!! एक अद्भुत काव्य – “प्रेम पत्तनम्” !!
( प्रेम नगर 33 – “जहाँ स्त्रियाँ ही पुरुष हैं” )
यत्र स्त्रिय एव पुरुषा : ।
अर्थ – प्रेमनगर में स्त्रियाँ ही पुरुष भाव को प्राप्त होती हैं ।
*जी , प्रेमनगर में स्त्रियाँ पुरुष भाव में जीने लगती हैं ।
ये प्रेम की ऊँचाई है ….इस ऊँचाई में स्त्री को पुरुष भाव में भावित होते हुए देखा गया है …हमारे गाँव-देहातों में जब स्त्रियाँ उत्सव-आनन्द के चरम पर होती हैं …तब वो पुरुष भेष धारण करके जो उन्माद मचाती हैं …वो देखने जैसा होता है । स्त्रियाँ पुरुष भाव में तब जीने लगती हैं …जब उन्हें अतिआनन्द की अनुभूति होती है । रस के महान कवि श्रीजयदेव जब “सुरत सुख” का वर्णन करते हैं तब लिखते हैं कि वहाँ विपरीत रति की केलि आरम्भ हो गयी है । अब ये विपरीत रति क्या है ? क्या पुरुष भाव को स्त्री प्राप्त करने का उपद्रव करे , यही विपरीत रति नही है ?
जब “प्रेम पत्तनम्” के लेखक ये कहते हैं , कि “प्रेम नगर की स्त्रियाँ पुरुष भाव को प्राप्त होती हैं”तो इसका अभिप्राय यही है कि, स्त्रियाँ यहाँ अतिशय आनन्द में हैं , उनके आनन्द-उत्साह ने सीमा पार कर लिया है । हे रसिकों ! ये प्रेम अटपटा तो है ही, किन्तु अबूझ सी एक पहेली भी है ।
श्याम सुन्दर सन्ध्या बीतने पर अपने नन्दभवन से बाहर निकले ही थे कि सामने महान तपश्विनी पौर्णमासी दिखाई दीं ….श्याम सुन्दर ने उन्हें प्रणाम किया …तब पौर्णमासी ने चौंक कर पूछा …हे श्याम ! तुम यहाँ हो और उधर वंशीवट में महारास हो रहा है । पौर्णमासी के मुख से महारास की बात सुनते ही श्याम सुन्दर भी स्तब्ध थे …मेरे बिना कैसा महारास ? वही तो मैं भी कह रही हूँ …किन्तु मैंने वहाँ देखा तो हंसी आगयी …श्रीराधा तुम्हारा रूप धारण की हुयी हैं ….और बड़ी गम्भीरता के साथ – “आओ गोपियों ! चलो महारास करते हैं “। और वहाँ रास चल रहा है …नृत्य हो रहा है । तो होने दो महारास ….झेंप गए थे श्याम सुन्दर …इसलिए बोले ।
किन्तु श्रीराधा के बिना महारास कैसा ? पौर्णमासी बोलीं ।
किन्तु श्रीराधा तो वहाँ हैं ना ? श्रीकृष्ण ने भी कहा ।
नही , वहाँ श्रीकृष्ण हैं ….श्रीराधा नहीं । पौर्णमासी का कहना था ।
क्या मतलब ? पौर्णमासी से पूछा । देखो कृष्ण ! श्रीराधा तो वहाँ श्याम रूप धारण करके महारास कर रही हैं ….वो श्रीराधा नही हैं इस समय वो कृष्ण हैं ….इसलिये उस रास को अब पूर्ण करना ही होगा । कैसे पूर्ण होगा ? कृष्ण फिर पूछते हैं । तो पौर्णमासी कहती हैं …तुम श्रीराधा बन जाओ …और जाओ वहाँ ….श्रीराधा बनकर उन श्रीकृष्ण को पूर्ण बनाओ । हे कृष्ण ! ये प्रेम की उन्नत दशा है ….ये प्रेम की ऊँचाई है जिसे श्रीराधा ने प्राप्त किया है ।
ये सुनते ही कृष्ण श्रीराधा का रूप धारण कर लेते हैं …और उस रास मण्डल में प्रकट हो जाते हैं ।
हे रसिकों ! ये प्रेम की अटपटी चाल है , जिसे हर कोई नही समझ सकता ।
ये प्रसंग “गीत गोविन्द” का है –
हे माधव ! चलो ! शीघ्र चलो , विलम्ब ना करो ।
एक सखी आयी है जो श्यामसुन्दर को चलने के लिए कह रही है …वो बेचैन है…कुछ कुछ घबड़ाई हुयी सी भी है ।
सब ठीक तो है ना ? श्यामसुन्दर उस सखी का हाथ पकड़ कर पूछते हैं ।
कुछ पता नही , हे माधव ! तुम्हारी श्रीराधा आज एक विशेष स्थिति में चली गयीं हैं …सखी के मुख से ऐसा सुनते ही श्याम सुन्दर घबड़ा गये , क्या हुआ मेरी राधा को ? बताओ , क्या हुआ ?
मैं आज प्रातः से ही उन्हें देख रही थी वो – हे माधव , हे मधुसूदन ! हे श्याम ! यही सब कह रहीं थीं …फिर एकाएक वो मौन हो गयीं ….कुछ समय बाद मैंने देखा उनके नेत्र खुले के खुले रह गये थे …फिर मैं कुछ करती उससे पहले ही वो ….क्या वो ? श्याम सुन्दर ने पूछा ।
वो अपने आपको श्याम सुन्दर कह रही हैं ….उनमें अब स्त्रीभाव नही हैं …वो पुंभाव में आगयी हैं …..सिर में फेंटा बांध कर वो हम सबको कह रही हैं …मेरी राधा को बुलाओ , मेरी राधा को यहाँ शीघ्र बुलाओ …मुझे उनके साथ अभिसार करना है …मुझे अपनी राधा के साथ विहार करना है ।
सखी कहती है –
हे माधव ! क्यों न अब तुम ही श्रीराधा बन जाओ …और श्रीराधा को माधव ही बनने दो …उनको उन्मत्त होने दो …उन्हें खेलने दो अपने साथ ….ये उनकी “उन्मद रति लीला” हे श्याम ! तुम उसका आनंद लो …..ये सुनते ही श्याम सुन्दर उस सखी के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं …वो सखी कहती है ये क्या है ? श्याम सुन्दर नयन मूँद कर कहते हैं ….मुझे अपना सखी रूप प्रदान करो …फिर सखी रूप प्राप्त करके श्रीकृष्ण अपनी श्रीराधा के पास जाते हैं …वहाँ “विपरीत रति लीला” का सम्पादन होता है । ओह ! इसका वर्णन सम्भव नही है ।
एक समय – एक सखी श्रीराधा के महल में प्रवेश करती है ।
वो ये देखकर स्तब्ध रह जाती है कि श्रीराधारानी अपना मुख दर्पण में देख रही हैं ….और सुध बुध खो बैठी हैं । सखी भी वहीं बैठ जाती है ….उसे आगे देखना है ।
श्रीराधा अपने आपको दर्पण में देखते देखते विचार करने लगती हैं ….ओह ! मैं तो बहुत सुन्दर हूँ ….मेरा रूप लावन्य तो अनुपम है …..मेरा अंग अंग तो रस से भरा हुआ है …मेरे श्रीअंग से माधुर्य रस तो मानौं टपक रहा है । ओह ! इस सुन्दर श्रीअंग का उपभोग किया जाये …तो कितना सुख मिले ….किन्तु श्रीराधा के सामने एक दिक्कत थी …क्या ? कि श्रीराधा के श्रीअंग का भोग तो श्याम सुन्दर ही कर सकते हैं …इस गौर अंग का उपभोग तो श्याम अंग ही कर सकता है …तो देखते ही देखते, श्रीराधा उन्मद हो गयीं और श्याम भाव प्राप्त करने के लिए वो बैचैन हो उठीं थीं ।
ये बात आकर वही सखी श्याम सुन्दर को बताती है । कि अपने आपसे मिलने के लिए श्रीराधा कृष्ण भाव को प्राप्त हो चुकी हैं । अब हे श्याम ! तुम राधा बन जाओ ।
हे रसिकों ! क्या कहोगे इसे ?
श्याम श्याम कहत राधे आपुहीं श्याम भई ,
पूछत फिरत सखियन सौं , मेरी राधे कहाँ गई ।।
शेष अब कल –


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