महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (032)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
कृपायोग का आश्रय और चंद्रोदय
‘रन्तुं मनश्चक्रे’ का दो अर्थ है- रन्तुं मनः कृतवान् चक्रे माने कृतवान् रमने का मन किया माने रमण का संकल्प किया और दूसरा अर्थ होता है- अमना भगवान् ने ‘रन्तुं मनश्चक्रे के कृतवान् निर्मितवान् मन बनाया। चंद्रमा ने कहा- यह नियम है जहाँ मन हता है वहाँ उसका अधिदेवता मैं भी रहूँगा। जैसे- आँख में सूर्य है, कान में दिक्देव है नाक में अश्विनीकुमार है, और रसना में वरुण है, वाक् में अग्नि है, हाथ में इंद्र है, पाँव में उपेंद्र है। वैसे ही अब तुम्हारा मन हुआ तो मन में मैं भी रहूँगा। चंद्रमा का मन का देवता है।’
आपको देवता और इन्द्रिय का संबंध बताने लगूँ तो बात थोड़ी जटिल हो जाएगी। रासलीला में जटिलता- कुटिलता का काहे को प्रवेश कराना? जटिला, कुटिला जब आ जाती है, तो राधारानी के रस में बाधा पड़ जाती है, यह लीला की बात है। अच्छा अब देखो- एक भगवत्- संबंधी बात सुनाता हूँ। श्रीमद्भागवत् में यह प्रसंग आया है-
एषां तु भाग्यमहिमाच्युत तावदास्तां एकादशैव हि वयं बत भूरिभागाः ।
एतद्धृषीकचषकैरसकृत् पिबामः शर्वादयोऽङ्घ्य्रुदजमध्वमृतासवं ते ।।[1]
ब्रह्माजी कहते हैं कि व्रजवासियों के सौभाग्य की महिमा कौन कहे उसको तो अलग रहने दो, इनकी इंद्रियों में बैठ करके हम ग्यारह देवता भाग्यवान हो गये- ब्रह्म भाग्यवान, विष्णु भाग्यवान, रुद्र भाग्यवान, इन्द्र भाग्यवान, चंद्रमा भाग्यवान, सूर्य, वरुण, अग्नि भाग्यवान। ब्रह्माजी ने कहा- इन व्रजवासियों की इंद्रियों में बैठकर के हम देवता भाग्यवान। ब्रह्माजी ने कहा- इन व्रजवासियों की इन्द्रियों में बैठकर के हम देवता भाग्यवान हो गये। कैसे? ब्रह्माजी बोले- कि सूर्य गोपियों की, व्रजवासियों की आँख में बैठ करके श्रीकृष्ण की रूपमाधुरी का पान करते हैं। वायु देवता हाथ में बैठकर के भगवान् के हाथ के ग्रहण की माधुरी का आस्वादन करते हैं। मन में बैठकर, चंद्रमा, बुद्धि में बैठकर हम ब्रह्मा भाग्यवान हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण के साथ इंद्रियों का जो संबंध है वह बड़ा विलक्षण है।*
इंद्रियों का जो संसार के साथ संबंध है वह बन्धन का हेतु है और कृष्ण के साथ जो संबंध है, वह? अनजाने साजन से, अनमिले साजन से जो प्रीति है, अतीन्द्रिय साजन से जो प्रीति है, उसमें इन्द्रिय- भोग तो होगा नहीं, इसलिए संसार तो छूट जाएगा, वैराग्य की उपलब्धि होगी और उधर परमानन्द-रस का आस्वादन होगा। ब्रह्म बोले- हम बड़े- हम बड़े। तुम क्यों बड़े?
एतत् धृषीकचषकैरसकृत्पिबामः क्योंकि इन व्रजवासियों के इंद्रिय रूपी प्यालों से हम श्रीकृष्ण-रस का पान करते हैं- अङ्ध्य्रुदजमध्वमृतासवं ते को चरणारविन्द-मकरन्द- मधु, अमृत, आसव तीनों बताया। मधु रोग-हारक होता है और आसव विषमारक होता है। आसव पियो तो छक जाओ, दुनिया का दुःख भूल जाय, शहद पिओ तो खूब मीठी लगे और रोग मिट जाए, औषध है। और अमृत पिओ तो मृत्यु मिट जाए। यह श्रीकृष्ण का चरणारविन्द-मकरन्द मधु जो है वह अमृत भी है आसव भी है। श्रीकृष्णचरणारविन्द- मकरन्द मधु श्रीमद्भागवत में आया है- स्मरन्मुकुन्दाङ्घ्य्रुपगूहनम्। आप यह ध्यान करो कि हम कृष्ण के चरणारविन्द को अपने हृदय से लगाकर अपने हृदय से दबा रहे हैं। नाक से सूँघ रह हैं, जीभ से चाट रहे हैं, आँख से एक-एक अँगुली, एक-एक सौन्दर्य देख रहे हैं। त्वचा से स्पर्श कर रहे हैं, कान से रुनझुन-रुनझुन सुन रहे हैं। संसार को छोड़कर भगवद्रस में डूब जाएंगे आप। निराधार होकर इंद्रियों को जगत् से अलग करना कठिन है और श्रीकृष्ण- चरणारविन्द का आधार पकड़ करके अपनी इंद्रियों को संसार से छुड़ाना- ये अनायास आसान है।
एक पंडित ने ब्रह्माजी को डाँटा- क्यों बोलते हो? इंद्रियों में बैठकर कहीं देवता भोक्ता होता है? झूठ बोलते हो। देवता इंद्रियों का अनुग्राहक तो है परतुं ग्राहक नहीं है। ग्राहक हैं इंद्रियाँ, अनुग्राहक हैं देवता। अगर देवता रस पीने लगे तो सुखी- दुःखी होगा न! और सुखी-दुःखी होगा तो पापी-पुण्यात्मा हो जाएगा। अगर देवता हमारी इंद्रियों में बैठकर सुख-दुःख का भोक्ता बन जाए, तो वह पापी-पुण्यात्मा भी बनेगा, शास्त्र के विरुद्ध भोग लेने पर वह पापी हो जाएगा और शास्त्र के अनिरुद्ध भोग लेने पर (अविरुद्ध-अनिरुद्ध) वह पुण्यात्मा हो जाएगा; और देवता को तो पाप-पुण्य लगता नहीं।*
ब्रह्माजी! तुम क्या बोलते हो? तुम क्या व्रजवासियों की इंद्रियों में बैठकर श्रीकृष्ण का रसास्वादन कर सकते हो? बोले- अरे भाई, कर तो नहीं सकते, औरों को तो नहीं करते हैं, और जगह तो हम लोग बिलकुल शुक्ल कर्म करते हैं, अनुग्रह ही करते हैं, पर यह कृष्ण का प्रसंग आता है, तब उनके साथ काले काम भी करने लगते हैं, ब्लैकमेल भी कर लेते हैं। जादू तो वह जो सिर पर चढ़कर बोले- इनके साथ तो ब्लैक भी चलती है क्योंकि इतने सुन्दर हैं, इतने मधुर हैं। कृष्ण का सौरभ जब मिलता है, तब अश्विनीकुमार को यह भूलजाता है कि हम इमानदारी से परे होकर यह गन्ध सूँघ रहे हैं। सूर्य को भी भूल जाता है। बोले- ब्रह्म, तुम अब भी भूल कर रहे हो। कहा- क्या भूल है अब? अब यह भूल है कि ये व्रजवासी तो सच्चिदानन्दघन अप्राकृत हैं, इनके देह प्राकृत नहीं है, इनकी इंद्रियाँ प्राकृत नहीं है। अरे भाई।
‘तस पूजा चाहिय जस देवता’ कृष्ण से मिलने के लिए स्वयं को भी जैसे- वे देहातीत हैं वैसे हमको बी धर्मातीत होना पड़ेगा। जैसे वे प्रकृति से परे हैं वे हमको भी प्रकृति से परे होना पड़ेगा। तो ये व्रजवासी तो अप्राकृत हैं, इनकी इन्द्रियाँ अप्राकृत हैं; और अप्राकृत इन्द्रियों में देवता की जरूरत नहीं होती। प्राकृत इन्द्रियों में ही जहाँ तमस् बना हुआ शरीर है और रजस् से होने वाली क्रिया है और सत्त्व से बनी हुई इंद्रियाँ हैं वहाँ अनुग्रह करने के लिए सूर्य-चंद्रादि देवताओं की अपेक्षा होती है। और ये तो सच्चिदानन्दघन, इसमें तुम कहाँ से आये? तो ब्रह्माजी बोले- भाई तुम चुप रहो, चुप रहो, कोई सुन न ले भला।
मिथ्यापवादवचसाऽपि अभिमानसिद्धिः ।
अरे, यद्यपि हमारी प्राकृत इन्द्रियों के साथ और प्राकृत देवताओं के साथ श्रीकृष्ण के रस-रहस्य का कोई संबंध नहीं होता, लेकिन जब व्रजवासी लोग इनको अपनी इन्द्रियों से पीते हैं- पिबन्त्य इव चक्षर्भ्यां लिहन्त्य इव जिह्वा- आँखों से पीते हैं, जीभ से चाटते हैं,- रम्भन्त्य इव बाहुभ्यां- दोनों हाथ से पकड़कर हृदय से लगाते हैं, तो दुनिया को तो ऐसे ही मालूम पड़ता है कि हाथ हृदय को लगाया और आँख से देखा और जीभ से चाट लिया। तो जब सब लोगों को मालूम पड़ता है कि इन्द्रिय-ग्राह्य हो गये हैं।
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
