*!! एक अद्भुत काव्य – “प्रेम पत्तनम्” !!* -( प्रेम नगर 34 – “और पुरुष ही स्त्रियाँ हैं” ) : Niru Ashra

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, !! एक अद्भुत काव्य – “प्रेम पत्तनम्” !!*

( प्रेम नगर 34 – “और पुरुष ही स्त्रियाँ हैं” )

यत्र पुरुषा एव स्त्रिय : ।।

अर्थ – जहाँ ( प्रेम नगर में ) पुरुष ही स्त्रियाँ हैं ।

*हे रसिकों ! प्रेम सबको एक बनाकर ही मानता है …मैंने कई प्रसंगों में कहा है …”प्रेम द्वैत से आरम्भ होता है और अद्वैत तक पहुँचता है”। प्रेम ही है जो पुरुष और स्त्री के भेद मिटा कर दोनों को एक बना देता है । अरे ! ये क्या बड़ी बात हुयी …प्रेम तो भक्त और भगवान का भी भेद मिटा देता है …भगवान भी भूल जाते हैं कि मैं भगवान हूँ और भक्त भूल जाता है कि मैं भक्त हूँ । ऐसे अनेक उदाहरण हमारे सामने हैं …अस्तु ।

कल के सूत्र में कहा गया था कि – प्रेम नगर में स्त्रियाँ ही पुरुष हैं । और आज के सूत्र में कहा गया है कि …प्रेम नगर में पुरुष ही स्त्रियाँ हैं ।

देखो जी ! प्रेम अपना प्रभाव तो छोड़ता ही है …वहाँ देह से कोई मतलब नही है । प्रेम उच्च स्थिति में है …और उसी समय विरह हो जाये …तो वहाँ स्त्री की भी वही दशा होती है जो पुरुष की होती है …होगी । कोई नेही नायिका प्रेम में पड़ी है, और प्रेम उसका उच्च से उच्चतम होता जा रहा है …तो उस स्थिति में वो नायिका नायक बन जाती है …ये बात कल के सूत्र में समझाया गया ।

अब आज का सूत्र समझिये – कोई नेही नायक जो अपनी प्रेयसी के प्रेम में आकंठ डूबा हुआ है …सुरत सिंधु में अवगाहन कर रहा है …उस समय उसकी भी स्थिति ये हो जाती है कि वो नायिका के भाव में आजाता है …नायिका ही बन जाता है । वो वस्त्रों से भी स्त्री बनने के लिए मचल उठता है …उस “सुरत सुख” में वो अपनी प्रिया की ही चुनरी ओढ़ , प्रिया के बाहों में ही खो जाना चाहता है , खो जाता है ।

ये प्रेम है ….ये प्रेम का मार्ग है …किन्तु अब हम पहुँच गये हैं प्रेम नगर में …वहाँ क्या क्या है ? वहाँ के लोग कैसे हैं ? ये सब आपको बताया जा रहा है । इसमें बहुत छोटे छोटे सूत्र हैं …किन्तु हैं बड़े रहस्यपूर्ण । प्रेम के रहस्यों को ये सूत्र उजागर करते हैं ।

“स्त्रियाँ पुरुष हैं प्रेम नगर की” ये कल का सूत्र था, आज का सूत्र है , “नगर के पुरुष स्त्री हैं”।

अपने आपको खोये बिना प्रेम मिलता कहाँ है ? पुरुष जब तक अपने अहंकार में है ,और स्त्री जब तक अपने अहं को बचाई हुयी है तब तक सम्भव ही नही है कि प्रेम उच्चतम स्थिति तक पहुँचे ।

वहाँ तो स्त्री अपने स्त्रीपने को भूल जाये और पुरुष अपने पुरुषत्व को …तब दोनों में जो प्रेम प्रवाहित होगा …वो अद्भुत और अनुपम होगा । वही दिव्य होगा ।

“कान्ह भये प्राणमय , प्राण भये कान्हमय , हिय में न जानि परै कान्ह है कि प्राण है”


चलिये निकुँज की सेज पर जिस में विराजे हैं श्यामाश्याम ।

झाँकी का दर्शन कीजिए ।

दोनों एक दूसरे पर रीझते हैं, खीजते हैं , पुलकित होते हैं, और हँसते हैं ।
फिर आहें भरते हैं , उनकी आँखें डबडबा जाती हैं , और “हा हा, मुझे अपने में ले लो”….ये कहते हुए मिलन में भी विरह से भर जाते हैं । फिर चौंक पड़ते हैं , कभी चकित हो जाते हैं , कभी उचक पड़ते हैं , कभी स्तब्ध से हैं …फिर कुछ न कुछ गाने लगते हैं । फिर एक दूसरे के रूप सौन्दर्य का बखान करने लगते हैं …फिर उन्मादी की तरह एक दूसरे को छूने लगते हैं ….छूते हुए एक दूसरे में खो जाते हैं …लीन हो जाते हैं । तन्मय हो गये हैं दोनों । अब तो दोनों भूलने लगे हैं कि कौन श्रीराधा है और कौन श्याम ? श्याम राधामय हो गये हैं ….और राधा श्याममय ।

आहा ! कैसी होती होगी वो अवस्था ! जहाँ पुरुष का पुरुषत्व मिट गया और स्त्री का स्त्रीत्व ।


आज ग्वाल बालों ने सजा दिया है अपने कन्हैया को …..वन विहार करते हुए सजा दिया था । सिर में मोर पंख , गले में वैजयन्ती माला , कानों में कनेर के पुष्प , पीताम्बरी, सुवर्ण के समान चमकती पीताम्बरी । लो सज गया अपना कन्हैया ….ग्वाल बालों ने कहा …और अपनी अपनी गैया देखने चले गये …किन्तु अब श्याम सुन्दर क्या करें ! उनको कौतुक है कि मेरे सखाओं ने मुझे कैसा सजाया है, तो यमुना के तट पर चले गये, और यमुना के स्वच्छ स्थित जल में अपने मुख अरविन्द को निहारने लगे । ओह ! मैं इतना सुन्दर हूँ ! कन्हैया अपने रूप पर ही मोहित हो उठे थे । ओह ! मेरे ये कपोल , मेरे ये घुंघराले केश , मेरे ये अरुण अधर , मैं कितना सुन्दर हूँ…मैं कितने माधुर्य से भरा हूँ । ये देखते सोचते कन्हैया तन्मय हो गये …और उनके मन में ये विचार आया कि इस मेरे सुन्दर देह को कौन युवती भोग करेगी । वो कितनी भाग्यवान होगी …जो इन रस से भरे कपोल को अपने दंत से क्षत करेगी । कौन युवती होगी वो जो इन अधर रस का पान करेगी …मुझे आलिंगन करेगी …इन सुरभित अंगों से खेलेगी …..ये सोचते सोचते श्याम सुन्दर अपने को आलिंगन करने लगे ….और धीरे धीरे राधा भाव को प्राप्त हो गये ।

हा कान्त ! हा प्रिय ! हा प्रीतम ! ये मधुर ध्वनि श्रीराधिका के कानों में पड़ी ।

ये कौन सखी अपने प्रिय को पुकार रही है ….देखो तो ! श्रीराधारानी ने कहा ।

ललिता ने देखा ….तो सामने ही कन्हैया विरह में पड़े हैं और वो हा नाथ ! हा प्रिय ! यही पुकार रहे हैं । श्रीराधा दौड़ पड़ीं …अपने कन्हैया को उन्होंने सम्भाला । ये क्या दशा हो गयी थी कन्हैया की ! श्रीराधा चिंतित हो उठीं हैं । तब ललिता ने कहा …हे राधे ! ये पीताम्बर धारण करो और अपने सिर में इस चुनरी को फेंटा बांध लो ..और अपने कन्हैया का अभिसार करो । पर याद रहे ये इस समय स्त्री भाव में हैं , हे प्यारी ! तुम पुरुष भाव में प्रवेश करो ।

ललिता की बातें सुनकर ….श्रीराधा समझ गयीं कि प्यारे की स्थिति क्या है ! उन्होंने तुरन्त सिर में चुनरी बांधकर कन्हैया को प्रगाढ़ आलिंगन किया और ये कहते हुए आलिंगन किया कि – मेरी प्यारी ! मैं आगया , मैं हूँ तुम्हारा प्रीतम श्याम सुन्दर । मेरी राधा ! ये कहते हुए श्रीराधा ने श्याम सुन्दर को चूमा …अपने लिए “राधा” सम्बोधन सुनकर …श्याम सुन्दर और उन्मादी हो गये …वो भूल गए हैं कि मैं कृष्ण हूँ …अब तो वो अपने आपको राधा ही मान बैठे थे ।

हे रसिकों ! ये चमत्कार है प्रेम का । प्रेमनगर में पुरुष स्त्री हैं । यानि यहाँ प्रेम ही प्रेम है …अब जहां केवल प्रेम हो वहाँ कुछ भी हो सकता है । स्त्री पुरुष और पुरुष स्त्री ।

शेष अब कल –

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