श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! सुदामा माली कृतार्थ हुआ !!-भाग 1 : Niru Ashra

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श्रीकृष्णचरितामृतम्

!! सुदामा माली कृतार्थ हुआ !!

भाग 1

राजपथ को छोड़कर मथुरा की एक गली में प्रवेश कर गए थे श्रीकृष्ण ।

यहाँ भी गली ? मनसुख हंसा था ।

“नगर ही क्या देखना मथुरा की गलियों को भी देखा जाए”………हँसते हुये अपनें बड़े भाई दाऊ की ओर श्रीकृष्ण नें देखा था ।

“मैं तो कुछ कह ही नही रहा” ………दाऊ भैया नें उत्तर दिया ।

दाऊ भैया ! गली अच्छी है ना ! सुगन्ध ही सुगन्ध है इस गली में ……आगे बढ़ते हुये श्रीकृष्ण बोल रहे थे ।

मैं क्या कहूँ ……. कृष्ण ! कोई भक्त है क्या तेरा इस गली में ?

क्यों की तुझे अपनें भक्तों के लिये ही इतना आतुर मैने देखा है …

दाऊ बोले थे ।

रुक गए श्रीकृष्ण गली खतम हो गयी थी ..अंतिम घर था ये ………..

मालियों की गली लगती है क्यों कन्हैया ? श्रीदामा नें पूछा ।

हाँ…….मालियों की ही बस्ती है ये …….फूलों का ही काम होता है यहाँ …..सुगन्ध से तो समझ में आही रहा होगा…….श्रीकृष्ण मन्द मुस्कुराये ।

और तेरे ये भक्त का घर है…..क्यों ? दाऊ नें भी मुस्कुराते हुये पूछा ।

दाऊ भैया ! आपको कैसे पता ?

तेरा नाम संकीर्तन चल रहा है इस घर में…..मुझे सुनाई देता है कन्हैया ।
और दाऊ नें ही आगे बढ़कर द्वार खटखटाया ।

“श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेव”

हाथों में करताल लिये…….कितनें प्रेम से ये माली गा रहा था इसके नेत्रों से अश्रु बह रहे थे……..ये देहातीत हो गया था श्रीकृष्ण नाम संकीर्तन करते हुये ।

पर ये है कौन ? दाऊ नें द्वार में खड़े खड़े ही पूछा ……….

“सुदामा माली” ……….श्रीकृष्ण गम्भीर होकर बोले ………..

इसके घर में कोई नही है ? हाँ है दाऊ भैया ! इसकी पत्नी है ।

और सन्तान ? दाऊ भैया नें पूछा ।

कुछ देर के लिये चुप हो गए थे कन्हैया ……….फिर सबनें जो इस माली का इतिहास सुना…… नेत्र सजल हो गए ।


माली सुदामा ………….कला तो थी इसके हाथों में ……….माला बनानें के लिये इसे सुई और धागे की भी आवश्यकता नही थी ……..सींक से ही माला बना देता था …..गजरा , इसका बनाया गजरा रानी या राजकुमारियों का सबसे प्रिय गजरा होता था ……फूलों के आभुषण ये ऐसे बनाता था जिसको देखकर सब मुग्ध हो जाते थे ………माला तो ये सौ तरह की बनाता था ……कंस के श्री रंगेश्वर महादेव के पूजन करनें के लिये विशेष ये माला तैयार करता था …..जिसे देखनें के लिये मथुरा के नर नारी रंगेश्वर शिवालय में नित्य जाते थे ………..अद्भुत माली था ……..फूलों की पच्चीकारी इससे बढ़िया शायद ही कोई कर सकता हो ।

एक दिन सुबह ही सुबह …….इसकी दो सन्तान …..एक प्यारी सी बालिका और एक बालक ……ये टोकरी में फूलों को लेकर दोनों भाई बहन लौट रहे थे ………सुदामा माली अपनें इन बालकों की प्रतीक्षा कर रहा था पुष्पों के लिए ………पर ये आये नही ………सुदामा माली को पहले तो अपनें बालकों पर क्रोध भी आया ……….कि देखो ! महादेव रंगेश्वर के पूजन में देर हो जायेगी अगर माला समय पर न पहुँची तो ………..समय बीतता गया ……उसे कुछ पता नही ………..कि बालक कहाँ रह गए ?

पहले तो सुदामा को क्रोध आया था …..पर अब क्रोध नही उसे डर लगनें लगा ………कि कहीं कोई अप्रिय घटना तो नही घट गयी ।

सुदामा ! सुदामा ! उसके परिचित नें आवाज दी थी ………वो भीतर से दौड़कर बाहर आया ………”तेरे बालकों को पूतना खा गयी”…….ये क्या कह रहा था । अंदर से काँप गया वो ये सुनते ही ………मेरे बालकों को पूतना ? वो भागा था…….कहाँ ? मेरे बालक कहाँ हैं ?

राजमार्ग में भीड़ लगी है ……..पूतना खा गयी थी इसके बालकों को ….ओह ! कुछ हड्डियाँ बची थी ………वस्त्र पड़े थे उसी से पहचाना सुदामा माली नें……….वो रोया …….वो चीखा ………..पर लोग डरते थे कंस से………..वो सब वहाँ से चले गए ।

सुदामा माली रोता रोता कंस के पास आया …………कंस रंगेश्वर महादेव में बैठा हुआ था ………वो भी सुदामा के माला की प्रतीक्षा ही कर रहा था ……..कि – “महाराज ! महाराज ! मेरे बालकों को पूतना खा गयी ………मैं तो आपका अपना हूँ फिर मेरे साथ ऐसा क्यों ? वो चिल्लाया …….तो कंस नें बिना कुछ सुनें …….उससे कहा … पूजा के माला पुष्प कहाँ हैं ? “मेरे बालक मर गए हैं ….न्याय करो महाराज ! माली का हृदय चीत्कार कर रहा था ।

हट्ट ! दुष्ट कंस नें बिना कुछ सोचे समझे एक लात का प्रहार किया बेचारे सुदामा माली के वक्ष में …………..वो गिरा ………….फिर उठा ……अपनें आँसू पोंछे ………घर कि ओर चला गया ।

क्रमशः ….

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