श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! का कहूँ गोपिकान की व्यथा !!
भाग 2
किसी से मिलाता है ….तो किसी से बिछोड कराता है ………..मथुरा की नारियाँ अपनें नयनों को शीतल करेंगी …….और यहाँ हमारी छाती जलेगी………बूढ़ा हो गया है तू विधाता……..सठिया गया है ……….क्या करना चाहिये क्या नही करना चाहिये …..ये बुद्धि नही है ब्रह्मा में …….चन्द्रावली बोलनें लगीं ।
अब देखो तो मथुरा की ललनाएँ कितनी भाग्यवान हैं ……..वो देखेंगी हमारे श्याम सुन्दर को…..रिझायेंगी…….रीझ जायेंगे ये ……..फिर नही आएंगे यहाँ ……..देख लेना वो लौटकर आनें वाले नही है ।
शुभ शुभ बोल चन्द्रावली ! वैसे ही विधाता हमारे बाम होकर बैठ गया है ……सब फिर रोनें लगीं ऐसा सुनते ही ।
अब चलो अब तो रथ की ध्वजा भी नही दिखाई दे रही ……….सासुओं नें अपनी अपनी बहुओं से फिर कहा ………..
धूल तो दिखाइए दे रही है …..रथ से उड़नें वाली धूल ………..अभी आस है …..शायद वो रास्ते से ही लौट आयें ।
वृन्दावन के पक्षी जो निरन्तर कलरव करते रहते थे ………..वो आज शान्त हैं ……….बिल्कुल शान्त ।……बन्दर , जो उछलते उछलते कभी थकते नही थे ………वो वृक्षों में शान्त बैठे हैं …………अश्रु गिर रहे हैं अपनें नेत्रों से …….जाते रथ की ओर ही देख रहे हैं बन्दर …..अब इनको पूछनें वाला कौन है इस वृन्दावन में ।
आज के बाद हमें माखन कौन देगा , हमारा कन्हैया तो गया ।
बन्दर भी ऐसा सोच रहे हैं ।
पूरा वृन्दावन ही सूना हो चला था ……..ऐसा लग रहा था कि वृन्दा देवी ही विरहकारत हो अपनें आपको ही भुला बैठी है …………।
अब नही आएंगे यहाँ छ ऋतु………….यहाँ तो एक ही ऋतु है आज से ……..बरसा ऋतु ………….अब बारिश ही होती रहेगी ……….नयनों से निरन्तर बरसते रहेंगे अश्रु जल ……………।
अब तो रथ की धूल उड़नी भी बन्द हो गयी ………..तब गोपियाँ चिल्लानें लगीं ………….चिल्लाईं तब जब उनकी आस पूरी तरह से समाप्त हो चुकी थी …….कि “अब गए श्याम सुन्दर मथुरा” ।
हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! हे कुञ्ज बिहारी ! सब चिल्ला रही थीं ……सब पुकार रही थीं ………..किसी को कोई लज्जा नही ……वहीं ससुर भी खड़े हैं ……सास भी खड़ी है …………पति भी हैं ।
तात विदुर जी ! अभी तक तो रो रही थीं ये सब …………पर अब तो नाम लेलेकर पुकारनें लगीं थीं ……..लज्जा छोड़ दी थी …….चन्द्रावली नें गोपियों से कहा भी …..तेरे ससुर सास देख रहे हैं ………….
गोपी अति विरह में हँसती है……..”सब कुछ चला गया….अब काहे की लाज” ।
कोई पुकार रही है …….कोई धरती में विरह के कारण गिर गयी है ।
किसी गोपी को तो होश ही नही है……..उसकी गर्म गर्म साँसे चल रही हैं ……………आँखें पलटी हुयी हैं किसी कि ………..।
उद्धव विदुर जी को ये प्रसंग सुनाते हुए हिलकियों से रो पड़े थे ।
का कहूँ इन गोपकान की व्यथा , तात !
शेष चरित्र कल –


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