श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! ब्रह्मा द्वारा नन्दनन्दन की स्तुति – “ब्रह्मस्तुति” !!-भाग 15 : Niru Ashra

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श्रीकृष्णचरितामृतम्

!! ब्रह्मा द्वारा नन्दनन्दन की स्तुति – “ब्रह्मस्तुति” !!

भाग 15

इन लीलाओं का मुझे दिखाना ये भी आपकी कृपा ही है मेरे प्रति ।

नाथ ! आपकी कृपा तो निरन्तर बरस ही रही है…….इसलिये कृपा की प्रतीक्षा नही करनी …..समीक्षा करनी है ……क्यों की सब कृपा है ।

मूर्ख है ये जीव ………ये सुख को तो कृपा समझता है …पर दुःख को कृपा नही मानता …….. वो ये नही सोचता कि …….दुःख तो परमकृपा है आपकी ……इस दुःख से ही तो जन्मांतरों के पाप ताप हमारे नष्ट होते हैं …….तब प्रेम के पुष्प खिलते हैं…….ब्रह्मा जी स्तुति कर रहे है ।

जाओ हम तुमसे नही बोल रहे ……..नन्दनन्दन नें मुँह फुला कर कहा ।

ब्रह्मा फिर उन ग्वाल सखाओं द्वारा सेवित चरणों में अपना मुकुट झुकानें लगे ………….

नाथ ! एक बात हम पूछ रहे हैं आप उत्तर दीजिये !

ब्रह्मा नें प्रश्न किया ।

हाँ पूछो …………मुँह मोड़ते हुए कन्हैया नें कहा ।

ये बृजवासी आपके सखा आपसे इतना प्रेम करते हैं ………आप इनको क्या दोगे इसके बदले में ?

तुमसे मतलब ब्रह्मा ! नन्हे से सुकुमार नें टका सा जबाब दिया ।

नहीं , फिर भी ……बताइये तो ! क्या देंगे इनके प्रेम के बदले में ?

कन्हैया बोले………मुक्ति दे देंगे !

मुक्ति देंगे ? हँसे ब्रह्मा ।

मुक्ति तो आपनें मारनें के लिये आई पूतना को भी दी…….उसके पूरे खानदान को दी ……..फिर वही मुक्ति इनको भी ?

प्रेम करनें वालों को भी मुक्ति ….और द्वेष रखनें वालों को भी ?

ब्रह्मा नें व्यंग किया ।

फिर ?

आहा ! अपनें प्रिय ग्वाल सखाओं की बातें सुनकर ये कितनें प्रसन्न हो गये थे ।

फिर हम क्या दें ब्रह्मा ? मासूमियत से पूछ रहे थे ब्रह्मा से ही ।

बस, भगवन् ! प्रेम के बदले देंने के लिये आपके पास कुछ नही है ………आपको तो इन बृजवासियों का ऋणी होकर ही रहना पड़ेगा ।

फिर ब्रह्मा भाव विभोर हो गए ………और कहनें लगे –

इन ग्वाल बालों की बातें मैं कहाँ तक करूँ ……….इनके भाग्यों को देखकर तो मैं ही ईर्ष्या से भर उठा था …….आहा ! पूर्णब्रह्म को इन्होंनें अपना सखा बना लिया ………..ये सौभाग्य किसे मिला है ।

ब्रह्मा रोते रहे ….चरणों में गिड़गिडाते रहे …..पर कन्हैया का हृदय पसीजा नही …………….

तात ! ब्रह्मा नें अब देखा कन्हैया तो मुझे देखकर और क्रोध से भर रहे हैं ……..कहीं ऐसा न हो कि मुझ से कह दें ……विधाता ! अब तुम ब्रह्मा की गद्दी के लायक नही रहे ……छोड़ दो ये ब्रह्मा पद ।

डरके मारे उठे ब्रह्मा ………और तीन परिक्रमा की नन्दनन्दन की ।

पर तीन परिक्रमा क्यों ? विष्णु, राम, कृष्ण इन की तो चार परिक्रमा होती है ना ! प्रश्न किया विदुर जी नें ।

“डर से”……..उद्धव नें उत्तर दिया ।

डर गए थे अंदर से ब्रह्मा……..उन्हें लगा – कहीं मुझे ब्रह्मा पद से ही न हाथ धोना पड़े …….इसलिये मात्र तीन परिक्रमा ही देकर भागे ।

हँसे विदुर जी……और बोल उठे – नन्दनन्दन आपकी सदा हीं जय हो ।

क्रमशः…

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