श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! प्रेम, जो कराये कम है – “गोपिकागीतम्” !!
भाग 2
उफ़ ! वो समय कैसे बीतता था …….एक एक पल हम गिनती थीं ……..और जब शाम हुई ……………हम भागीं बाहर ……….ठहर जातीं थीं उस रूप को देखकर ………..हमारा अंग अंग ठहर जाता था ……हमारा मन, हमारी बुद्धि सब ठहर जाती थी …………
पर बुद्धि ! हाँ , उस समय हमें बड़ा क्रोध आता था ………
सखी ! प्रियतम के दर्शन करते हुये कभी क्रोध नही आना चाहिये ।
एक दूसरी गोपी तुरन्त बोली ।
हाँ हमें पता है ……..नही आना चाहिये क्रोध………..पर आना चाहिये या नही आना चाहिये ……ये अब हमारे हाथ की बात तो रही नही ।
पर क्रोध क्यों आता ?
अब देखो सखी ! दिन भर की हमारी प्रतीक्षा…….अब जैसे तैसे श्याम सुन्दर के बिना हमनें उस समय को बिताया था……….जब समय हुआ उनको निहारनें का …..”तब ये पलकें गिरनें लगतीं हैं” …….ओहो ! इतना क्रोध आता……मन करता कि इन पलकों को ही काट के फेंक दूँ ।
पर क्रोध किस पर आता तुझे ? दूसरी गोपी फिर पूछती ।
“विधाता ब्रह्मा पर”………………गोपी गुस्से में बोली ।
हाँ, देख ना ! मूर्ख है वो ब्रह्मा ……………
अरी ! ऐसा मत बोल …………
क्यों न बोलूँ ! अब देख कितना अच्छा होता कि ……हमारे नेत्रों में पलकें ही नही होतीं………आहा ! हम बस अपनें प्रियतम के रूप माधुरी को निहारती रहतीं…….निहारती रहतीं ।
पर हमारा शत्रु बन गया वो ब्रह्मा ! बेकार में पलकें लगा दीं ……..अब ये हमें बाधा डालते हैं ………सच में सखी ! विधाता में बुद्धि है ही नही ………मैं तो यही कहूँगी ।
उफ़ ! ये बयार फिर चल पड़ी……….हमारे हृदय में छुपे प्रेम को ये बयार प्रकटाना चाहती है……..पर मैं अब कुछ नही बोलूंगी ।
उद्धव भावतिरेक में डूब गए हैं विदुर जी को ये गोपीगीत सुनाते हुये ।
*शेष चरित्र कल –
