श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! विरहाकुल यशोदा मैया !!-भाग 1: Niru Ashra

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श्रीकृष्णचरितामृतम्

!! विरहाकुल यशोदा मैया !!

भाग 1

बृषभ के गले में बंधी घण्टी बजती है तो बृजरानी दौड़ पड़ती हैं द्वार की ओर…..द्वार खोलकर देखती हैं……पर बृजराज नही आये ।

आज तो चल दिए हैं…….फिर अभी तक क्यों नही आये ?

बेचैनी हो रही है बृजरानी को……..रोहिणी ! तू मत निकाल माखन …..मैं निकाल लुंगी ………कन्हैया को मेरे ही हाथ का माखन प्रिय है ……मैं निकालती हूँ उसके लिये माखन ………ये कहते हुये माखन निकालनें के लिये बैठ गयीं हैं बृजरानी …….वहाँ माखन कहाँ मिला होगा उसे …….मथुरा में भी तो यहीं से जाता है माखन …….है ना रोहिणी ?

हाँ जीजी ! रोहिणी ज्यादा कुछ बोल नही रहीं ……..उन्हें लग रहा है कि कन्हैया आएगा नही …………पर ये बात रोहिणी यशोदा से कहे कैसे ? ये ममता की मारी जी पायेगी उस अपनें लाला के बिना ।

दिन बीतता जा रहा है ………सूर्योदय के बाद अब सूर्यास्त भी होनें को आगया……….थोड़ी भी आहट होती है द्वार पर ……तो ये मैया दौड़ पड़ती है ……..आज दिन भर में करीब सौ बार तो दौडी ही होगी ………..ओह ! रोहिणी नें कहा भी आप थक गयी होगी जीजी ! बारबार मत दौड़ो ………….वैसे भी जीजी ! जब से कन्हैया गया है मथुरा के लिये तब से तुमनें कुछ खाया भी नही है ………और अब ऐसे दौड़ती रहोगी तो !

रोहिणी ! सूचना आयी थी ना कि चल पड़े हैं वृन्दावन के लिये बृजराज और मेरा लाला …….फिर इतनी देर क्यों लग गयी ? सन्ध्या होनें को आगयी है……….अन्धेरा छा रहा है अब तो ।

कहीं किसी गोपी के यहाँ तो नही गया ? हँसती हैं बृजरानी ! बड़ा बदमाश है ………..उसका मन तो लगेगा ही नही घर में ……..देखना , देखना रोहिणी ! उसका ब्याह होगा ना बरसानें से ……तब वो यहाँ कहाँ रहेगा …….घर जमाई बनकर रहेगा ……वहीं………

इतना कहकर फिर चुप हो जाती हैं…………एक बार बाहर जाकर देख आती हूँ……..बृजरानी ये कहते हुए बाहर आईँ …….खड़ी हो गयीं कोई बैल गाडी तो निकले …………कोई आरही है !

बृजरानी ! लाला आय गयो ? कोई गोपी पूछती है ।

नही, बस उदासी से भरी मैया सिर हिला देती हैं ।

अपलक देखती रहीं मथुरा के मार्ग की ओर ……………

जीजी ! दीया जला दूँ ? रोहिणी नें आवाज लगाई ।

नही, रुक मैं आरही हूँ …………..यशोदा ये कहते फिर भीतर आईँ …..दीया जलाया ……….पूजा कक्ष में दीया रखा ………एक देहरी में …..एक अपनें कक्ष में …….एक झरोखे में ।

धीरे से बृजराज की बैल गाडी पहुँची थी द्वार पर ………….यशोदा नें देखा ……..वो दौड़ी ……….दीया गिर गया …………वो बाबरी मैया गिराती गिरती द्वार तक पहुँची थी ।

देखा जब बृजराज को तो चौंक गयी ………हताश निराश बृजपति !

मन कह रहा है ……..पूछूँ कहाँ हैं मेरा लाला ? पर मन में अज्ञात भय है ……..मेरा लाला क्यों नही है इनके साथ ?

बिना कुछ बोले …..सिर झुकाये बृजराज बैलगाड़ी से उतरकर सीधे अपनें महल में चले गए ………बृजरानी नें देखा ……वो कुछ समझ नही पा रहीं कि क्या हुआ ? बैल गाडी को देखा……बैलगाड़ी के इधर उधर देखा……..कोई नही है ! मनसुख नही है ……श्रीदामा नही हैं …..ये दीखते तो इन्हीं से पूछ लेती ये बृजरानी ……पर कोई नही है …..।

भीतर आईँ यशोदा………अपनें वस्त्र ले कर स्नान करनें जा रहे थे बृजराज ………..बृजरानी नें आकर वस्त्र पकड़े …………

आप जल लेंगे ? बृजरानी नें अपनें पतिदेव से पूछा ।

सिर “ना” में हिलाया नन्दबाबा नें ………और यशोदा के हाथों से अपनें वस्त्र लेकर स्नान करनें के लिये जानें लगे ।

लाला ! किसी गोपी के यहाँ चला गया होगा ना ? बृजरानी नन्द बाबा के मुख में देखती हुयी पूछ रही हैं ……….

बृजराज कुछ उत्तर नही देते …….मुझे पता है…….आक्रामक.हंसतीं हैं मैया …….खाया पचता नही है उसका बिना गोपी के यहाँ गए ।

ओह ! पर गोपी के यहाँ जाकर माखन पेट भर के खा आया तो ?

अरे ! मेरा माखन निकालना तो व्यर्थ चला जायेगा …………..देखो ना ! मैने अपनें हाथों से माखन निकाला है……….बहुत दिन से मैने भी नही निकाला था ……….अब किसके लिये निकालती ?

एकाएक हिलकियों से रो पड़े बृजपति……………..इस तरह कभी रोते हुये यशोदा नें भी नही देखा था ……………

आप रो रहे हो ? क्या हुआ ? बोलो ना ! क्या हुआ ?

यशोदा घबड़ाकर पूछ रही हैं अपनें पति नन्द से ।

“कन्हैया हमारा पुत्र नही है वो वसुदेव का पुत्र है”

क्रमशः …
शेष चरित्र कल –

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