रिश्ते जो नही होते उनकी भरपाई मुमकिन है पर जो होते हुए भी नही होते उनकी भरपाई नामुमकिन : Vimla Devi G Mewada

नही होते उनकी भरपाई मुमकिन है पर जो होते हुए भी नही होते उनकी भरपाई नामुमकिन
रिश्ते होकर भी न होना और वाकई में न होने में बहुत बड़ा फर्क है,, जो नही होते उनकी भरपाई मुमकिन है पर जो होते हुए भी नही होते उनकी भरपाई नामुमकिन
🌹🌹कभी कभी कुछ रिश्तों की कमी खलती है , इसका मतलब ये नही की वो हमारे पास नही या हमारे नही,, या फिर इस दुनिया में नही ! लेकिन कभी ऐसा भी होता है रिश्ते हमारे पास होते है , साथ होते है, मौजूद होते है फिर भी उनके न होने की कमी खलती है क्योंकि वो रिश्ते सिर्फ होते है पर हमारे साथ नही होते…. उनकी नजदीकियां दूरियों से कहीं ज्यादा दूर होती है, उनकी मौजूदगी अजनबियों से कहीं ज्यादा अजनबी होती है, उनका साथ रहना/होना। … न होने से कहीं ज्यादा खाली होता है ।
ऐसे रिश्तों की कमी हमे हरवक्त खलती है, हम लाख कोशिश करते है पर हम उनके लिए वो नही होते जो असल मे हम लोगों या समाज की नजरों में होते है, हम कई बार समाजिक ताना बाना समेटे होते है जबकि हम अंदर ही अंदर दरक चुके होते, मर चुके होते ….
हम साथ होकर भी साथ नही होते, हम सुख दुख के साथी नही बनते, हम बातिन एकदूसरे से जाहिर नही होते, हम अच्छाइयों में बुराइयां, और बुराइयों में कमियां ढूंढते रहते,,, कई दफा हमे लगता है ये गलत है, पर हमारा अहम हमे कभी झुकना नही सिखाता इसलिए चाहकर भी हम गलत को गलत नही कह पातें, फिर हम दोषारोपण करने लगते,, पर इन सबमें कुछ टूट जाता वो रिश्ता जो हमारा होता, जिसपर हमारा अधिकार होता वर्चस्व होता,,, हम उसकी रिक्तता महसूस करते है यह कहकर हमारा भाई ऐसा नही, बहन ऐसी नही, भाभी ऐसी नही, जेठानी/ देवरानी , दोस्त पड़ोसी कोई भी हो सकता वो….. क्या उसकी जगह कोई दूसरा ले पाता? नही न!
उसकी भरपाई नही होती, उनकी कमी खलती है फिर भी हम ताउम्र उस रिक्तता अभाव में जी लेते पर उनके साथ होकर उनके साथ जीना नही सीखते!
रिश्ते होकर भी न होना और वाकई में न होने में बहुत बड़ा फर्क है,, जो नही होते उनकी भरपाई मुमकिन है पर जो होते हुए भी नही होते उनकी भरपाई नामुमकिन है।।❤️❤️

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