: !! निकुँजोपासना का सिद्धान्त !!
( “सिद्धान्त सुख” – 28 )
गतांक से आगे –
- काबेरी जू की *
परिवानों हितप्रद परमुदारा चटका चारुचमेलिका ।
सुखसनी नीरजसुनयनी नेहिनी अलबेलिका ॥
- मंजुकेसी जू की *
रंगभीना नागरी नवलाजु भावप्रकासिका ।
भवनसुंदरि सुखसरूपा सहजहासा मंजुला ॥
- सुकेसी जू की *
केलिकलिका रतिरसाला रत्नआवलि सुखदिनी ।
मंजुमोदा मुदमनोजा मानमंजु सरोजिनी ॥
- कबरा जू की *
सुखदरूपा सानुरक्तिनि बरसबाला सरसनी ।
चिमतकारा भद्रसुरभा रंगमजरि चोंपनी ॥
- हारकंठी जू की *
गर्विता गुनभरासहचरि भव्यकांता भूरिदा ।
मदनमाला सुरतसाला रूपजाला रंगिदा ॥
- मनोहरा जू की *
रायबेली फूलमाला कमलनी कमलेक्षिनी ।
हंसगामा प्रेमधामा बिंबओष्ठा बिधुमुखी ॥
- महाहीरा जू की *
रसपयोधा राजरवनी कामिनी कमनीयनी ।
कुंजकेली रंगरेली रहसिरंगा रसदिनी ॥
- हारहीरा जू की *
चारुचरिता चंद्रभागा गोपिका गुनमंजरी।
गिरामिष्टा मिष्टदाया जयावलि जगमंडनी ॥
हे रसिकों ! “सखी भाव” की उपासना सर्वोच्च है …इससे ऊँचा भाव कोई है नही ।
और इस “रस उपासना” में तो अष्ट सखियाँ और उनकी परिकरों का ही प्रवेश है..अन्यों का नहीं । आप कहोगे सखियों के नाम इतने विस्तार से क्यों ? तो इसका उत्तर यही है कि इस उपासना में यही सखियाँ ही हैं …जो सब कुछ है …ये बात आप समझ लीजिए ….आपको जो कुछ भी है वो इन सखी और इनके परिकरों से ही मिलेगा ….इधर उधर भटकने से , इधर उधर जाने से , नये नये साधनों को खोजने से कुछ नही मिलने वाला । इसलिए सावधान होकर सखीभाव को अपनायें । अगर ये भाव नही आ पा रहा …तो सखियों की शरणागति लें । सखियों की अनेक मण्डलियाँ हैं ….इनमें से भावना करके किसी मण्डली में प्रवेश ले लीजिए …..अष्ट सखियाँ हैं …प्रमुख , इनमें से एक को अपना बना लीजिए …और उन्हीं सखी जी को ही मानिये …भाव जगत में यही आपकी गुरुदेव हैं । अष्ट सखियों की भी अष्ट सखियाँ हैं ….जो आपको अपनत्व दें , स्नेह दें और प्रिया प्रियतम के निकुँज में आपको प्रवेश दिला दें । वैसे – ये मेरा मानना है कि सखी भाव सामान्य साधकों के लिए नही है …ये उनके लिए है जो प्रेम मार्ग में जन्मोंजन्म से चल रहे हैं ….और मधुर भाव के अनन्य उपासक हैं । हाँ , एक बार और दृष्टव्य है यहाँ कि …मधुर उपासना के जो सम्प्रदाय हैं …उन्होंने अपनी अपनी एक सखी जी को आचार्य के रूप में माना है , और उन्हीं की उपासना में ये हैं …उदाहरण के लिए ..इस मधुर उपासना का आदि अनादि सम्प्रदाय श्रीश्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय में श्रीरंगदेवि जी को ही प्रमुख माना गया है ….यही आचार्य के रूप में भी धराधाम में अवतरित होती हैं …जो श्रीश्रीनिम्बार्क प्रभु के नाम से विख्यात हैं । श्रीहरिदासी सम्प्रदाय ….वैसे ये स्वतन्त्र सम्प्रदाय नही है ..ये श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय के अन्तर्गत ही आता है …ये श्रीललिता सखी जू को प्रमुख मानकर चलते हैं …इनके आचार्य भी स्वामी श्रीश्रीहरिदास जी ..श्रीललिता सखी जी के अवतार ही कहे गये हैं । ऐसे ही श्रीहित हरिवंश महाप्रभु जी , ये भले ही बंशी के अवतार कहे गये किन्तु श्रीराधा बल्लभ सम्प्रदाय में श्रीबिशाखा सखी जी के अवतार श्रीहरिराम व्यास जी को माना गया है , अस्तु ।
मेरे कहने का अभिप्राय निकुँज की उपासना में एक सखी जू का आश्रय आपको लेना ही होगा ।
- हरिशरण
अद्भुत , अनुपम , अद्वितीय …मेरा मन झूम उठा था, प्रेम रस सिन्धु में डूबने लगा था । ओह ! कोकिल रव को भी मात करने वाली ध्वनि , नूपुर की ध्वनि ।
“श्रीसुदेवी जी की ये सब सखियाँ हैं”…..मुझे हरिप्रिया जी ने बताया । बहुत सखियाँ हैं । मैंने आनंदित होते हुए कहा ।
युगल सरकार जब अपने निज महल में रहते हैं …तब ये श्रीसुदेवी जी की सखियाँ …और उनकी भी सखियाँ ..बड़ी चतुराई से अपनी सेवा प्रदान करती हैं । ये सब निकुँज विलासिनी हैं …देखो ! हरिप्रिया जी ने मुझे दिखाया …मैंने दर्शन किए …इनकी नूपुर ध्वनि में ही मादकता थी …मैंने कहा ना …कोयल की ध्वनि को मात करने वाली ध्वनि ।
ये हैं श्रीसुदेवी सखी जी …..इनके पीछे जो हैं वो इनकी अष्ट सखियाँ हैं ….हरिप्रिया जी बोलीं …पीछे देखो …..एक एक सखी के आठ आठ सखियाँ हैं ……आहा ! क्या दिव्य लग रहा था ….एक साड़ी में , एक आभूषण में , और सब मुस्कुराती ….नूपुर बजाती …..अद्भुत ।
ये हैं श्रीसुदेवी सखी जी की प्रथम सखी ….इनका नाम है …”कावेरी” जी । कावेरी सखी जी की अष्ट सखियाँ हैं …..वो देखो , मैंने दर्शन किए और हाथ जोड़े …..इनके नाम हैं …..
परिवाना जी , हित प्रदायका जी , परम उदारा जी , चटक भरी जी , चारु चमेली जी , सुषमा सनी जी , नीरज नयनी जी , और नेहनी जी । हरिप्रिया हंसती हुई बोलीं …सब अलबेलि सखियाँ हैं ।
तभी पीछे अन्य सखियों ने भी प्रवेश किया था ….इन सखियों के प्रवेश से एक अलग सुगन्ध छा रही थी …..
ये श्रीसुदेवी सखी जी की दूसरी सखी हैं …..इनका नाम है …”मंजु केशी”जी । और इनके पीछे जो आरही हैं वो इनकी अष्ट सखियाँ हैं । अब इनका नाम सुनो ……
रंग भीना जी , नागरी जी , नवला जी , भाव प्रकाशिका जी , भवन सुन्दरी जी , सुख स्वरूपिका जी , सहज हासा जी और मंजु माला जी । ये सब सुगन्धित हैं ….युगल को सुवास देती हैं ….हरिप्रिया जी ने कहा ।
तभी कुछ और सखियों ने उस स्थान पर प्रवेश किया …भीर लग गयी थी सखियों की …सखियों की भीर ने प्रेम की सरिता ही मानौं प्रवाहित कर दी । ये हैं श्री सुदेवी जी की तीसरी सखी ….इनका नाम है ….”सुकेशी” जी । पीछे मत्त होकर आरही हैं …इन्हीं सुकेशी जी की अष्ट सखियाँ ….हरिप्रिया जी ने इनके दर्शन ही नही कराए इनके नाम भी सुना दिए …….
केलि कलिका जी , रति रसाला जी , रत्नावलि जी , सुख दैनी जी , मंजु मोदा जी , मुद मनोजा जी , मान मंजुला जी , और सरोजिनी जी । ये सब रंग भरी हैं ……हरिप्रिया जी ने कहा ।
ये हैं श्रीसुदेवी जी की चौथी सखी ….”कंबरा” जी । इनकी भी अष्ट सखियाँ हैं ….सामने आरही हैं दर्शन करो और नाम सुनो ….हरिप्रिया जी ने मुझे अपना शिष्य बना ही लिया था …वो अब आदेश में मुझ से बोलने लगीं थीं , इस बात से मुझे अति प्रसन्नता हो रही थी ।
सुखद रूपा जी , सानुरक्तिनी जी , बरस बाला जी , सरसनी जी , चिमतकारा जी , भद्र सुरभा जी , रंग मंजरी जी , और चौंपनी जी ।
अब पाँचवी सखी ।
श्रीसुदेवी जी की पाँचवीं सखी “हार कंठी” जी …..इनकी भी अष्ट सखियाँ हैं ….वो आरही हैं …….गर्विता जी , गुण भरा जी , भव्य कांता जी , भूरिदा जी , मदन माला जी , सुरत साला जी , रूप जाला जी , और रंगिदा जी । हरिप्रिया बोलीं …ये सब रूप के गर्व से गर्वित हैं …और क्यों न हों ….इनका रूप देखकर युगल प्रसन्न जो होते हैं ।
अब छटी सखी , श्रीसुदेवी सखी जी की छटी सखी …”मनोहरा” जी हैं । इनकी अष्ट सखियों के दर्शन करो और नाम सुनो …..हरिप्रिया जी नाम बताने लगीं ……..
राय बेली जी , फूल माला जी , कमलिनी जी , कमलाक्षी जी , हंस गामा जी , प्रेम धामा जी , बिम्ब ओष्टा जी , और चन्द्रमुखी जी ।
इसके बाद सातवीं सखी ।
श्री सुदेवी सखी जी की सातवी सखी …..”महाहीरा” जी । हरिप्रिया जी ने कहा ….इनके कण्ठ में देखो हीरा है …ये हीरा स्वामिनी जी ने एक बार इन्हें प्रसन्न होकर दिया था …तब से इनका नाम ही ये “महा हीरा” हो गया । हरिप्रिया प्रसन्न चित्त से बोलीं …..इनकी अष्ट सखियाँ हैं …..रस पयोधा जी , राज रवनी जी , कामिनी जी , कमनीयनी जी , कुँज केलि जी , रंग रेलि जी , रहसि रंगा जी , रस दिनी जी ।
अब इन सबके पीछे एक सखी आ रहीं थीं …..ये श्रीसुदेवी जी की आठवीं सखी हैं …इनके पीछे आठ सखियाँ खिलखिलाती हुई …..ओह ! इनके नाम सुनिए ……चारु चरित्रा जी , चन्द्रभागा जी , गोपिका जी , गुण मंजरी जी , गिरा मिष्टा जी , मिष्ट दाया जी , जया वली जी , जग मंडनी जी । इन सबका नाम बताने के बाद हरिप्रिया जी कहती हैं ….जो इनका नाम भी लेता है …उसके जीवन में कभी अमंगल हो नही सकता । युगल के चरणों में प्रीति और दृढ़ होती है ।
अब शेष कल –Niru Ashra: !! “श्रीराधाचरितामृतम्” 141 !!
रुक्मणी राधा भेंट भई ….
भाग 2
🙌🙌🙌🙌🙌
स्तब्ध हो गयीं रुक्मणी सत्यभामा ……….दासी की दासी इतनी सुन्दरी है तो वो श्रीराधा महारानी कितनी सुन्दर होंगी !
सामनें एक दिव्यआभा से भरी………सुन्दरी इतनी कि ….सुन्दरता भी सकुचा जाए…………
उनके आस पास चार चार सखियाँ थीं…….दिव्य सखियाँ…….
हे राधिके ! मैं द्वारिका की महारानी रुक्मणी ………….इतना कहते हुए जैसे ही झुकीं रुक्मणी………..तभी ललिता सखी नें उठा लिया रुक्मणी को……….अपराध न कीजिये ………मैं श्रीराधा नही हूँ …….मैं तो उनकी सेविका हूँ …………पर मेरी स्वामिनी नें आज तक किसी को अपनी सेविका माना ही नही है…………..वो तो सबको “सखी” कहती हैं ….”सहचरी” कहती हैं …….ये उनकी महानता है ।
ललिता सखी जब बोल रही थीं…….तब उनके गुलाबी अधर , पतले पतले अधर……और उनका मुखमण्डल दिव्य तेज़ से दमक रहा था ।
चलिये मेरे साथ ………इतना कहकर रुक्मणी और सत्यभामा को अपनें साथ लेकर चल दीं ललिता …….श्रीराधा रानी के पास ।
ओह ! वो अस्थाई शिविर का कक्ष………सुगन्ध से महक रहा था …….चारों ओर सखियाँ बैठीं थीं………रुक्मणी नें जब देखा, तब उनका आत्मवल क्षीण हो रहा था………हीनता की शिकार होती जा रही थीं रुक्मणी………श्रीराधारानी मध्य में बैठी हैं ।
पर श्रीराधारानी को कोई देख नही सकता ……..इतना तेज़ है उनके मुखमण्डल में……….हाँ बस ऐसा लग रहा है कि ……….मध्य में कोई ज्योतिपुञ्ज विराजमान है ……………..
स्वामिनी ! कोई आपसे मिलनें आयी हैं ? ललिता सखी नें श्रीराधिका के कान में कहा …………
मुझ से मिलनें ? ललिते ! मुझ से मिलनें कौन आएगा ………….
आहा ! कितनी मधुर मीठी आवाज थी…………….ऐसा लग रहा था कि ..सुनते ही रहें ………….
श्याम सुन्दर की पत्नीयाँ आयी हैं ……ललिता सखी नें कान में कहा ।
कहाँ हैं ? श्रीराधारानी एकाएक उठकर खड़ी हो गयीं………
रुक्मणी को दिखाया, और सत्यभामा को भी ……….
दौड़ कर गयीं श्रीराधारानी …..और बड़े प्रेम से रुक्मणी को और सत्यभामा को अपनें हृदय से लगा लिया था ।
अपनें पास बैठाती हैं रुक्मणी को …………….रुक्मणी को छूती हैं श्रीराधारानी ………केशों को छूती हैं………हाथ पकड़ती हैं ।
क्रमशः ….
शेष चरित्र कल-
🎈 राधे राधे🎈
] Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 6 : ध्यानयोग
🌹🌹🌹🌹🌹🌹
श्लोक 6 . 35
🌹🌹🌹
श्रीभगवानुवाच
🌹🌹🌹🌹🌹
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् |
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते || ३५ ||
श्रीभगवान् उवाच – भगवान् ने कहा; असंशयम् – निस्सन्देह; महाबाहो – हे बलिष्ठ भुजाओं वाले; मनः – मन को; दुर्निग्रहम् – दमन करना कठिन है; चलम् – चलायमान, चंचल; अभ्यासेन – अभ्यास द्वारा; तु – लेकिन; कौन्तेय – हे कुन्तीपुत्र; वैराग्येण – वैराग्य द्वारा; च – भी; गृह्यते – इस तरह वश में किया जा सकता है |
भावार्थ
🌹🌹🌹
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा – हे महाबाहो कुन्तीपुत्र! निस्सन्देह चंचल मन को वश में करना अत्यन्त कठिन है; किन्तु उपयुक्त अभ्यास द्वारा तथा विरक्ति द्वारा ऐसा सम्भव है |
तात्पर्य
🌹🌹🌹
अर्जुन द्वारा व्यक्त इस हठीले मन को वश में करने की कठिनाई को भगवान् स्वीकार करते हैं | किन्तु साथ ही वे सुझाते हैं कि अभ्यास तथा वैराग्य द्वारा यह सम्भव है | यह अभ्यास क्या है? वर्तमान युग में तीर्थवास, परमात्मा का ध्यान, मन तथा इन्द्रियों का निग्रह, ब्रह्म्चर्यपालन, एकान्त-वास आदि कठोर विधि-विधानों का पालन कर पाना सम्भव नहीं है | किन्तु कृष्णभावनामृत के अभ्यास से मनुष्य भगवान् की नवधाभक्ति का आचरण करता है | ऐसी भक्ति का प्रथम अंग है-कृष्ण के विषय में श्रवण करना | मन को समस्त प्रकार की दुश्चिन्ताओं से शुद्ध करने के लिए यह परम शक्तिशाली एवं दिव्य विधि है | कृष्ण के विषय में जितना ही अधिक श्रवण किया जाता है , उतना ही मनुष्य उन वस्तुओं के प्रति अनासक्त होता है जो मन को कृष्ण से दूर ले जाने वाली हैं | मन को उन सारे कार्यों से विरक्त कर लेने पर, जिनसे कृष्ण का कोई सम्बन्ध नहीं है, मनुष्य सुगमतापूर्वक वैराग्य सीख सकता है | वैराग्य का अर्थ है – पदार्थ से विरक्ति और मन का आत्मा में प्रवृत्त होना | निर्विशेष आध्यात्मिक विरक्ति कृष्ण के कार्यकलापों में मनको लगाने की अपेक्षा अधिक कठिन है | यह व्यावहारिक है, क्योंकि कृष्ण के विषय में श्रवण करने से मनुष्य स्वतः परमात्मा के प्रति आसक्त हो जाता है | यह आसक्ति परेशानुभूति या आध्यात्मिक तुष्टि कहलाती है | यह वैसे ही है जिस तरह भोजन के प्रत्येक कौर से भूखे को तुष्टि प्राप्त होती है | भूख लगने पर मनुष्य जितना अधिक खाता जाता है, उतनी ही अधिक तुष्टि और शक्ति मिलती जाती है | इसी प्रकार भक्ति सम्पन्न करने से दिव्य तुष्टि और शक्ति उसे मिलती जाती है | इसी प्रकार भक्ति सम्पन्न करने से दिव्य तुष्टि की अनुभूति होती है, क्योंकि मन भौतिक वस्तुओं से विरक्त हो जाता है | यह कुछ-कुछ वैसा हि है जैसे कुशल उपचार तथा सुपथ्य द्वारा रोग का इलाज | अतः भगवान् कृष्ण के कार्यकलापों का श्रवण उन्मत्त मन का कुशल उपचार है और कृष्ण को अर्पित भोजन ग्रहण करना रोगी के लिए उपयुक्त पथ्य है | यह उपचार ही कृष्णभावनामृत की विधि है |
Niru Ashra:
महारास (दिव्य प्रेम का नृत्य) (112)
(स्वामी अखंडानंद सरस्वती )
गोपियों में दास्य का उदय
हमको परायी मत समझो, अपनी समझो, और दूसरी बात है गति की- जैसे हम चलकर तुम्हारे पास आयी हैं वैसे प्रसीद, माने तुम यहाँ खड़े हो त्रिभंगललित भाव से, वहाँ अब खड़े मत रहो और चलकर एक-एक गोपी के पास जाओ, उनसे मिलो। अब तीसरी बात है हमारे अवसादन की- माने हमारे मन में जो दुःख है उसको भगा दो। इस प्रकार तन्नः प्रसीद-प्रसीद का अर्थ है कि परायपन छोड़ दो; और जैसे हम आयी हैं तुम्हारे पास वैसे तुम भी ललकके- जैसे मक्खन खाने के लिए मचलते हो वैसे मचल के, लालसायुक्त होकर हमारी ओर आओ; और हमारे दुःख को मिटा दो, ये तीन काम करो तो हम समझेंगी कि तुम प्रसन्न हो गये।
संबधोन है, वृजिनार्दन। कृष्ण ने कहा-नहीं बाबा, अभी तुम्हारे अन्दर वृजिन है, तुम हमसे नहीं मिल सकती। जब तक लोहे में जंग लगा होता है, मैल लगा होता है, तब तक वह शुद्धभाव से चुम्बक की ओर नहीं खिंचता; जंग छुड़ाओ, मैल छुड़ाओ, कुछ संस्कार शेष है, कुछ वासना शेष है। तो बोली कि तुम तो वृजिनार्दन हो- वृजिन माने पाप, अपराध, दुःख, तो अगर हमारे अंदर पाप है तो तुम छुड़ा दो, हमसे कोई अपराध हुआ है तो उसे मिटा दो। जैसे पत्नी से कोई गलती हो जाय, तो पत्नी की ओर से पति लोग माफी माँग लेते हैं अथवा जैसे पत्नी से वस्त्र पहनने में या श्रृंगार करने में कोई गलती हो गयी हो, तो पति उसको सुधार लेता है; उसी प्रकार तुमसे मिलने में अगर हमारे अंदर कोई योग्यता की कमी है, तो उस योग्यता की कमी को तुम खुद दूर कर लो क्योंकि तुम वृजिनार्दन हो।
असल में गोपी के दर कोई अयोग्यता नहीं है; और भगवान परीक्षा भी नहीं ले रहे हैं। ईश्वर किसी की परीक्षा नहीं लेता। यह जो लोगों का ख्याल है कि ईश्वर जो हमको दुःख दे रहा है वह हमारी परीक्षा ले रहा है, ठीक नहीं है। क्या ईश्वर को यह पता नहीं है कि इसमें पास होंगे कि फेल होंगे। परीक्षा तो वह आदमी लेता है जिसको आगे का पता नहीं। ईश्वर को तो तुम्हारे पास फेल का सब पता है; परदा कहाँ भर्तासौं जिन देखे सारे अंग- ईश्वर से क्या परदा है? तो बोले कि अगर ईश्वर परीक्षा नहीं लेता है तो दुःख काहे को देता है? तो दुःख देता है तुम्हारी सहनशक्ति बढ़ाने के लिए।+
एक महात्मा हमको गाली देते थे। एक दिन बहुत खुश थे; पूछा कि आप गाली क्यों देते हैं? तो फिर नाराज हो गये, बिल्कुल आगबबूला हो गये और फिर खूब गाली दी। गाली देकर बोले- तुमको हमारी गाली बुरी लगती है? अभी सारी जिंदगी पड़ी है और उसमें न जाने किस-किसकी गाली सहनी पड़ेगी, अभी से सहने की आदत नहीं होगी बाबा तो कैसे सहोगे? जिन्दगी में कभी भूखे रहना पड़ता है, कभी गाली सहनी पड़ती है, कभी बुखार आता है, वह भी सहना पड़ता है, कभी गर्मी, कभी सर्दी सब सहते हुए तो पार करना पड़ता है। मोटर में चलते हैं तो कभी धूल पड़ती है, कभी पेट्रोल की गंध आती , कभी धक्के से चिड़िया मर जाती है, कभी चूहा नींचे आकर मर जाता है। जीवन की यात्रा भी ऐसी है; इसमें दुःख सहने का अभ्यास चाहिए। दुःख सहने से सहिष्णुता बढ़ती है, आत्मशक्ति बढ़ती है। तो भगवान परीक्षा लेने के लिए नहीं, भला करने के लिए दुःख देते हैं भगवान परीक्षा के लिए दुःख नहीं देते, यह उनकी करुणा है। बोल- इसमें क्या करुणा है? तो देखो, एक उलटी कल्पना करके आपको सुनाते हैं।
एक बार किसी कल्प में, किसी मन्वन्तर में, किसी द्वापर में, और किसी कृष्णावतार में श्रीकृष्ण ने बजायी बाँसुरी और गोपियाँ घर से निकलकर आ गयीं; और आ गयीं तो श्रीकृष्ण झट उनके साथ मिले, और मिलकर रासलीला करना शुरू कर दिया। तो सब देवता, मुनि, ऋषि जो भी सुने वही कहते कि हमारे साथ भी रास करो। हमारे साथ क्यों नहीं करते रास जबकि ग्वालिनों के साथ रास की? तब कृष्ण के पास कोई जवाब ही नहीं, गलती कहाँ हुई कि गोपियों का प्रेम जो था, उसको प्रकट होने का अवसर ही नहीं दिया, उनके हृदय में जो भाव था उसको प्रकट करने का मौका ही नहीं दिया, ऐसे ही रास करने लग गये उनके साथ। इसलिए अबकी स्थिति में कृष्ण ने ऐसा किया कि पहले जो गोपियों के दिल में है उसको पहले जाहिर करवा लें, जिससे लोग सीख लें कि गोपियों के हृदय में कितना प्रेम है, जिसके कारण भगवान को उनके साथ रास करना पड़ा। तो यह जो मना किया वह मना करने के लिए नहीं, इसलिए था कि जब मना करने पर भी गोपी की वाग्धारा प्रवाहित होगी तो अपने प्रेम के समूह में सारी दुनिया को डुबो देंगी।++
तो, ‘तन्नः प्रसीद वृजिनार्दन’ गोपियों में पाप नहीं है, अपराध नहीं है, उनकी परीक्षा लेनी नहीं है, इस दुःख से धक्का खाकर उनका प्रेम प्रकाशित हो जाय इसलिए कृष्ण ने कहा कि लौट जाओ। देखो गोपियों, हम तो अपनी बाँसुरी बजाने में मगन है। यह देखो क्या घनाक्षरी रही हैं, और क्या तिलककामोद बज रहा है, हमको तो कोई गोपी-वोपी नहीं दिखती है; बाबा, हम अपने राग-रागिनी में मगन हैं। गोपियों ने कहा- देखो, राग-रागिनी में मगन होना तो ठीक है, तुमको सामने भले न दिखे, लेकिन आदमी कितना भी मगन होकर चले, पाँव के नीचे आ गयी हैं; हमारे ऊपर पाँव रखकर पड़े हो और कहते हो कि हमको कोई गोपी-वोपी नहीं दीखती! गोपियों की ऊँचाई जो थी, जो बड़प्पन था सारा, वह तो तुम्हारे चरणों के नीचे धूल में मिल गया। यदि कोई अपने पाँव के नीचे देखे बिना पाँव रखता है, तो उसको यही कहते हैं कि तुमको अपने पाँव के नीचे की भी नहीं सूझती। हाँ, तो कृष्ण बड़ी बदनामी होगी कि हम तुम्हारे पाँव के नीचे गिर पाँव के नीचे गिर पड़ी, और तुम हमारी ओर नहीं देख रहे ‘तेङ्घ्रिमूलं प्राप्ताः तुम्हारे चरणारविन्द की रज में हम विलीन हो गयी हैं।
अब देखो बताती हैं दो बातें अपने बारे में। बोली- ‘प्राप्ता विसृज्य वसतीस्त्वदुपासनाशाः’ हमारे घर भी था, परिवार भी था; जहाँ तुम लौट जाने को कहते हो वह भी था, लेकिन अब हम उसको छोड़ आयीं। एक बार जो चीज वमन कर दी जाती है, उसको फिर खाया नहीं जाता; यह तो कुत्ते का स्वभाव होता है कि वह वमन किया हुआ आता है। कोई भी भलामानुष एक बार त्याग कर देगा, वैराग्य कर देगा, वासनाओं को छोड़ देगा, फिर उसे ग्रहण नहीं करेगा। हमने घर-परिवार का त्याग कर दिया है अब पुनः उसको कैसे ग्रहण करें। हम वसत नहीं, हम वासना छोड़कर आयी हैं। क्यों आयी हो? तो कहा-त्वदुपासनाशाःइसका दो तरह से आचार्यों ने अर्थ किया है। एक तो तुम्हारी उपासना की आशा लेकर आयी है, हमारे मन में फल की आशा नहीं है।
क्रमशः …….
प्रस्तुति
🌹🌻श्री कृष्णं वन्दे 🌻🌹
