श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! अक्रूर का मनो – रथ !!
भाग 1
तात ! ये रथ नही पहुँचाता श्रीकृष्ण तक…….मनोरथ पहुँचाता है ।
अक्रूर चले तो हैं बृज की ओर ……..पर उनके रथ से पहले उनका मनोरथ पहुँच गया था ………
आहा ! मेरे इष्ट हैं नारायण भगवान ……तो क्या मेरे इष्ट ही श्रीकृष्ण के रूप पधारे हैं ! हाँ, आचार्य गर्ग उस दिन मुझे एकान्त में यही तो बता रहे थे …..कि नन्द राज के आँगन में जो बालक खेल रहा है…….वो नारायण का ही अवतार है……..ओहो ! तो मैं इन नेत्रों से अपनें भगवान के दर्शन करूँगा !
उद्धव विदुर जी को कथा सुना रहे हैं – ऐसा मनोरथ करते हुये . ….. ..इसी चिन्तन में खोये हुये अक्रूर का रथ चल रहा है बृज कि ओर ।
अब बृज प्रारम्भ होनें जा रहा है …….मथुरा की सीमा यहीं तक है ।
घनें वृक्ष दिखाई दिए अक्रूर को ………..उन वृक्षों से लताएँ लिपटी हुयीं हैं ……उन लताओं में छोटे छोटे पुष्प खिले हैं …..उनकी सुगन्ध अद्भुत है । आगे बढ़ते हैं अक्रूर तो उन्हें हिरणों का झुण्ड दिखाई देता है ……..वो दौड़ रहे हैं ।…….दाहिनी और मोरों का नृत्य चल रहा है ….बायीं ओर सरोवर हैं छोटे छोटे . …….उनमें कमल खिले हैं ……..
मन आल्हादित है अक्रूर का ……..वो चकित भाव से चारों ओर देख रहे हैं…….सामनें गौएँ दिखाई दीं……अनगिनत गौएँ…..उनके बछड़े कूद रहे थे…….आगे देखते हैं अक्रूर – मोरछली, कदम्ब , पारिजात, पाकर, तमाल, इनका बड़ा घना वन है……..उसमें जब गुजरे अक्रूर तो उनके आल्हाद का कोई ठिकाना नही था ……वो शीतल हवा चल रही थी …हवा मात्र शीतल नही थी सुगन्धित भी थी ……..और सबसे बड़ी बात हवा प्रेमपूर्ण थी…….भींग रहे थे अक्रूर उसी प्रेम फुहार में ।
ओहो ! अक्रूर का रथ रुक गया एकाएक …………अक्रूर सामनें देख रहे हैं ………..अतिआनन्द के कारण वो जड़ वत् हो गए हैं ।
रथ से उतरे ………क्यों की अब रथ में चलनें का कोई अर्थ नही था ……..और उतरते ही साष्टांग लेट गए धरती में ………..
चरण चिन्ह बने थे श्रीकृष्ण चन्द्र जू के ।
अक्रूर के नेत्रों से अश्रु बह रहे हैं ………..अश्वों नें चलना छोड़ दिया है ……..और अश्व चलें भी कैसे !
अक्रूर रज में लोटनें लगे थे ………….रज को अपनें मस्तक से लगाते हैं ………काजल बनाकर अपनें नयनों में लगाते हैं ……..रज ही रज सम्पूर्ण शरीर में लपेट लेते हैं ………….वो इतना करके जैसे ही उठते हैं …………ओह ! यहाँ तो चारों ओर चरण चिन्ह हैं मेरे श्रीकृष्ण के !
वो फिर लोट जाते हैं …………..चरण चिन्हों को ध्यान से देखते हैं …..शंख, चक्र, गदा, कमल , यव आदि चिन्ह बने हुये हैं ।
उद्धव कहते हैं – तात ! भगवान के चरण चिन्ह मिटते नही हैं ……..साधारण मानवी के चिन्ह मिट जाते हैं ……..पर ।
दूर नही है मथुरा से वृन्दावन ……पर प्रातः निकले अक्रूर पहुँचे हैं सन्ध्या को…….जब सूर्यास्त होनें जा रहा था ।
*राधे राधे


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