….
उस दिन हमनें देखा …………श्रीराधा रानी अपनें आँसुओं को पोंछ कर उठ खड़ी हुई थीं……..अद्भुत तेज़ से चमक रही थीं हमारी लाडिली ।
हम सब उनके पीछे चलती गयीं ……………वह वृन्दावन में जाकर सबको सम्बोधित करनें लगीं थीं …………….
एक कदम्ब है …………..उसी कदम्ब के नीचे खड़ी हो गयीं श्रीराधारानी ….और उनकी अद्भुत वाणी –
क्षणों में ही सब ग्वाल गोपी गौएँ पक्षी सब इकट्ठे हो गए थे ।
उद्धव ! उस दिन अद्भुत बोलीं थीं हमारी स्वामिनी ……….
दिव्य था उद्धव ! कर्मयोग पर श्रीराधा नें सहज सन्देश दिया था ।
ललिता सखी बोलीं ।
“मैं राधा”
बरसानें के अधिपति श्रीबृषभान गोप की पुत्री ।
मैनें प्रेम किया श्याम सुन्दर से……वो चले गए अब ………पता नही आयेंगें या नही……..हम मिलेंगें या नही …..कुछ पता नही है ।
तो क्या इसका मतलब ये है कि….हम इस जीवन को ही समाप्त कर दें ?
मैं राधा अगर चाहती तो इस देह को त्याग कर………..अपनें दुःख कष्ट को कम कर सकती थी …….या मैं इस संसार को त्याग कर जंगल में जाकर …जोगन बन सकती थी ………पर नही ………..प्रेम हमारी कमजोरी नही है ………प्रेम हमारी शक्ति है …….ताकत है ।
हे वृन्दावन वासियों ! हीनता का त्याग करो ………प्रेम करना कमजोर व्यक्ति का काम नही है …..इसके लिये बहुत हिम्मत चाहिये ……फिर क्यों आप लोग इस तरह हीनता को अपनें जीवन में स्थान दे रहे हैं !
बोलते बोलते लाल मुख मण्डल हो गया था श्रीराधा का ।
ऐसी हीनता न मुझे प्रिय है …..न हमारे प्रियतम श्याम सुन्दर को ।
उठो ! कर्म करो… …..कर्म का त्याग उचित नही है ………..
श्रीराधारानी नें स्पष्ट कहा था ।
इस तरह अन्न जल का परित्याग करना ……….हमारे प्रियतम को प्रिय नही है …….कर्म का त्याग “होना” अलग बात है …..पर कर्म का त्याग “करना” ……ये पाप है ……..अपराध है ।
हे बृजवासियों ! कैसा प्रेम है तुम्हारा ? क्या प्रियतम की प्रियता में अपनी प्रियता को मिला देना ही प्रेम नही है ?
अगर है …….तो आज से हम सब अपनें घरों का ध्यान रखेंगें …….अपनें बालकों का सम्भाल करेंगें ……….भोजन इत्यादि इच्छा न होनें के बाद भी ग्रहण करेंगें ………गौ चारण के लिए जायेंगें ।
तभी हमारे श्याम सुन्दर प्रसन्न होंगें ………क्या आप लोग नही चाहते कि श्याम सुन्दर प्रसन्न हों ? उद्धव ! हमारी स्वामिनी का यह रूप अलग ही था ………..हम सब देखती रहीं ।
सब बृजवासियों नें …………….हमारी स्वामिनी की बातों को स्वीकार किया ……….गोपियों को समझाया श्रीराधा रानी नें ।
उद्धव ! तब जाकर “बृजवासी” कर्म में लगे थे ……….कितने सुन्दर ढंग से कर्मयोग की शिक्षा दी थी हमारी श्रीराधा रानी नें ।
हे गोविन्द ! मैं आनन्दित हुआ था ललिता सखी के मुखारविन्द से श्रीराधारानी का यह सन्देश सुनकर ।
उद्धव नें कहा ।
हे उद्धव ! पूर्व में भगवान शिव की शिवा नें वो कार्य नही किये…..
इस सृष्टि में किसी भी महिला नें अपनें पुरुष के लिये वो कार्य नही किये …..जो कार्य मेरे लिये मेरी राधा नें किये हैं ……….मेरी कीर्ति बढ़ें , मेरा यश बढ़े इसके लिये ……..वियोग में ….विरह में घुट घुट कर बिलखती रही …..पर …………मेरे कर्म में कभी बाधा नही बनीं राधा ।
हाँ उद्धव ! कभी नही………..वो चाहती तो मुझे रोक सकती थी मथुरा आनें से ………और वो अगर एक बार भी रोकती ……तो इस कृष्ण में ताकत नही कि ……..रुकता नही …………..
पर ……………..श्रीकृष्ण फिर राधाभाव में डूब गए थे ।
शेष चरित्र कल –


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