#मैंजनकनंदिनी…4️⃣5️⃣भाग 3
( माता सीता के व्यथा की आत्मकथा)
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बरबस राम सुमन्त्र पठाये …
📙( रामचरितमानस )📙
🙏🙏👇🏼🙏🙏
मैं वैदेही !
सिवि दधीच हरिचंद नरेसा।
सहे धरम हित कोटि कलेसा ॥
धरमु न दूसर सत्य समाना।
आगम निगम पुरान बखाना ॥
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दृढ़ता ऐसी थी हमारे पूर्वजों की ………..कि स्वर्ग से गंगा तक पृथ्वी में ले आये ………………..
आप क्या कहेंगें महामन्त्री जी ! कि हम उस कुल के हैं ………..उस महान कुल के ……जिसमें रघु जैसे राजा भी हुए …..जिन्होनें सत्य के लिये सब कुछ दान में दे दिया था ।
आप कहिये ………..हम सत्य को त्याग दें ? या मेरे पिता महाराज त्याग दें ?
महामन्त्री कुछ उत्तर नही दे सके थे ।
निषाद राज !
पास में खड़े निषाद राज के कन्धे में अपनें पावन कर रखकर श्रीराम बोले थे । हे निषाद राज ! क्या आपके पास कोई रथ चालक है ?
भयउ निषादु विषाद बस देखत सचिव तुरंग।
बोलि सुसेवक चार तब दिए सारथी संग ॥
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हाँ नाथ !
निषाद राज नें सिर झुकाकर कहा था ।
मेरे इन पिता तुल्य सुमन्त्र जी को रथ में बिठाकर अयोध्या तक छोड़ आओ ।
ये सुनते ही हिलकियाँ और बढ़ गयी थीं …महामन्त्री सुमन्त्र की ।
मेरे श्रीराम समझते हैं ……..आज सुमन्त्र जी भाव जगत में ज्यादा ही गहरे गए हैं …….इसलिये ऐसी स्थिति में अकेले रथ चलाकर जाना उचित नही होगा ……..इसलिये श्रीराम नें निषाद राज से सारथि की माँग की थी ।
पास में गए थे महामन्त्री के……उनके स्कन्ध में अपनें कर रखकर श्रीराम नें कहा था……महाराज को मेरी और से प्रणाम करना हे तात सुमन्त्र ! । ये श्रीराम अपनें पूर्वजों के बताये सत्य मार्ग से कभी डिगे नही ऐसा आशीर्वाद दें आप ।
और कह देना उस स्त्रीलम्पट दशरथ से की अब तो प्रसन्न है वो ।
लक्ष्मण !
जोर से चिल्लाये थे श्रीराम, लक्ष्मण से .......क्यों की ये बात लक्ष्मण नें कही थी ।
लक्ष्मण चुप हो गए थे ।
पुनि कछु लखन कही कटु बानी।
प्रभु बरजे बड अनुचित जानी ॥
सकुचि राम निज सपथ देवाई।
लखन संदेस कहिअ जनि जाई ॥
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तात ! सुमन्त्र ……….लक्ष्मण नें जो कहा ………वो बात आप पिता जी से जाकर नही कहेंगें ……कहिये तात ! आप नही कहेंगें ना ?
सुमन्त्र जी को विरह व्याप रहा था……..वो हिलकियों से रो रहे थे
बरबस राम सुमंत्र पठाए।
सुरसरि तीर आपु चल आए ॥
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शेष चरिञ अगले भाग में………._
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जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥
ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥
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Niru Ashra: 🙏🥰 श्रीसीताराम शरणम् मम 🥰🙏
#मैंजनकनंदिनी… 4️⃣6️⃣भाग 1
(माता सीता के व्यथा की आत्मकथा)
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केवट मीत कहे सुख मानत…
( विनय पत्रिका )
क्या विलक्षणता है मेरे श्रीराम में !
मुझे हँसी आरही है उस अलबेले श्रीराम भक्त पे ……..
हाँ जब महामन्त्री सुमन्त्र को रथ में बिठाकर श्रीराम गंगा के किनारे आये ………तो वहाँ कोई नाव नही थी ………..बस दूर में एक नाव खड़ी थी …….उस नाव का केवट था वो – श्रीराम भक्त ।
मैं उसी केवट के बारे में बता रही हूँ ।
मेरे आश्चर्य की कोई सीमा नही रही उस समय ……..जब रघुवंश मणि श्रीराम नें उस केवट से नाव माँगी ।
मागी नाव न केवट आना।
कहै तुम्हार मर्म मै जाना ॥
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इन्द्र से रथ नही माँगा …………….जरूरत तो उतनी ही थी उस समय भी रथ की . ……जितनी जरूरत इस समय नाव की पड़ी ।
वो लंका का महाभीषण युद्ध ……….श्रीराम और उस रावण का युद्ध ।
और आश्चर्य की बात ये थी ……कि पैदल युद्ध कर रहे थे मेरे श्रीराम ….और रथ पर बैठा था रावण ।
उस समय इन्द्रादि देव आकाश में ही थे ………..इन्द्र नें प्रार्थना करते हुये कहा भी ………आपकी क्या सेवा करूँ !
पर श्रीराम नें इन्द्र से रथ माँगा नही ……….हाँ बाद में स्वयं रथ भेज दिया इंद्र नें, वो बात अलग है …….पर रथ माँगा नही ।
यहाँ एक केवट से नाव मांग रहे थे …………………
कहना ही होगा कि …….प्रेम के हाथों ही बिकना मेरे प्रभु श्रीराम को पसन्द है ……….।
मुझे याद है …….जब अवध में राज्याभिषेक हुआ ………चौदह वर्ष बाद राम राज्य की स्थापना हुयी ………तब वहाँ प्रश्न उठा था ।
आपको चौदह वर्ष के वनवास में मित्र तो बहुत मिले होगें ? आप जिसे अपना मित्र मानते हों वो कौन है ?
ये प्रश्न श्रीराम से किया गया था ………..उस समय मैने भी सुग्रीव की और ही देखा……और सुग्रीव भी तन कर खड़े हो गए थे ।
पर वो दृश्य बड़ा भावुक कर देनें वाला था ……….
उस समय श्रीराम उठे थे …………..धीरे धीरे चलते गए …..सुग्रीव को तो पक्का लग रहा था …….कि मेरे ही पास आयेंगें प्रभु ….पर नही ।
आगे विभीषण जी खड़े थे ……………उन्हें लगा मैं हूँ इनका मित्र !
पर नही ……सबसे पीछे बैठा हुआ था …………वो भोला केवट ।
उस दिव्य सभा में से श्रीराम नें केवट को उठाया ………और उसका हाथ पकड़ कर ऊपर अपनें साथ लेकर आये …….सबको दिखाया श्रीराम नें …….ये मिला मुझे मेरा मित्र ।
संकोच से गढ़ा जा रहा था वो भोला केवट ……………..
क्या प्रेममूर्ति हैं मेरे श्रीराम !……………इन्हें प्रेम की रज्जु के अलावा कोई अन्य बन्धन बाँध सका है क्या ?
जानत प्रिति-रीति रघुराई।
नाते सब हाते करि राखत, राम – सनेह सगाई।
केवट मीत कहे सुख मानत बानर बंधु बड़ाई॥
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प्रीति की रीति एक श्री रघुनाथ जी ही जानते हैं, श्री राम जी सब नातों को छोड़कर केवल प्रेम का ही नाता रखते हैं । केवट का मित्र कहे जाने पर आप प्रसन्न होते हैं,,,,, हे भाई रघुनाथ जी के समान प्रेम के बस रहने वाला तीनों लोको में और तीनों कालों में दूसरा कोई नहीं है ।
केवट ! केवट !
श्रीराम नें आवाज लगाई थी ।
निषाद राज नें भी आवाज लगाई …………….
पर केवट बैठा रहा …………अपनी मस्ती में बैठा रहा ।
हाँ इतना अवश्य बोला था केवट !
क्या बात है ! वहीं से बोलो !
नाव ले आओ ………………पल्ली पार जाना है !
मेरे श्रीराम नें ही उसे कहा था ।
वो उठा ………..एक पतवार जोर से मारी और नाव ले तो आया …….पर ।
जैसे ही मेरे श्रीराम बैठनें लगे थे नाव पर ……..वो केवट तुरन्त बोल उठा……….नही नही …………..मेरे पेट पर लात तो मत मारो ।
सब चौंके ………..मेरे श्रीराम चौंके थे ……..मैं , लक्ष्मण …..और निषाद राज भी ।
तेरे पेट में लात कौन मार रहा है भई !
निषाद राज नें केवट से कड़े शब्दों में पूछा था ।
किसी की आजीविका को छीन लेना ही तो पेट में लात मारना है …..क्या नही ? केवट का कहना सही था ।
क्रमशः …..
शेष चरिञ अगले भाग में……….
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जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥
ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥
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Niru Ashra: 🙏🥰 श्रीसीताराम शरणम् मम 🥰🙏
#मैंजनकनंदिनी… 4️⃣6️⃣भाग 2
(माता सीता के व्यथा की आत्मकथा)
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केवट मीत कहे सुख मानत…
( विनय पत्रिका )
जानत प्रिति-रीति रघुराई।
नाते सब हाते करि राखत, राम – सनेह सगाई।
केवट मीत कहे सुख मानत बानर बंधु बड़ाई॥
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प्रीति की रीति एक श्री रघुनाथ जी ही जानते हैं, श्री राम जी सब नातों को छोड़कर केवल प्रेम का ही नाता रखते हैं । केवट का मित्र कहे जाने पर आप प्रसन्न होते हैं,,,,, हे भाई रघुनाथ जी के समान प्रेम के बस रहने वाला तीनों लोको में और तीनों कालों में दूसरा कोई नहीं है ।
केवट ! केवट !
श्रीराम नें आवाज लगाई थी ।
निषाद राज नें भी आवाज लगाई …………….
पर केवट बैठा रहा …………अपनी मस्ती में बैठा रहा ।
हाँ इतना अवश्य बोला था केवट !
क्या बात है ! वहीं से बोलो !
नाव ले आओ ………………पल्ली पार जाना है !
मेरे श्रीराम नें ही उसे कहा था ।
वो उठा ………..एक पतवार जोर से मारी और नाव ले तो आया …….पर ।
जैसे ही मेरे श्रीराम बैठनें लगे थे नाव पर ……..वो केवट तुरन्त बोल उठा……….नही नही …………..मेरे पेट पर लात तो मत मारो ।
सब चौंके ………..मेरे श्रीराम चौंके थे ……..मैं , लक्ष्मण …..और निषाद राज भी ।
तेरे पेट में लात कौन मार रहा है भई !
निषाद राज नें केवट से कड़े शब्दों में पूछा था ।
किसी की आजीविका को छीन लेना ही तो पेट में लात मारना है …..क्या नही ? केवट का कहना सही था ।
भैया ! हम कहाँ तुम्हारी आजीविका छीननें वाले हैं ऐसे मत बोलो !
श्रीराम नें कहा था ।
आप अगर मेरी नाव में बैठोगे तो मेरी ये नाव रहेगी ?
ये क्या बात हुयी ? प्रभु श्रीराम के नाव में बैठते ही नाव गायब हो जायेगी ? लक्ष्मण नें कहा ।
अरे ! आप नही जानते ……….जब इनके चरण की धूल से पत्थर नारी हो सकती है……. शिला अहिल्या हो सकती है ………तो ये तो लकड़ी की नाव है…….हो ही जायेगी नारी मेरी नाव……..अब बताइये मेरी आजीविका खतम हुयी की नही ?
छुअत शिला भइ नारि सुहाई।
पाहन ते न काठ कठिनाई ॥
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पर कुछ भी कहो …….मुझे भी केवट बहुत भोला लगा ………….मुझे हँसी आरही थी ………….पर मेरे श्रीराम भी मन्द मुस्कुराये थे ।
जब से हम लोग अयोध्या से चलें हैं…….तब से रोना, गम्भीरता ये सब चल ही रहा था………पर यहाँ केवट ऐसा विचित्र मिला ………..जिसनें मेरे श्रीराम को हँसा दिया …………..और जैसे ही श्रीराम हँसें …….मैने मन ही मन केवट को धन्यवाद कहा था ।
तो कोई उपाय ?
निषाद राज नें सहजता से पूछा ।
रघुराई हे रघुराई पद धोकर नाव चढ़ाइयो।
बिनु पद धोय सुनो प्रभु, नहीं गंगा पार करईहो ॥
तब चरण की महिमा न्यारी, परत पाय पाथर भई नारी ।
मोरी नैया काट की नैया पद धोकर नाव चढ़ाइयो॥
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अब उपाय तो एक ही है …………….ये अपनें पैर धोनें दें ………..अच्छे से धोऊंगा ………क्यों की मिट्टी का एक भी कण नही रहना चाहिये ……..मिट्टी का एक कण भी इनके पाँव में रह गया …….तो बस नारी हो जायेगी मेरी नाव ।
निषाद राज भी हँसे …………………
दूसरा उपाय ?
श्रीराम नें मुस्कुराते हुये पूछा था ।
अब दूसरा उपाय तो यही है …….कि उस तरफ से आप जाइए …..और………फिर सोच में पड़ गया केवट…….फिर स्वयं ही सिर हिलानें लगा ……..नही नही आपसे ये काम नही होगा ।
नही……कोई दूसरा उपाय नही…..बड़े भोलेपन से बोला था केवट ।
पर पहले तुम कुछ सोच रहे थे ………मेरे विचार से तुम दूसरा कोई उपाय सोच रहे थे ? श्रीराम को भी इस प्रेमी भक्त से उलझनें में आज आनन्द आरहा था ।
नही ………कोई उपाय नही है…….मैने सोचा था कि आप उधर से तैरते हुये निकल सकते हैं ………पर नही आपको तैरना कहाँ आता है ।
एहि घाट ते थोरिक दूरि अहै कटि लौ जलु थाह देखाइहौ जू।
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*केवट कहता है— इस घाट से थोड़ी ही दूर पर केवल कमर पर जल है , चलिए ,,, मैं थाह दिखला दूंगा,,, ( मैं नाव पर तो आपको ले नहीं जाऊंगा क्योंकि यदि अहिल्या के ।
क्रमशः …..
शेष चरिञ अगले भाग में……….
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जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥
ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥
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