Niru Ashra: 🙏🥰 श्री सीताराम शरणम् मम 🥰 🙏
🌺भाग>>>>>>> 1️⃣1️⃣1️⃣🌺*
मै जनक नंदिनी ,,,भाग 1
*(माता सीता के व्यथा की आत्मकथा)*
🌱🌻🌺🌹🌱🥰🌻🌺🌹🌾💐
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।।
“वैदेही की आत्मकथा” गतांक से आगे –
मैं वैदेही !
राम ! राम ! राम ! राम !
यही जपते हुये मैं बैठी थी कि तभी –
“सुनो श्रीराम कहानी”
ये मधुर आवाज गूँजी मेरे कानों में ……………….
कौन ? मैं उठी …………मैं चारों और देखनें लगी ………….पर चारों ओर तो राक्षसियाँ सो रही थीं ………एक भी ऐसी नही थी जो जगी हो ।
“प्रभु श्रीराम का अवतार हुआ अवधपुरी में”
मुझे रोमांच हो रहा था ………………सच में कोई अत्यंत मधुर बोली में मेरे श्रीराम की कहानी सुना रहा था ………..
“प्रभु श्रीराम का जन्म हुआ अवध में ……………….साथ में जन्में भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न …………
विश्वामित्र जी के साथ आश्रम गए …………….जाते जाते तड़का को मार ……………धनुष यज्ञ में जनकपुर पधारे ………………शिव धनुष को तोड़कर सिया सुकुमारी से विवाह रचाया “
मुझे रोमांच हो रहा था …………….कितनी मधुर और संक्षिप्त में ।
सुनाओ ! क्यों रुक गए आगे सुनाओ ना ………………मैने चारों ओर देखते हुये कहा ……………….
“महाराज दशरथ ……….जिनकी तीन रानियों में एक रानी कैकेई ……वरदान मांग लिया ………राम को चौदह वर्ष का वनवास ……..और भरत का राज्य”
“विपदा भारी आ खड़ी हुयी थी अवध में …….क्यों की राम वन जानें लगे थे ……पर साथ में सीता जी भी चलीं …….और भाई लक्ष्मण भी”
मेरे मन में यही सब चल रहा था ………..कौन है ये ? कौन होगा ?
मुझे शोक के सागर से उवारनें वाला ये कौन है ?
“वन में दुःख सहे …..कष्ट सहे इन तीनों नें …………चित्रकूट में निवास करते हुए बहुत समय व्यतीत हो गया …………..तो वहाँ से आगे चल दिए …दक्षिण की ओर ……..जहां राक्षसों का आतंक था …….जहाँ ऋषि मुनि असुरक्षित थे …….दण्डकारण्य ……….पंचवटी में अपना निवास बनाया श्रीराम नें”
ये कहीं दशानन रावण तो नही ?
मुझे छलनें के लिये श्रीराम कथा सुना रहा हो ?
मेरे मन में कई बातें एक साथ आरही थीं ।
“तभी – राक्षस रावण आया…………..तपस्वी का भेष बनाकर …….
बहाना था भिक्षा का ………………..साधू भेष का सम्मान करते हुए सीता जी भिक्षा देनें बाहर आयीं ……………पर ये तो था राक्षस ……..सीता को अपनें रथ में बिठा लिया ……………सीता रोईँ ……..सीता चिल्लाईं ……मुझे बचाओ ….मुझे बचाओ …”
मैं सुन रही थी ………बड़े ध्यान से सुन रही थी …………अभी भी मुझे सन्देह था कि कहीं मायावी रावण तो नही !
पर तभी रामकथा रुक गयी …………….सिसकियां मुझे सुनाई पड़नें लगीं ……………जिस वृक्ष के नीचे में थी ……उसी वृक्ष पर ही कोई था ……….टप्प टप्प टप्प ………आँसू गिरनें लगे थे मेरे पाँव में ।
हे राम भक्त ! आजाओ नीचे ! आजाओ ………….
क्यों की रावण विद्वान है ……….पर सम्वेदनशील नही है ………….भावुक नही है …………रावण रो नही सकता ……हाँ रुला सकता है ………..इसलिये तो इसका नाम “रावण” रखा था इसके पिता नें ……जो दुनिया को रुलाये वह रावण ……..पर ये सज्जन जो थे ये तो रो रहे थे ……….बड़ा कोमल है इनका हृदय !
मैनें कहा – इसलिये ही कहा था आजाओ ! रामभक्त ! आजाओ…….
जय श्रीराम !
बडी जोर से गर्जना करते हुये वो कूदे थे अशोक वृक्ष से ।
ओह ! मैं चकित थी……..त्रिजटा नें जिस वानर का वर्णन किया था वो यही तो……..मैं देखती रह गयी थी……….कनकमय देह था …….शरीर बलिष्ठ था …….लाल मुख………और पीछे पूँछ निकली हुयी थी ………….।
क्रमशः …..
शेष चरित्र कल …..!!!!!
🌹जय श्री राम 🌹
[] Niru Ashra: श्री भक्तमाल (126)
सुंदर कथा ८० (श्री भक्तमाल – श्री खुशाल बाबा जी ) भाग 01
खान देशमें (वर्तमान गुजरात महाराष्ट्र सीमा ) फैजपुर नामका एक नगर है । वहाँ डैढ़ सौ साल पहले तुलसीराम भावसार नामक श्री कृष्ण पंढरीनाथ जी के एक भक्त रहते थे । इनकी धर्मपरायणा पत्नी का नाम नाजुकबाई था । इनकी जीविका का धन्धा था कपडे रँगना। दम्पती बड़े ही धर्मपरायण थे । जीविका मे जो कुछ भी मिलता, उसीमें आनन्द के साथ जीवन निर्वाह करते थे । उसीमे से दान धर्म भी किया करते थे ।
इन्हीं पवित्र माता पिता के यहाँ यथासमय श्री खुशाल बाबा का जन्म हुआ था । बचपन से ही इनकी चित्तवृत्ति भगवद्भक्ति की ओर झुकी हुई थी । भगवान् के लिए नृत्य और कीर्तन करके उन्हें रिझाते और उनकी लीलाओं को सुनकर बड़े प्रसन्न (खुश ) होते , खुश होकर हँसते और मौज में नाचते रहते । इसी से सबलोग इनको खुशाल बाबा कहते थे । यथाकाल पिता ने इनका विवाह भी करा दिया । इनकी साध्वी पत्नी का नाम मिवराबाई था।
दक्षिण मे भारत का दूसरा वृंदावन श्री क्षेत्र पंढरपुर बहुत प्रसिद्ध है । वहाँ आषाढ और कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को बडा मेला लगता है । वैष्णव भक्त दोनो पूर्णिमाओं को यहाँ की यात्रा करते है । उन्हें वारकरी कहते है और यात्रा करने को कहते है वारी । ऐसो ही एक पूर्णिमा को श्री खुशलबाबा ‘वारी’ करने पंढरपुर आये । श्रद्धा भक्ति से भगवान् विट्ठलके दर्शन किये और मेला देखने गये । उन्होने देखा कि एक दूकान में श्री विट्ठल का बडा ही सुंदर पाषाण विग्रह है । बाबा के चित्त मे श्री विट्ठलनाथ के उस पाषाण विग्रह के प्रति अत्यंत आकर्षण हो गया । उन्होने सोचा पूजा अर्चा के लिये भगवान् का ऐसा ही विग्रह चाहिये । उन्होचे उसे खरीदने का निश्चय किया और दूकानदार उस विग्रह का मूल्य पूछा ।
दूकानदार ने विग्रह के जितने पैसे बताये, उतने पैसे बाबा के पास नहीं थे । दूकानदार मूल्य कम करनेपर राजी नहीं था । बाबा को बडा दुख हुआ । उन्होने सोचा अवश्य ही मैं पापी हूं। इसीलिये तो भगवान् मेरे घर आना नहीं चाहते । वे रो रोकर प्रार्थना करने लगे – हे नाथ ! आप तो पतितपावन हैं । पापियो को आप पवित्र करते हैं । बहुत से पापियो का आपने उद्धार किया हे , फिर मुझ पापीपर हे नाथ ! आप क्यो रूठ गये ? दया करो मेरे स्वामी ! मैं पतित आप पतितपावन की शरण हूँ।
बाबा ने देखा एक गृहस्थ ने मुंहमांगा दाम देकर उस पाषाण विग्रह को खरीद लिया है । अब उस विग्रह के मिलने की कुछ आशा ही नहीं है । बाबा बहुत ही दुखा हो गये । उस विग्रह के अतिरिक्त उन्हे कुछ भी अच्छा नहीं लगता था , उनका दिल तो उसी विग्रह की सुंदरता ने चूरा लिया था । उनके अन्तश्चक्षु के सामने बार बार वह विग्रह आने लगा । खाने पीने की सुधि भी वे भूल गये । रात को एकादशी का कीर्तन सुनने के बाद वह गृहस्थ उस पाषाण विग्रह को एक गठरी में बांधकर और उस गठरी को अपने सिरहाने रखकर सो गया । खुशाल बाबा भी श्री विट्ठल भगवन का नाम स्मरण करते हुए एक जगह लेट गये ।
भगवान् विट्ठल ने देखा कि खुशाल बाबा का चित्त उनमें अत्यधिक आसक्त है और वे हमारी सेवा करना चाहते है। विग्रह के बिना बाबा दुखी हो रहे थे । भक्त के दुख से दुखी होना यह भगवान् का स्वभाव है । गीता में उन्होने अपने श्रीमुख से कहा है- ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । इस विरुद के अनुसार खुशाल बाबा के पास जाने का प्रभु ने निश्चय किया । मध्यरात्रि हो गयी । गृहस्थ सो रहा था । भगवान बड़े विचित्र लीलाविहारी ही, उन्होंने लीला करनेकी ठानीे । वे उस गठरी से अन्तर्धान हो गये और खुशाल बाबा के पास आकर उनके सिरहा ने टिक गये ।भगवान् कहने लगे – ओ खुशाल ! मै तेरा भक्ति से प्रसन्न हूं । देख मैं तेरे पास आ गया। बाबा ने आँखे खोली । भगवान् को अपने सिरहाने देखकर उन्हें बहुत हर्ष हुआ । वे प्रेम में उन्मुक्त होकर नाचने और संकीर्तन करने लगे ।
सुबह वह धनिक भी जागा, उसने अपनी गठरी खोली । देखा तो अन्दर श्रोविट्ठल का विग्रह नही है । वह चौंक गया । वह उसकी खोज मे निकला । घूमते घूमते वह बाबा के पास अस्या । उसने देखा श्रीविग्रह हाथ में लेकर खुशाल बाबा नाच रहे है । उसने बाबापर चोरी का आरोप लगाया और उनके साथ झगडने लगा । बाबा ने उसे शान्ति के साथ सारी परिस्थिति समझा दी और विग्रह उसे लौटा दिया ।
शेष भाग कड़ी संख्या 127 में देखें
[] Niru Ashra: “श्रीकृष्णसखा ‘मधुमंगल’ की आत्मकथा-26”
( ‘नाचै नन्दलाल’ – एक अद्भुत झाँकी)
मैं मधुमंगल ……
आज पहली बार मेरे लाला ने नृत्य कियौ है । और ग्वालिनन की परिक्रमा हूँ करी है । घूम्यो है ग्वालिनन के चारौ ओर …और इतनौं ही नहीं …जे अहीर की छोरियाँ , लाला ते अपनी पादुका हूँ उठवामें , अपने काजे बैठवै कौ पीढ़ो मँगवामें । विचारौ मेरौ लाला , इनके काजे सबरे कामन कूँ कर रह्यो है ।
फिर मैं देखूँ आकाश माहूँ तौ…..वहाँ तौ भीर लगी है देवगणन की…बिनकी पत्नियन की । गन्धर्व हूँ नभ में ठाढे हैं…..तौ बिनकी पत्नियाँ हूँ ठाढी हैं ।
कन्हैया की रूप माधुरी कौ दर्शन करके, जे सब तन मन कौ सुध बुध खो बैठे हैं ।
अरे ! जे तौ भगवती इन्दिरा हैं ….महालक्ष्मी । जे कहा कर रही हैं ? अपलक नेत्रन ते अपने भरतार कूँ निहार रही हैं ….मेरे मन ने कही । लेकिन जौ माधुर्य रस या गोकुल में बह रह्यो है …बाकौ एक बूँद हूँ लक्ष्मी के भाग में अब तक नही आयौ है …लेकिन जि सबरी ग्वालिन तौ पूरे माधुर्य रस कौ ही पान कर रही हैं ।
कन्हैया नाच रह्यो है मटक मटक के …..गन्धर्वन की लुगाई तौ या लाला कौ नाच देखके भाव विभोर है रही हैं । देवराज इन्द्र तौ ऊपर ते पुष्प बरसा रहे हैं ।
कन्हैया जब अपने कमर में छोटे छोटे हाथ धर के नाचे , तब विश्वनाथ भगवान डंबरू बजाय रहे हैं । आहा ! सच है ….
जौ रस बरस रह्यो गोकुल में, सो रस तीन लोक में नाँय ।
बृजरानी मैया ने आज सबेरे ही उठाय के नहलाय दियौ है कन्हैया कूँ । फिर सजाय के खेलवे कूँ विशाल नन्दआँगन में छोड़ दियौ है ।
तुलसी कौ बिरवा है …ऊँची बाकी आलबाल है …वहाँ मैया नित्य की तरह जल दैं रहीं हैं….लेकिन …मैया आज जल दैनौं भूल जावे ..चौं ? चौं कि मधुर, तोतली बोली में लाला कछु गाय रो है । मैया विमुग्ध है गयीं हैं ..अरे! मैया ही मुग्ध नाँय भयी …नन्द भवन में काम करवे वारी जितनी ग्वालिन हीं …सबकौ काम छूट गयौ है ….और सब खड़ी है कै लाला कौ गायन सुन रही हैं । लाला की बोली अत्यन्त मीठी है …इतनी मीठी और सुरीली ….कि नभ में खड़ी शारदा मूर्छित है गयीं हैं ।
अब तौ गायन ही नही ….लाला ने नाचनौं हूँ शुरू कर दियौ है …छोटे छोटे चरणन कूँ बारी बारी ते उठाय उठाय के नाचे । फिर हाथ उठाय के ….गैयान कूँ बुलावै । धौरी ! धूसर ! गंगा ! स्वाँग करे है । फिर अकेले में , अपने ते ही बतियावे । फिर रुक जावै …और धीरे ते बाबा ! फिर मैया ! कहके ….बैठ जावै । फिर अकेले ही हँसवे लगै । कहा सोचके फिर ठाडौ है जावे …और ठुमक ठुमक नाचनौं फिर शुरू । मैया ही नाँय देख रही या नृत्य कूँ …अब तौ नन्द महल के सब ग्वाले और ग्वालिन हूँ देख रहे हैं ….इतनौं ही नही …जो जो नन्द महल में आय रो , बु हूँ ठहर सौ गयौ है …ठहर जावे ….और लाला कूँ देखनौं शुरू ।
आँगन में एक खम्भ है मणिन कौ …कन्हैया माखन लै कै जावे खम्भ के पास …..तौ लाला कूँ अपनौं प्रतिबिम्ब दिखाई दै है ….तौ सब भूल जावे लाला । अब लाला कूँ लग रह्यो है जे कोई दूसरौ व्यक्ति है …लाला शरमाय गयौ है । हाय , जाने मोकूँ नाचतौ भयौ देख लियौ ….तौ कन्हैया अब मणि स्तम्भ में अपने प्रतिबिम्ब ते बात कर रह्यो है ।
लै माखन खा ….मैया हँस रही है ….मैया के नेत्रन ते अतिआनन्द के अश्रु बह चले हैं । लै माखन खा ….देख , काहू तै कहनौं नही । लै माखन खा । अरे ! अपने ही प्रतिबिम्ब कूँ माखन खिलाय रह्यो है कन्हैया ।
तभी बाबा बृजराज आय गये …अब बृजराज बाबा कूँ देखते ही कन्हैया तौ शर्माय गयौ । अब इधर उधर देखी तौ चारों ओर भीर लगी हती …सब कन्हैया कूँ देख रहे …लाला फिर शरमा गयौ ..और मैया यशोदा के पास चलौ गयौ …..मैया ने हँसते भए अपने लाल कूँ गोद में उठाय लियौ है …गोद में जाते ही कन्हैया ने अपने आँखन कूँ बन्द कर लियौ ……हँसते भए मैया कह रही है…लाला ! देख ..चारों ओर देख …लाला सबन कूँ देखे , फिर बाबा कूँ देखते ही शरमा जावे ।
नाच रो लाला ! अकेले में नाच रो …आपकूँ देखते ही शरमाय गयौ । जैसे ही लाला ने सुनी मैया मेरे नाच कूँ , बाबा ये बताय रही है ….बस बाही समय लाला ने मैया कौ मुँह अपने छोटे छोटे करन ते बन्द कर दियौ । हँसती भई मैया बोली …लाला ! बाबा कूँ दिखा अपनौं नाच । बाबा बृजराज बोले …हाँ , लाला ! मोकूँ दिखाओ नाच !
“लेकिन हे बृजराज बाबा ! लाला कूँ तौ नाच आवै ही नही है”……जे बात कौन ने कही ? लाला ने अब बा गोपी कूँ देख्यो …लेकिन गोपी बोलती गयी ….बा गोपी संग अन्य भी गोपी लाला कूँ उकसायवे कूँ कह रहीं ….”नही आवै नाचनौं लाला कूँ “। बाबा बोले …अच्छों नही आवै ?
लाला हूँ मैया के गोद ते उतर गये और सबनकूँ देखते भए ठुमक ठुमक नाचवे लगे । अब तौ बृजराज ताली बजा रहे हैं …सब ताली बजा रहे हैं …और नन्दलाल अपने में ही मग्न नाच रहे हैं ।
तभी मैया बृजरानी कूँ लग्यो …कि अब थक गयौ होयगौ लाला ….जे सोचके मैया ने आगे बढ़के लाला कूँ अपनी गोद में उठाय लियौ …..और भीतर लै जाय के दूध पिवायवे लगीं …….दूध पीते पीते लाला मैया की गोद में ही सोय गये हैं….बृजरानी ने अब पर्यंक में सुलाय दियौ । गोपियाँ छुप छुप के कन्हैया कौ दर्शन कर रही हैं …मैया भगाय रही है गोपिन्ने । मैया जे कहते भए भगाय रही है ….सोते भए बालकन कूँ अधिक नही देखनौं चहिए …..नज़र लग जावै है ।
अरी बृजरानी ! कारे कूँ कहीं नज़र लगे ? मैया कूँ गोपियाँ छेड़ रही हैं ।
मैया अपने लाला कूँ कारौ सुनके चुप है जायें ।
फिर रोहिणी मैया ते पूछती रहें …..कन्हैया कारो है का ? रोहिणी मैया कहे …इतनौं नहीं है ।
फिर हूँ देखती रहे अपने लाला कूँ मैया ….फिर पूछे ..रोहिणी ! ब्याह तौ है जायगौ ?
रोहिणी मैया हँसते भए कहतीं ….जीजी ! जगत की छोरिन कूँ पागल बनावैगौ तेरौ लाला ।
जे सुनके बृजरानी मैया हसवें लग जामें । और बहुत देर तक हँसती रहें ।
क्रमशः…
Hari sharan
[] Niru Ashra: 🌸 फूलमंडली🌸
🌹फूलमंडली के कई प्रकार है , सुगंधी एवं सुरंगी पुष्पो की फूलमंडली प्रभु को अति ही प्रिय है। सुगंधी पुष्प सुगंध वाले होय है।
सुरंगी पुष्प सुंदर रंगवाले होय है।
👉 ये सेवा मे ध्यान रखे कि सुंगंधी पुष्पो सहित सुरंगी पुष्प आते है ।।
अकेले सुरंगी पुष्प की फूल मंडली नही होय है।
🌸 फूल मंडली सिद्ध करते समय फूलमंडली के भाव के पद है वो मन मे गाने चहिये। जासु अपनो मन अलौकिक भाव सु ओत प्रोत रहै। फूल राधा माधव के भावसु फूल मंडली मे आवे है।
पद
राधा माधव बन के फूल ” यह भाव पदो मे वर्णित मिलता है।
फूल सब व्रजभक्त के भाव सु फूलमंडली मे आवे है। ब्रजभक्तो के मन फूल है और प्रभु वा फूल के रसपान कर्ता भ्रमर है।
🌻 संवत्सर की फूल मंडली विशेष करीके चैती गुलाब की होय है।
संगमे दूसरे फूल भी सुंदरता एवं सुगंधी के हिसाब सु आय सके है। गरमी के इन दिनो मे प्रभु को फूल मंडली अति ही प्रिय है। फूल मंडली के संग एक मधुर सामग्री प्रभु को अवश्य भोग धरनी चहिये।
🌷 फूलन की मंडली मनोहर बैठे पिय प्यारी ।। फूलन के चोखंभा मनोहर राजत है। पिय प्यारी –
राग सारंग – के ये अति ही सुंदर पद है जो प्रभु सन्मुख गाये जाय है।।
उष्णकाल में फूल के शृगार और फूलमंडली ।।
फूलमंडली
💐 फूल मंडलीको निकुंज यात्रा कहते है । अनेक प्रकार के भकतो का भावरूप फूलोंकी कुंजमें, ठाकोरजी पधारके, भकतोका भाव, अंगीकार करते है ।
फूल अनेक रंगके होते है
🙏 पीले फूल,श्रीस्वामीनीजी स्वरूप है ।
सफेद फूल,श्री चंन्द्रावलीजी स्वरुट है ।
लाल फूल,ललिताजी स्वरुप है ।
श्याम फूल श्री गिरिराजजी स्वरुप है ।
घनश्याम फूल श्रीयमुनाजी स्वरुप है ।
👉 बाकी के रंग के फूल, व्रजभकतो क
भावसे है ।
🌺 व्रजभक्तोके, रसह्रदय ये रसफूलडां,
रसफूलडां का निवासस्थान, ये ” फूलघर “🌸 *फूलल भाफूल
फूमंडली के कई प्रकार है , सुगंधी एवं सुरंगी पुष्पो की फूलमंडली प्रभु को अति ही प्रिय है। सुगंधी पुष्प सुगंध वाले होय है।
सुरंगी पुष्प सुंदर रंगवाले होय है।
ये सेवा मे ध्यान रखे कि सुंगंधी पुष्पो सहित सुरंगी पुष्प आते है ।।
अकेले सुरंगी पुष्प की फूल मंडली नही होय है। फूल मंडली सिद्ध करते समय फूलमंडली के भाव के पद है वो मन मे गाने चहिये। जासु अपनो मन अलौकिक भाव सु ओत प्रोत रहै। फूल राधा माधव के भावसु फूल मंडली मे आवे है।
पद ” राधा माधव बन के फूल ” यह भाव पदो मे वर्णित मिलता है।
फूल सब व्रजभक्त के भाव सु फूलमंडली मे आवे है। ब्रजभक्तो के मन फूल है और प्रभु वा फूल के रसपान कर्ता भ्रमर है।
संवत्सर की फूल मंडली विशेष करीके चैती गुलाब की होय है।
संगमे दूसरे फूल भी सुंदरता एवं सुगंधी के हिसाब सु आय सके है। गरमी के इन दिनो मे प्रभु को फूल मंडली अति ही प्रिय है। फूल मंडली के संग एक मधुर सामग्री प्रभु को अवश्य भोग धरनी चहिये।
फूलन की मंडली मनोहर बैठे पिय प्यारी ।। फूलन के चोखंभा मनोहर राजत है। पिय प्यारी
राग सारंग के ये अति ही सुंदर पद है जो प्रभु सन्मुख गाये जाय है।।
उष्णकाल में फूल के शृगार और फूलमंडली ।।
फूलमंडली
फूल मंडलीको निकुंज यात्रा कहते है । अनेक प्रकार के भकतो का भावरूप फूलोंकी कुंजमें, ठाकोरजी पधारके, भकतोका भाव, अंगीकार करते है ।
फूल अनेक रंगके होते है
पीले फूल,श्रीस्वामीनीजी स्वरूप है ।
सफेद फूल,श्री चंन्द्रावलीजी स्वरुट है ।
लाल फूल,ललिताजी स्वरुप है ।
श्याम फूल श्री गिरिराजजी स्वरुप है ।
घनश्याम फूल श्रीयमुनाजी स्वरुप है ।
बाकी के रंग के फूल, व्रजभकतो के
*भावसे है ।
व्रजभक्तोके, रसह्रदय ये रसफूलडां,
*रसफूलडां का निवासस्थान, ये ” फूलघर “
ठाकोरजी और व्रजभक्तो का लीला स्थान
ये रस निकुंज ।
फूलघर में बडी बडी तीनब छाब. ये.. श्रीस्वामीनीजी, श्रीचंन्द्रावलीजी औऱ श्रीललिताजी का कोमलह्रदय, भावसे है।
छाब उपर बिछाया गया वस्त्र, श्रीनाथजी की प्रसन्नता सूचक है।जी
सूई में जो फूल परोंते है, उसको वेणुजी का स्वर जानीये।
प्रेम स्वरुप सफेद धागा, श्री ठाकोरजी ये, वेणुनाद करके, व्रजभक्तोंके ह्रदय को, प्रेमसे ह्रदयपर धारण किया है।
🌹 श्रीगुसाईजीके सेवक,श्यामदास कणबी ने आपश्री को बिनति क महाराजाधिराज !!! फूलका स्वरूप क्या ह
आपश्री ने आज्ञा की कि ” व्रजभक्त-गोपीजनो का चित्त ये फूल है और श्रीठाकोरजी के श्रीअंग को स्पर्श करते है ।
श्याम दास…” कृपानाथ..फूलका एसा स्वरुप है तो उनको सूई से क्यां परोते है ?”
आपश्री ने आज्ञा की कि,
” सूई सुचि है, ईसलिये *व्रजभक्तनका फूल रुपी चित्त, बहुत प्रसन्न होता हे और सोचते हे हमारा जल्द अंगीकार होगा बन’सफूल भवन में गिरिधर बैठे फूलन को शोभीत सिंगार।
फूलन को कटी बन’सयो पिछोरा फूलन बांधे पेंच संवार ॥
फूलनकी बेनी जू बनी सीर फूलन के जू बने सब हार ।
फूलन के मुक्त छबी छाजत फूलन लटकन सरस संवार ॥
करन फूल फूलन कर पॉहोची गेंद फूल जल करत विहार ।
राधा माधो हसत परस्पर दास निरखत डारत तन वार ॥
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ठाकोरजी और व्रजभक्तो का लीला स्थान
ये रस निकुंज ।
फूलघर में बडी बडी तीन छाब. ये.. श्रीस्वामीनीजी, श्रीचंन्द्रावलीजी औऱ श्रीललिताजी का कोमलह्रदय, भावसे है।
छाब उपर बिछाया गया वस्त्र, श्रीनाथजी की प्रसन्नता सूचक है।
सूई में जो फूल परोंते है, उसको वेणुजी का स्वर जानीये।
प्रेम स्वरुप सफेद धागा, श्री ठाकोरजी ये, वेणुनाद करके, व्रजभक्तोंके ह्रदय को, प्रेमसे ह्रदयपर धारण किया है।
श्रीगुसाईजीके सेवक,श्यामदास कणबी ने आपश्री को बिनति की ” महाराजाधिराज !!! फूलका स्वरूप क्या है ? “
आपश्री ने आज्ञा की कि ” व्रजभक्त-गोपीजनो का चित्त ये फूल है और श्रीठाकोरजी के श्रीअंग को स्पर्श करते है ।
श्याम दास…” कृपानाथ..फूलका एसा स्वरुप है तो उनको सूई से क्यां परोते है ?”
आपश्री ने आज्ञा की कि,
” सूई सुचि है, ईसलिये व्रजभक्तनका फूल रुपी चित्त, बहुत प्रसन्न होता हे और सोचते हे हमारा जल्द अंगीकार होगा ।
फूल भवन में गिरिधर बैठे फूलन को शोभीत सिंगार।
फूलन को कटी बन्यो पिछोरा फूलन बांधे पेंच संवार ॥
फूलनकी बेनी जू बनी सीर फूलन के जू बने सब हार ।
फूलन के मुक्त छबी छाजत फूलन लटकन सरस संवार ॥
करन फूल फूलन कर पॉहोची गेंद फूल जल करत विहार ।
राधा माधो हसत परस्पर दास निरखत डारत तन वार ॥
[] Niru Ashra: श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय 18 : उपसंहार – संन्यास की सिद्धि
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श्लोक 18.49
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असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः |
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति || ४९ ||
असक्त-बुद्धिः– आसक्ति रहित बुद्धि वाला; सर्वत्र– सभी जगह; जित-आत्मा– मन के ऊपर संयम रखने वाला; विगत-स्पृहः – भौतिक इच्छाओं से रहित; नैष्कर्म्य-सिद्धिम्– निष्कर्म की सिद्धि; परमाम्– परम; संन्यासेन– संन्यास के द्वारा; अधिगच्छति– प्राप्त करता है |
भावार्थ
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जो आत्मसंयमी तथा अनासक्त है एवं जो समस्त भौतिक भोगों की परवाह नहीं करता, वह संन्यास के अभ्यास द्वारा कर्मफल से मुक्ति की सर्वोच्च सिद्ध-अवस्था प्राप्त कर सकता है |
तात्पर्य
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सच्चे संन्यास का अर्थ है कि मनुष्य सदा अपने को परमेश्र्वर का अंश मानकर यह सोचे कि उसे अपने कार्य के फल को भोगने का कोई अधिकार नहीं है | चूँकि वह परमेश्र्वर का अंश है, अतएव उसके कार्य का फल परमेश्र्वर द्वारा भोग जाना चाहिए, यही वास्तव कृष्णभावनामृत है | जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में स्थित होकर कर्म करता है, वही वास्तव में संन्यासी है | ऐसी मनोवृत्ति होने से मनुष्य सन्तुष्ट रहता है क्योंकि वह वास्तव में भगवान् के लिए कार्य कर रहा होता है | इस प्रकार वह किसी भी भौतिक वस्तु के लिए आसक्त नहीं होता, वह भगवान् की सेवा से प्राप्त दिव्य सुख से परे किसी भी वस्तु में आनन्द न लेने का आदी हो जाता है | संन्यासी को पूर्व कार्यकलापों के बन्धन से मुक्त माना जाता है, लेकिन जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में होता है वह बिना संन्यास ग्रहण किये ही यह सिद्धि प्राप्त कर लेता है | यह मनोदशा योगारूढ़ या योग की सिद्धावस्था कहलाती है | जैसा कि तृतीय अध्याय में पुष्टि हुई है – यस्त्वात्मरतिरेव स्यात्– जो व्यक्ति अपने में संतुष्ट रहता है, उसे अपने कर्म से किसी प्रकार के बन्धन का भय नहीं रह जाता |
