श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! “राधा प्रेममयो हरिः” – अद्भुत प्रेम लीला !!
भाग 1
अम्बिका वन से लौटते समय श्रीराधा रानी बरसानें में उतरीं थीं …..बरसानें का समस्त परिकर वहीं उतरा ….और नन्दगाँव वाले आगे बढ़ गए ।
श्रीकृष्ण नें अपनी मैया से कहा था – मैया ! मैं बरसानें में कुछ समय बिता कर नन्दगाँव आऊँगा ।
पर क्यों ? बृजरानी नें पूछा ।
श्रीदामा की इच्छा है कि मैं उसके महल में आऊँ !
श्रीदामा नें कन्हैया की ओर देखा तो कन्हैया मुस्कुरा दिए ….और चुप रहनें के लिये उससे कहा । क्यों की उसनें कहा नही था ।
ठीक है …..पर जल्दी आजाना कन्हैया ! इतना कहकर नन्दगाँव की गाड़ियाँ आगे बढ़ गयीं थीं ……बृषभ धूल उड़ाते हुये चल दिए थे ।
इधर बरसानें का “गहवर वन” –
वन देवी नें सुन्दर सजा दिया था कुञ्जों को……जो पुष्प कल खिलनें वाले थे …….उन्हें आज ही खिला दिया था ………श्याम तमाल के वृक्ष और घनें हो गए थे ……उसमें ऐसी कनक वेल लिपटी थी …….जिसका वर्णन असम्भव है…….सरोवरों में कमलों को खिला दिया था वन देवी नें……..कुञ्ज सुन्दर सुन्दर लताओं से भर गयीं थीं ……उन लताओं में जो पुष्पों के गुच्छे थे उसमें से सुगन्ध की वयार निकल रही थी……..पूरा गहवर वन महक उठा था ।
सब तो चले गए थे अपनें महलों में…….श्रीदामा को भी श्यामसुन्दर नें कहा…….भैया ! तुम जाओ….मैं फिर कभी आऊँगा महल में ।
श्रीदामा भी अपनें महल में चले गए थे ।
सखियों के साथ गहवर वन में श्रीराधारानी पधारीं……ललिता सखी नें सामनें देखा श्यामसुन्दर खड़े हैं….बस ये देखते ही अन्य सखियों को ललिता लेकर चली गयी ….श्रीजी को श्यामसुन्दर के साथ छोड़ दिया ।
आज पता नही क्यों – श्याम सुन्दर अपनी प्रिया को देखते ही प्रेमाधिक्य के कारण वहीं गिर पड़े……..श्रीजी नें बड़ा प्रयास किया अपनें प्रियतम को उठानें का……पर वे उठे नही …उनके मुख से बस – “श्रीराधा श्रीराधा श्रीराधा” यही निकल रहा था ………।
प्यारे ! प्यारे ! उठो ! बहुत प्रयास किया श्रीजी नें पर आज स्वयं श्यामसुन्दर ही भावातिरेक अवस्था को प्राप्त कर चुके थे…..वे उठ ही नही सके ।
सखियाँ आगयीं …….ललिता नें देखा तो वो समझ गयीं ………….
स्वामिनी जू ! साँझ होनें वाली है ……आप भी थक गयी होंगी अम्बिका वन की यात्रा से ……..आप विश्राम करो …..मैं इन्हें नन्दगाँव छोड़ आऊँगी ।
नही ललिते ! अपनें प्राण धन को मैं ऐसे अकेले कैसे जानें दूँ …..और ये तो मेरे ही नाम का उच्चारण कर रहे हैं ……उच्चारण ही नही …इनके रोम रोम से मेरा ही नाम प्रकट हो रहा है ……….
ललिता ! तू बैल गाडी लेकर आ ………..मैं भी चलूंगी नन्दगाँव !
श्रीराधारानी नें आदेश दिया था ।
पर आप को मैया बृजरानी देखेंगी तो ? ललिता नें कहा ।
तू छोड़ उन बातों को …….मेरे प्यारे को अभी मूर्च्छा आयी हुयी है …..तू जा और महल की सुन्दर बैल गाडी को ले आ ……और ये सब किसी को बताना नही ………….।
इतना कहकर भेज दिया ललिता सखी को …………….
प्यारे ! उठो ना ! उठो ! बारबार कह रही हैं पर श्याम सुन्दर उठ नही पा रहे ।
तभी बैल गाडी लेकर ललिता आगयी थी……श्रीराधा रानी नें कहा …..मैं भी चलूंगी……श्याम सुन्दर को गाडी में रखा ……श्रीजी बैठी हैं …..श्याम सुन्दर के सिर को अपनी गोद में लेकर वो ब्याकुल हो रही हैं …..प्यारे ! क्या हुआ ! जल पिलाती हैं…….जल का छीटा देती हैं ….पर श्याम सुन्दर को होश नही है ।
नन्दगाँव आगया था …………ललिता सखी नें कहा ……आप भी आओगी क्या ? श्रीजी नें कहा …….नहीं तू सम्भाल कर ले जा प्यारे को ।
ललिता सखी नें सम्भाला लड़खड़ाते श्याम सुन्दर चल रहे थे ……….
लाला ! ओ लाला ! ये क्या हुआ ? ललिता ! ये क्या हुआ मेरे कन्हैया को ? मैया तो घबडा गयी ………..जल पिलाया ……मुखारविन्द में जल का छींटा दिया ……..पर नही ……….।
ललिता ! हुआ क्या ?
ललिता क्या बोले …………..वो इतना ही बोली ……..मुझे ज्यादा पता नही ….पर मैने देखा कि कुञ्ज में श्याम सुन्दर पड़े थे ….और सुध बुध खो बैठे थे ……..ऐसे ही ! ललिता भी घबडा रही थी बताते हुये ।
हाय ! ये क्या हो गया ! मुझे लगता है ……नजर लग गयी है किसी की ।
मैया यशोदा के नेत्रों से अब गंगा यमुना बहनें लगे थे ।
अलख निरन्जन !
बड़ी मीठी सी आवाज , बाहर से आयी …………
ललिता सखी नें मुड़कर देखा तो …………
कौन है द्वार पे ललिते ? मैया नें सुबुकते हुए पूछा ।
मैया ! कोई योगी हैं शायद ! ललिता चौंक गयी थी ।
योगी नही ….योगिनी ! मैं सिद्ध योगिनी हूँ ………..अलख निरन्जन !
आहा ! कितनी मीठी आवाज …….गौर वर्ण ……सुन्दरता की राशि ये योगिनी ? यशोदा जी उठीं श्याम सुन्दर के पास से ……..
आप तो बड़ी सुन्दर योगिनी हो ? यशोदा जी को कौतुक लगा ….इतनी सुन्दरी , छोटी आयु में ही योगिन बन गयी ?
*क्रमशः…


Author: admin
Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877