महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (023)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
योगमाया का आश्रय लेने का अर्थ
मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः
श्रीशुक उवाच
भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः ।
वीक्ष्य स्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः ।।
मनुष्य कर्म करता है आनन्द के लिए और मनुष्य ज्ञान भी प्राप्त करता है आनन्द के लिए। आनन्द तो जीवन का प्रयोजन है। प्रयोजन किसको बोलते हैं? अवगतं सत् आत्मनि इष्यते स्वनिष्ठतया इष्यते- मालूम पड़ने पर मन हो कि यह हमारे साथ ही रहे, हमारे अन्दर ही रहे, उसी को बोलते हैं, प्रयोजन, उसी को बोलते हैं मजा, आनन्द जो लोग वेदान्त- चिन्तन करते हैं या कर्म करते हैं, वे सब निठल्ले रह जाते यदि भगवान् रासलीला करके आनन्द को प्रकट न करते, आनन्द की अभिव्यंजना, आनन्द की अभिव्यक्ति न करते। नौकरी इसलिए नहीं करते कि रुपया मिलता है, रुपये से मजा मिलता है इसलिए नौकरी करते हैं। व्यापार इसलिए नहीं करते कि दुकान में बहुत सामान रहता है, इसलिए करते हैं कि सामान से मजा मिलता है। तो जीवन का जो प्रयोजनीय पदार्थ है, प्रयोजनीय वस्तु है, वह आनन्द है।
यह जो रासलीला है, इसमें देखो- भगवान् स्वयं आनन्द कैसे लेते हैं? ‘रात्रि ताः वीक्ष्य रात्रीर्वीक्ष्य शरदोत्फुल्लमल्लिका वीक्ष्य’ यह ऐश्वर्य पक्ष का अर्थ है। जैसे कोई बगीचा ले, बढ़िया-बढ़िया फूल लगावे, पौधा लगावे, उसको सींचे, खाद दे और जब खूब अच्छी-अच्छी जाति के गुलाब उसमें खिलें तो जाकर उनको देखे, उनमें घूमे, उनको देख-देखकर, उनकी सुगन्ध, उनके सौन्दर्य का आनन्द ले, इसी प्रकार भगवान् यह सृष्टि बनाते हैं। ‘ताः वीक्ष्य’ गोपियों को बनाया और अपने आत्मा में, अपने स्वरूप में जो सच्चिदानन्द है वह गोपियों में स्थापित किया। ‘रात्रीर्वीक्ष्य’ रातें बनायी बड़ी सुन्दर मान काल की सृष्टि की।*
वृन्दावन धाम की सृष्टि की। स्थान भी सच्चिदानन्दमय, समय भी सच्चिदानन्दमय, व्यक्ति भी सच्चिदानन्दमय शरदोत्फुल्लमल्लिका, एक रोते हुए आदमी को हँसाया और उसको हँसाकर स्वयं हँसने लगे। आनन्द लेने की पद्धति यही है, अगर किसी से मजा लेना हो तो पहले मजा देना चाहिए। अगर वृन्दावन से श्रीकृष्ण आनन्द लेना चाहते हैं, गोपियों से आनन्द लेना चाहते हैं, रात्रि से आनन्द लेना चाहते हैं तो पहले उनको आनन्द देंगे फिर उनसे आनन्द लेंगे। बिना दिए कोई ले नहीं सकता।
शरदोत्फुल्लामल्लिका- यहाँ शरदि फुल्लाः मल्लिकाः यासु ता रात्रीः ऐसा ठीक नहीं है? क्योंकि तब शरदुत्फुल्लामल्लिका होगा, शरदोत्फुल्लमल्लिका नहीं होगा। बोले यहाँ ‘शरदा’ शब्द है, शरदायां उत्फुल्ला मल्लिका मल्लिका यासु शरदोत्फुल्लमल्लिकाः- अथवा शरदा तृतीयान्त हो शरदा हेतु भूतया, माने यस्मात् कारणात् तदानीं शरद ऋतुर्वर्तते- अतः शरदाहेतुभूतया शरदऋतु के कारण मल्लिका खिली हुई है। बेला, चमेली सब अच्छे-अच्छे फूल खिले हुए हैं। इन फूलों की सुगन्ध आने से, इनको देखने से, हृदय में एक दिव्य लालसा उत्पन्न होती है कि हम कृष्ण से मिलें। संसार में लोग छोटी-मोटी चीज देखते हैं, फिर उनकी चाह होती है। रुपया चाहिए, कपड़ा चाहिए, भोग चाहिए परंतु यह कहाँ मन में आता है कि कृष्ण चाहिए। लेकिन जब वृन्दावन का कदम्ब देखते हैं तब इच्छा होती है कि इसकी डालपर बैठकर बाँसुरी बजाने वाला चाहिए। जब वृन्दावन की धूल देखते हैं तब मन में आता है कि इसमें लोट-लोटकर जिस बालक ने क्रीड़ा की है वह चाहिए।
देखो बम्बई में घूमो, तो- यह अमुक भाई का मकान है, अमुक भाई का मकान है, यह अमुक बहन का मकान है, यही न! पर वृन्दावन में घूमो तो यह राधावल्लभ का मन्दिर है, यह राधारमण का मन्दिर है, यहा विहारी जी का मंदिर है। यहाँ आदमियों की याद आती है और यहाँ आदमियों का सान्निध्य है और वृन्दावन में मनुष्यों की याद नहीं, मनुष्यों का स्वामित्व नहीं, कृष्ण का स्वामित्व और कृष्ण की मुरली। एक-एक चीज उसी की याद दिलाती है। यहाँ मृद्-भक्षण किया, यहाँ कालियदमन किया, यहाँ चीरहरण किया, यहाँ रासलीला की, सेवाकुञ्ज है, रात में जब रास करते-करते श्रीजी थक जाती हैं तब भगवान् पाँव दबाते हैं। यह निधिवन है, यहाँ विहारी जी प्रकट होते हैं।**
एक-एक चीज जो वृन्दावन की है- ‘मन ह्वै जात अबहुँ वही वा जमुना के तीर।’ अब भी मन वही हो जाता है, वैसे ही हो जाता है, कहाँ? वा जमुना के तीर, उस जमुना के किनारे जब जाते हैं तो ऐसे ही मन हो जाता है। वृन्दावन की महिमा बड़ी विलक्षण है।
‘शरदोत्फुल्लमल्लिका’- शरदा- शरदति कामपीड़ा ददति इति शरदाः। ददाति, ददति बहुवचन है। जैसे- हृदय में बाड़ लग जाय तो पीड़ा होती है, वैसे जिसके हृदय में कृष्ण प्राप्ति की इच्छा हो जाती है, उसके हृदय में पीड़ा होती है। और यह पीड़ा जो सहने के लिए तैयार नहीं है, उसको प्रेम के मार्ग में पाँव नहीं रखना चाहिए। इसमें पीड़ा ही निर्माण करती है, वही महौषध है। इसमें बाहर की दवा नहीं खायी जाती है। यह जो प्रेम का दर्द है : दरद-दरं भयं ददाति ति दरदः। ‘दर’ शब्द है संस्कृत का वही हिंदी में ‘डर’ बन गया, दरं भयं ददाति इति दरदः। आगे के लिए डर होता है कहीं मर न जायं, उसके दरद हो गया यह जो दरद है।
तेरी याद में दिलाने जो दर्द दिया,
तो कुछ ऐसा मजा मैंने उसका लिया।
न करूँ न करूँ मैं दवा,
मैंने खाई है अब तो दवा की कसम।।
तो वृन्दावन में पहले प्रेम की पीड़ा आती है। हाथ जोड़कर निकल जाने वाले लोग दूसरे होते हैं। अगर विहारीजी के सामने हाथ जोड़ लिया, पाँच रुपये का, चार आने का प्रसाद चढ़ा दिया, विहारी जी महाराज की जय! फिर नजर गयी कि जूता अपनी जगह पर है कि नहीं? तो वह बात दूसरी है और विहारी जी के संयोग से सुख होवे और उनके वियोग में दुःख होवे- वह शरदा है। ‘शरदोत्फुल्लमल्लिकाः’- शरकी तरह जो दाह दे हृदय में जो दुःख दे हृदय में, दरद दे दिल में, एक-एक बात, एक-एक पशु, एक-एक पक्षी, यह गाय है जिसको कृष्ण चराते थे, वह पेड़ है जिस पर बैठते थे यह फल है जिसकी सुगन्ध लेते थे। यह यमुना है जिसमें तैरते थे।
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹


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