श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! क्या कन्हैया वासुदेव है ? नन्द बाबा नें पूछा !!
भाग 1
महाराज उग्रसेन फिर से मथुरा के राजा बन गए हैं ……..वसुदेव देवकी नें आज कारागार से बाहर आकर खुली हवा में साँस ली है …..सेवक सेविकाओं नें उनको स्नान कराया ……सुगन्धित तैल का मर्दन किया ……सुन्दर सुन्दर वस्त्र धारण कराये ……….राजमहल तो वसुदेव और देवकी को ही उग्रसेन नें दे दिया था ……….जब वसुदेव नें मना किया तो उग्रसेन का कहना था ……..आपके पुत्र नें ही मुझे राज्य सत्ता दी है …….आपकी ही दी गयी गद्दी पर ये उग्रसेन आसीन है …..इसलिये राजमहल पर आप ही रहेंगे …………महाराज उग्रसेन की बात टाल न सके थे वसुदेव इसलिये इन्होनें राजमहल में ही रहना स्वीकार किया । श्रीकृष्ण का महल कुछ दूरी पर था ……..यमुना का किनारा शान्त वातावरण …नगर के कोलाहल से दूर ………….।
कंस की मृत्यु के बाद उसकी दो पत्नियाँ अपनें पिता के पास चली गयीं थीं …….बाकी कुछेक कंस के समर्थक जो थे उन्होंने भी मथुरा को छोड़ देना ही उचित समझा और रात ही रात में सब मथुरा से भाग गए थे ।
उद्धव विदुर जी को वृन्दावन में यमुना के किनारे बैठकर ये श्रीकृष्णचरितामृतम् सुना रहे हैं ।
तात ! उद्धव अब प्रसंग को आगे ले जाते हैं …………….
अरे ! बृजराज कहाँ हैं कृष्ण ? वसुदेव जी नें पूछा ।
सजल नयन से वसुदेव जी को देखा श्रीकृष्ण नें ………कुछ देर तक तो वो बोल ही न सके ………..कण्ठ भर आया था ………”वो यमुना के किनारे मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं” ……श्रीकृष्ण इतना ही बोले ।
वसुदेव नें तुरन्त रथ लिया और यमुना के किनारे बृजराज के पास चल दिए थे …………….तुम भी चलो कृष्ण ! एक बार कहा था वसुदेव जी नें ….पर श्रीकृष्ण बोले …..आप ही जाकर उन्हें ले आइये ।
वसुदेव जी चल दिए …….मन में उत्साह है बृजराज से मिलनें का ।
बाबा ! एक बात तो बताओ …….मथुरा में सब लोग अपनें कन्हैया को “वासुदेव” क्यों कह रहे हैं ? मैने एक नागरिक से पूछा तो कहनें लगा हमारे वसुदेव के पुत्र हैं ।………..ऐसा कुछ नही है ………मनसुख की बातों को बाबा बृजराज नें तुरन्त काट दिया था ………..आचार्य गर्ग नें जब नामकरण किया ना तब उन्होंने भी यही नाम रखा था ……..वासुदेव …………अब इसका मतलब ये थोड़े ही है कि वसुदेव का पुत्र है हमारा लाला !…….अपनें आँखें को मलनें लगे थे बृजराज ……..अपनें आँसुओं को छुपा रहे हैं ………….।
बाबा ! क्यों नही आया अभी तक कन्हैया ……श्रीदामा नें पूछा ।
वहाँ देखा नही …..कितनी भीड़ थी …..बाप रे ! मनसुख बोल रहा है …….बाबा ! मैं तो जा ही नही पाया अपनें कन्हैया तक ………उसको तो भीड़ नें उठा लिया कन्धे में ……..और जय वासुदेव ….जय जय हो वासुदेव की ………….बाबा ! बुरा लगता है ……जब अपनें कन्हैया को कोई वासुदेव कहता है तो ……पता नही क्यों ? मनसुख अपनें आँसुओं को पोंछनें लगा ।
मथुरा के लोग अच्छे नही है …………बृजराज भावुक हो गए हैं ।
अरे ! सम्मान ठीक है …..आदर स्वागत ठीक है ……पर कम से कम बेचारा बालक है ……….सुबह से कुछ खाया पीया नही है …….भूखा है ………..इन नगर के लोगों में समझ नही होती क्या ! फूल बरसाए जा रहे हैं , फूलों से क्या होगा ……..अरे ! लाला के पेट में तो कुछ जाना चाहिये ना ! बृजराज के नेत्र भी बहनें के लिये तैयार हैं ……पर बालकों के सामनें रोना उन्हें अच्छा नही लग रहा ।
कहीं किसी षड्यंत्र का शिकार न हो जाए हमारा कन्हैया ! बृजराज सोच रहे थे मन ही मन में…….पर ये शब्द उनके बाहर निकल गए ।
लठ्ठ बजा देंगे मथुरा में….मथुरा की ईंट से ईंट बजा देंगे अरे ! बाबा ! हम भी अहीर हैं……इन्हें क्या पता अहीर जात कितनी वीर होती है …….ग्वाल बाल एक साथ बोल उठे थे ।
तभी –
बाबा ! देखो रथ आरहा है …….रथ में हमारा कन्हैया है …..
नही है हमारा कन्हैया …….बृजराज बोले ।
पर ये कौन है रथ में ? मनसुख पूछ रहा है ।
” वसुदेव “
….बृजराज नें कहा और आगे गए रथ के पास ……रथ रुक गया था ।
मेरे भाई ! मेरे मित्र ! वसुदेव जी आगे बढ़े बृजराज को अपनें हृदय से लगानें के लिये…….बृजराज नें भी उत्साह का प्रदर्शन किया ।
कन्हैया नही आया ?
रथ को देख रहा है मनसुख ……और वसुदेव जी से पूछ रहा है ।
आप सबको उसनें महल में बुलाया है ………….वसुदेव जी नें कहा ।
पर बाबा ! हमें तो आज ही लौटना है ना वृन्दावन …….फिर ?
अभी कहाँ वृन्दावन ? मित्र बृजराज ! अब चलिये महल में ……..हमारा आतिथ्य तो स्वीकार करना ही पड़ेगा ।………बृजराज बहुत भोले हैं ……..मन की बात भी कह नही पाते ………वसुदेव जी का आग्रह देखकर वो कुछ बोल न सके ……..और अपनें साथ के समस्त ग्वालों को लेकर महल की ओर चल पड़े थे ।
पर हम कल ही कन्हैया को ले जायेंगे वृन्दावन ! हाँ महल आचुका था …….रथ से उतरते हुये बस इतना तो बोले बृजराज ।
आपका ही तो है श्रीकृष्ण …….हमारा क्या अधिकार उस पर ।
वसुदेव जी नें इतना कहा और रथ से नीचे उतर गए ।
क्रमशः …
शेष चरित्र कल –
