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August 30, 2025 1:03 am

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“साथ चलने वाले सभी साथ नहीं निभाते :सच्चा साथी एक वरदान ” : Dr.Sethi

“साथ चलने वाले सभी साथ नहीं निभाते :सच्चा साथी एक वरदान ”

जीवन एक यात्रा है, जो अनुभव की परतों में बुनी हुई है, जहाँ मिलना और जुड़ना स्वाभाविक है। इस मार्ग पर हम अनगिनत लोगों से मिलते हैं, कुछ क्षणिक, कुछ स्थायी, और कुछ विरले, जो समय और दूरी से परे हमारे साथ बने रहते हैं। लेकिन जो हमारे साथ चलते हैं, वे सभी वास्तव में हमारे सहयात्री नहीं होते। एक भीड़, एक मित्र और एक सच्चे सहयात्री के बीच का अंतर हमें मानवीय संबंधों की गहराई, मित्रता की परिभाषा और वास्तविक समर्पण के अर्थ को समझने की कुंजी प्रदान करता है।

भीड़: एक मृगतृष्णा

भीड़ एक छलावा है, साथ होने का भ्रम, चेहरों का एक झुंड, एक विशाल महासागर जिसमें गहराई नहीं होती। यह केवल उपस्थिति की दिखावट है, जिसका केंद्र शून्यता से भरा होता है। भीड़ केवल समृद्धि में साथ होती है, लेकिन संकट में गायब हो जाती है। यह सतही होती है, अस्थिर होती है, और क्षणिक नवीनता से प्रभावित होती है।

डॉ. सेठी कहते हैं, “भीड़ आपकी जीत पर जय,जय कार करेगी, लेकिन आपकी हार पर आंसू नहीं बहाएगी। यह आपके लिए नहीं, बल्कि आपके जीवन के तमाशे के लिए आती है।”

इतिहास गवाह है कि कैसे भीड़ ने अनेक महान हस्तियों को पहले पूज्य बनाया और फिर उन्हें गिरा दिया। जूलियस सीज़र, जिसे रोम के लोग सिर आँखों पर रखते थे, उन्हीं के द्वारा पीठ में छुरा घोंपा गया। वही लोग जो कभी उनका नाम जयकारों में बुलाते थे, वही उन्हें दोषी ठहराने लगे।

आज के युग में भी यह चक्र दोहराया जाता है। सितारे, राजनेता और प्रसिद्ध हस्तियाँ जनता के समर्थन से शिखर पर पहुँचते हैं, लेकिन फिर वही भीड़ उन्हें गिरा देती है। सोशल मीडिया इस अस्थिरता को उजागर करता है—आज कोई नायक है, कल वह भुला दिया जाता है, या उससे भी बुरा, बदनाम कर दिया जाता है।

मित्र: एक कदम और आगे

मित्र भीड़ नहीं होता, लेकिन वह सच्चा सहयात्री भी नहीं होता। एक मित्र हमारे साथ चलता है, हमारे सुख-दुःख का साझेदार होता है, लेकिन हर मित्र जीवनभर साथ नहीं रहता। मित्रता परिस्थितियों, साझा अनुभवों और आपसी लाभ पर आधारित होती है। स्कूल, कार्यस्थल या संघर्ष में बनी मित्रताएँ समय के साथ फीकी पड़ सकती हैं।

डॉ. सेठी कहते हैं,
“मित्र कुछ समय के लिए आपका हाथ पकड़ सकता है, लेकिन सच्चा सहयात्री आपकी आत्मा को जीवनभर थामे रखता है।”

अगर हम हर मित्रता में स्थायित्व की उम्मीद करते हैं, तो यह निराशा को आमंत्रण देने जैसा है। मित्रता का अंत दुखद नहीं है; दुखद यह है कि हम इसे हमेशा के लिए मान लेते हैं।

सच्चा सहयात्री: आत्माओं का मिलन

भीड़ की क्षणभंगुरता और मित्रता की नाजुकता के परे कुछ और मूल्यवान, कुछ पवित्र होता है—एक सच्चा सहयात्री।

सच्चा सहयात्री केवल हमारे साथ नहीं चलता, बल्कि हमारे साथ जीता है।
उसकी उपस्थिति सुविधा पर आधारित नहीं होती, न ही उसकी निष्ठा परिस्थितियों पर निर्भर करती है। वह तब भी रहता है जब अंधेरा घिर आता है, जब मार्ग कठिन हो जाता है, जब जीवन की राह अनिश्चित हो जाती है।

डॉ. सेठी अपने अनुभव से कहते हैं,
“सच्चा सहयात्री मीलों की गिनती नहीं करता, न ही यात्रा की दूरी पूछता है। वह रहता है क्योंकि उसकी यात्रा तब तक अधूरी है जब तक आपकी यात्रा पूरी नहीं होती।”

ये रिश्ते साझा उद्देश्य, स्थायी विश्वास और शब्दों से परे एक गहरी आत्मीयता से बनते हैं। सच्चा सहयात्री न तो निरंतर आश्वासन मांगता है, न ही स्पष्टीकरण। वह बस होता है—मित्रता से अधिक, कर्तव्य से भी आगे—यह आत्माओं का संगम और भाग्य का बंधन होता है।

सच्चे सहयात्री का अमिट बंधन

इतिहास में ऐसे कई उल्लेखनीय बंधन मिलते हैं—सुकरात और प्लेटो, हेलेन केलर और ऐनी सुलिवन, गांधी और कस्तूरबा। ये केवल मित्र नहीं थे; ये ऐसे सहयात्री थे जिनका एक-दूसरे के बिना अस्तित्व ही अधूरा था।

सच्चा सहयात्री आपके साथ इसलिए नहीं रहता कि उसे कुछ प्राप्त होता है, बल्कि इसलिए रहता है क्योंकि उसकी यात्रा आपकी यात्रा से जुड़ी होती है।

डॉ. सेठी स्पष्ट करते हैं,
“सच्चा सहयात्री वचनबद्धता से नहीं, बल्कि उद्देश्य से जुड़ा होता है। उसे बुलाने की आवश्यकता नहीं होती; वह स्वयं ही आ जाता है।”

समझने की भूल और सच्चा ज्ञान

लेकिन जीवन का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि हम अक्सर इन तीनों को एक मान लेते हैं। हमें भीड़ का भ्रम होता है, मित्रों पर अटूट विश्वास होता है, और जब ये दोनों हमें छोड़ देते हैं, तब हम मानव संबंधों की प्रकृति पर प्रश्न उठाते हैं।

डॉ. सेठी सलाह देते हैं,
“उनकी तलाश मत करो जो तुम्हारे आने पर उत्सव मनाते हैं; उनकी तलाश करो जो तुम्हारे जाने पर शोक व्यक्त करते हैं। उन लोगों को मत देखो जो तुम्हारी आग में बैठते हैं, बल्कि उन्हें देखो जो तुम्हारे जाने के बाद भी तुम्हारे लिए आग जलाने को तैयार हैं।”

सच्चे जुड़ाव की वास्तविकता

समाज हमें भीड़ की मान्यता पाने के लिए प्रेरित करता है। सोशल मीडिया, कार्यस्थल की सराहना, और सार्वजनिक स्वीकृति हमारी मूल्य प्रणाली बन जाती हैं। लेकिन यह सब एक छलावा है। वास्तविक जुड़ाव संख्याओं में नहीं, बल्कि गहराई में पाया जाता है।

कोई लाखों अनुयायी रख सकता है फिर भी अकेला महसूस कर सकता है। एक नेता पूरे राष्ट्र पर शासन कर सकता है, फिर भी एक ऐसा व्यक्ति न पा सके जो उसे वास्तव में समझता हो।

सच्चे सहयात्री की दुर्लभता

अगर हम भाग्यशाली हैं, तो जीवन में हमें एक सच्चा सहयात्री अवश्य मिलता है—कोई जो हमें वैसे देखता है जैसे हम वास्तव में हैं, जो हमारी असफलताओं, परिवर्तनों और जीवन की उलझनों के बीच हमारे साथ चलता है।

डॉ. सेठी कहते हैं,
“सच्चा सहयात्री कोई विकल्प नहीं होता; वह हमारा भाग्य होता है। वह इसलिए हमारे साथ नहीं चलता कि उसे चलना है, बल्कि इसलिए चलता है कि वह हमारी यात्रा को अपने बिना अधूरा समझता है।”

निष्कर्ष

जीवन की यह यात्रा गंतव्य से अधिक इस पर निर्भर करती है कि हमारे साथ कौन चलता है। अगर इस भीड़ भरी दुनिया में, जहाँ लोग मौसम की तरह बदलते हैं, हमें एक भी आत्मा मिल जाए जो वास्तव में हमारे साथ रहे, तो हमने कुछ अमूल्य पा लिया है।

क्योंकि इस संसार में, जहाँ भीड़ बिखरती है, मित्र बदलते हैं, वहाँ सच्चा सहयात्री ही सबसे दुर्लभ और अनमोल उपहार होता है।

~ डॉ. सेठी के.सी.
दमन, भारत | ऑकलैंड, न्यूज़ीलैंड

“Not All Who Walk Beside Us Stay: A True Companions is a Blessing

Life is a path we live in layers of experience, meeting and attachment. On this path, we meet many people, some transient, some enduring, and an occasional few who live on across time and space. But not everyone who walks along with us is present. There is a vast gap between a crowd, a buddy, and a traveling companion, and the differences between them hold the secret to appreciate the depth of human relationship, the definition of friendship, and the nature of serious commitment.

The crowd is an illusion; a mirage of belonging, a faces show, a broad ocean with no depth. It is a fake togetherness, with an emptiness at its heart. The crowd is there in prosperity and missing in adversity. The crowd is shallow, volatile, influenced by fads, ease, and ephemeral novelty. It takes direction but not endurance. A person can stand before thousands yet still be vastly isolated.

Dr Sethi says, “A crowd will cheer your victories, but it will not weep over your defeats. It does not come for you but for the show of your life.”

The crowd is the simplest to locate but the most difficult to believe. It lifts individuals to greatness with one hand and brings them down with the other. History is replete with innumerable instances, heroes overnight villains, icons discarded the moment their usefulness is gone. Julius Caesar, who was once hailed by the Roman people, was stabbed in the back by those around him. The same mouths that once cried his name in adoration became a cacophony of condemnation. The same hands that raised him were the same that brought him down.

Even in today’s world, we observe this cycle repeats itself. Stars, politicians, and celebrities achieve stardom by popular support, to be then rent asunder by the very crowd that put them up there. Social media highlights this fickleness, a day as a hero, a day after being forgotten, or even worse, reviled. The crowd is transitory, its support conditional, its interest ephemeral.

A friend, though, is a step further than meaning. A friend is neither the crowd, yet nor a fellow traveler. A friend walks with us, shares our joys, sorrows, and passing moments. They are warmth, comfort, and understanding. Not all friendships, however, are meant to last. A friend can hold our hand for a while, but not all friends are meant to walk with us for life.

The friendships are usually ruled by circumstance, shared experience, and mutual gain. Friendships in school, at work, and in the midst of hardship, all are valid, but many dissolve with distance, change, or the mere passage of time. The tragedy lies not in their transience, but in our assumption that they will last forever.

Dr Sethi says, “A friend will hold your hand for a season, but a fellow traveler will hold your soul for a lifetime.”

To look for permanence in all friendships is to ask for disappointment. The pain of being apart frequently results not from the separation itself, but from refusal to acknowledge that some individuals are destined to be with us only for a part of our book. The enlightened learn to value friendships for what they are lovely, fleeting gifts, not commitments for forever.

But above the transience of the crowd and the fragility of friendship is something precious, something near holy a fellow traveler.

A fellow traveler does not walk alongside us; he/she walks with us. His/her presence is not determined by convenience, his/her loyalty by circumstance. He/she stays when the laughter stops, when the path is fraught with danger, when night falls. His/her understanding is unspoken but deep, his companionship unshakeable.

Based on his personal experience , Dr Sethi again speaks, “A fellow traveler does not calculate the miles, nor inquire of the distance of the road. They remain because their path is not whole without yours.”

These bonds are created in the fire of common purpose, abiding trust, and a connection that speaks beyond words. A fellow traveler does not require constant reassurance, nor do they ask for explanations. They just are. This is more than friendship, more than duty; it is the convergence of souls, the entwining of fates.

The Unbreakable Bond of Fellow Travelers

History is full of such remarkable bonds. Socrates and Plato, Helen Keller and Anne Sullivan, Gandhi and Kasturba. These were not friendships; they were pilgrimages that could not be severed without their meaning being lost. They were not companions united by chance, but by mission.

A fellow traveler doesn’t remain because of what they get; they remain because your journey and theirs are entangled. They don’t want to alter your path but to grasp it, to journey with you, even when the path steepens and the way becomes obscure.

Dr Sethi explains in his words “A fellow traveler is not bound by commitment but by mission. They don’t have to be invited; they just show up.”

But life’s great tragedy is that we so often mistake one for the other. We believe the crowd, for their presence speaks of importance. We set hope on friends, for we know they will never depart. And when both have vanished, we wonder at the nature of humanity’s bonding. We lament abandonment, betrayal, and the ensuing loneliness when friendly faces turn aside.

But wisdom is knowing the truth, not everybody who walks with us is to walk with us for always. Some people come into our lives to give us lessons. Some give us short, sweet moments. And a few precious souls stay, through every storm, every victory, and every silence.

Dr Sethi suggests in his words “Do not look for those who celebrate your arrival; look for those who mourn your departure. Not those who sit at your fire, but those who will build one when yours is gone.”

The Illusion of Belonging and the Reality of True Connection

Society tends to make us seek validation from the crowd. Social media, workplace acknowledgment, and public approval become metrics of value. But this is an illusion. Real belonging is never discovered in numbers, but in depth. It is not about how many people are around us, but about the quality of the relationships we possess.

Someone might have many followers but still feel isolated. A leader could control nations yet fail to win a single soul who comprehends them. In the end, it is not applause from masses but the stand of one for whom all applauds die.

The Rarety of a Fellow Traveler

In a lifetime, if we’re lucky, we’ll have at least one traveling companion. That is the one who looks at us not for what we would like to be, but for what we actually are. He/she travels with us through failure, through change, through all the intricacies of life.

According to Dr Sethi “A real fellow traveler is not an option; they are a fate. They do not travel with you because they have to; they travel with you because they cannot envision the path without you.”

And so the journey we travel is not as much about where we are headed as it is about who shares the path with us. If, out of the billions that come and go, we happen to find even one soul who stays,who actually stays, then we have gained something irreplaceable.

For in a world where crowds congregate and scatter like vagrant winds, where friendships flit and vanish like fleeting seasons, a true fellow traveler is the most exquisite and precious gift of all.

Dr Sethi K.C.(Author)
Daman,India
Auckland, New Zealand

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Author: admin

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