श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! इति रासपञ्चाध्यायी !!
भाग 2
…….गोपियों नें पकड़ लिया …….और श्रीराधारानी कि नीली चूनरी लेकर बांध दिया……..अद्भुत दृश्य था वो……….चारों और गोपियाँ नाच रही हैं……मध्य में श्याम सुन्दर अपनी प्रिया श्रीराधारानी कि चूनरी से बंधे हुए हैं …….और मुस्कुरा रहे हैं ।
गोपियाँ कमल पुष्प फेंकती हैं श्यामसुन्दर के ऊपर ………श्याम सुन्दर मुस्कुराते हुए बचते हैं …….फिर एकाएक एक चतुर गोपी को पकड़ लेते हैं ……और उसे जोर से अपनें बाहु पाश से बाँध लेते हैं ……….
तात ! ये चतुर गोपी कोई और नही श्रीकिशोरी जी ही थीं ।
लेकर चले जाते हैं दूर कालिन्दी में ही श्रीराधारानी को ………..
अधर से अधर मिलते हैं दोनों के ……….कटि कृश है ……इतनी कृश कि लगता है थोड़ी झुकी तो टूट ही जायेगी ………..वृक्ष तो श्रीकृष्ण हैं …….लता बनकर लिपट गयीं हैं श्यामा श्याम से ।
मानों तमाल में कनक वेल लिपटी हो ऐसी दिव्य शोभा बन गयी थी ।
पर एक आश्चर्य ये था कि………..किसी गोपी को ये नही लग रहा है श्रीराधा के साथ ही हैं श्यामसुन्दर ………सबको लग रहा है ……हमारी अलकें संवार रहे हैं …..हमें आलिंगन कर रहे हैं ……..हमें चूम रहे हैं …..हमसे ही प्रेमालाप कर रहे हैं………हमारी ही गोद में सिर रखकर लेट गए हैं…….और चुबुक को पकड़ कर कह रहे हैं – प्यारी ! बड़ी सुन्दर है तू ।
अनन्त तारों की तरह गोपियाँ हैं ……..और चन्द्रमा की तरह मध्य में श्यामसुन्दर हैं……..ये दृश्य देखते ही बनता है ।
जय हो , जय हो रासबिहारी सरकार की ……
जय हो गोपीनाथ ठाकुर जी की ……..
जय हो राधाबल्लभ लाल की ………..
देवता गण नभ से पुष्प निरन्तर बरसाते ही जा रहे हैं ।
श्रीकृष्ण के आलिंगन में डूबी हुई ये बृज गोपियाँ …………
अरी उठो ! देखो अरुणोदय हो रहा है ……….
श्यामसुन्दर उठ गए थे……सूर्य अब उदित होनें वाले हैं ………
गोपियों को उठाया उन्होंने ।
क्या उठना ? क्यों उठना ? गोपियों नें अपनें आपको श्याम सुन्दर के वक्ष से ही लगाये रखा…..उन्हें कोई मतलब नही था अरुणोदय से ।
अब जाओ ! ये कहते हुए श्यामसुन्दर स्वयं अपनी पीताम्बरी सम्भालनें लगे थे ।
जाओ ? कहाँ जाओ ? तुम्हे छोड़कर हम कहाँ जाएँ ?
बिलख उठीं गोपियाँ तो ।
देखो ! सूर्य उदित होनें वाले हैं बृज के गोप देख लेंगे ।
तो देखनें दो….हम नही डरतीं ! गोपियों नें स्पष्ट कह दिया ।
पर तुम्हे जाना तो होगा ही ना ? श्याम सुन्दर नें गोपियों को समझाना चाहा ।
पर तुम्हारे बिना अब हम एक क्षण भी नही रह सकतीं …..ये सच्चाई है ।
गोपियाँ कह रही थीं …….और उनके कहनें में प्रेम का अधिकार था ।
देखो गोपियों ! तुम सबको एक रहस्य की बातें मैं बताता हूँ ………
तुम सब मेरी सहचरी हो …..नित्य निकुञ्ज की सहचरी ……..पर ये अवतार काल है……..यहाँ मैने अवतार ही इसलिये लिया है कि …….इस जगत को बता सकूँ …….प्रेम क्या होता है ?
ये लीला है हमारी……….हे मेरी प्यारी गोपियों ! श्रीकृष्ण गोपियों के सिर में हाथ रखते हुए बोले – तुम सब मेरी ही हो ………पर अब वियोग होगा……..इसके लिये तुम तैयार रहो !
इतना जैसे ही कहा श्यामसुन्दर नें ………सब गोपियाँ हिलकियों से रो पडीं………”पौर्णमासी भगवती नें तो हमें कहा था एकान्त में एक दिन……..हे गोपियों ! रास विहार को जितना हो सके टालती रहना ………क्यों कि रास जिस दिन हो जाएगा …..उसके बाद दीर्घकालीन वियोग श्याम सुन्दर का तुम्हे सहना पड़ेगा …..।
हे श्याम सुन्दर ! हम कैसे जीएगीं ?
श्याम सुन्दर कुछ नही बोले……….सब गोपियाँ रोती रहीं ……श्याम सुन्दर नें मात्र इतना ही कहा …..जाओ ! तुम सब जाओ अपनें अपनें घरों में ……….किसी को कुछ पता नही है ………सबको लग रहा है तुम घरों में ही हो……….मैं तो तुम्हारा ही हूँ …….तुम मेरी हो …..यही परम सत्य है ………इस मेरी लीला को तुम समझती हो………ये कहते हुये अपनी श्रीराधारानी कि ओर श्रीकृष्ण नें देखा था ……..श्रीराधा रानी सब गोपियों को लेकर चल दी थीं ।
श्याम सुन्दर देखते रहे अपनी इन गोपांगनाओं को ।
किसी कि इच्छा नही थी वापस जानें कि ……पर श्याम सुन्दर नें वापस भेज दिया था…….तात ! ये सब गृहकार्य करतीं ………पर इनका मन श्याम ही बन गया था………श्याम श्याम श्याम …….इनके अंग अंगों में श्याम ही तो समाये हुये थे ।
ये दिव्य रासलीला का प्रसंग है ………..तात ! जो इसे श्रद्धा से सुनेगा गायेगा ……उसका “हृद रोग” समाप्त हो जायेगा ………हाँ तात !
उद्धव नें ये कहते हुए रास लीला को यहीं विश्राम दिया था ।
*शेष चरित्र कल –


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