श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! “श्रीकृष्ण सुदामा मिलन”- उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 63 !!
भाग 1
महाराजाधिराज श्रीद्वारिकाधीश कृष्णचन्द्र जू की – सदाईं जय हो जय हो जय हो !
द्वारपाल महल के भीतर प्रवेश कर चुके थे ।
मध्याह्न का समय बीत रहा था , अभी अभी तो राजभोग करके श्रीकृष्णचन्द्र जू झूले में आकर बैठे ही थे , रुक्मणी ने ताम्बूल लाकर दिया था , हंसते हुए श्रीकृष्ण ने रुक्मणी के द्वारा दिया गया ताम्बूल खाया था ।
तभी दो द्वारपालों ने सावधानी पूर्वक महल में प्रवेश किया ।
जय हो, महाराजाधिराज श्रीद्वारिकाधीश कृष्णचन्द्र जू की सदाईँ जय हो ।
रुक्मणी से ध्यान गया द्वारपालों पर श्रीकृष्ण का ।
कहो द्वारपाल ! इस समय , महल में कैसे आए ?
हे भगवन् ! कोई आपसे मिलने आया है ! सिर झुकाकर द्वारपालों ने कहा ।
कौन आया है ? क्या देवराज इन्द्र आए हैं ? या ब्रह्मदेव पधारे हैं या भगवान नागेश की सवारी इस और आज मुड़ गयी ? बड़े प्रेम से ताम्बूल चबाते हुए श्रीकृष्ण अपने द्वारपालों से पूछ रहे थे ।
द्वारपालों ! कोई सामान्य राजा हो तो मैं इस समय मिलने का इच्छुक नही होता ये तुम सब को पता है और मिलना भी हो तो सभा में मिले …..इसलिए बताओ , कौन आया है ? इन्द्र , ब्रह्मा या रूद्र ? श्रीकृष्ण ने फिर पूछा था ।
नही, नही द्वारिकानाथ ! देवराज या ब्रह्मदेव नही हैं , कोई विपन्न सा एक ब्राह्मण आया है ।
तो वो जो माँगे उसे दो और विदा करो , श्रीकृष्ण उठकर जाने लगे थे वहाँ से , उन्हें सभा में भी जाना था ।
पर वो कुछ माँगता नही हैं , हमने उससे कहा , कुछ खा लो भूख लगी होगी तो वो कहता है मुझे क्षुधा नही है , द्वारपालों की बातें सुनकर रुक गए थे श्रीकृष्ण ।
धन आदि की लालसा ? श्रीकृष्ण ने पूछना चाहा ।
नही , नही भगवन् ! उस ब्राह्मण के मन में कोई लालसा , कोई चाहना नही हैं ।
श्रीकृष्ण मुस्कुराए और महारानी रुक्मणी की और देखकर बोले , अद्भुत ब्राह्मण है फिर तो , सुवर्ण की द्वारिका में आने के बाद भी कोई लालसा – कामना नही !
नही , कोई बाहरी वस्तु उस ब्राह्मण को आकर्षित नही कर रही भगवन् ! द्वारपालों की बातें सुनकर श्रीकृष्ण फिर वापस झूले में बैठ गए थे ।
“आपको सभा में भी जाना है” रुक्मणी ने स्मरण दिलाया ।
हाँ , पर ये ब्राह्मण ! फिर अपने द्वारपालों की और देखते हुए पूछने लगे , अच्छा ! कोई कामना कोई लालसा नही है तो यहाँ द्वारिका में क्यों आया है वो ब्राह्मण ? श्रीकृष्ण चकित हैं ।
वो आपसे एक बार मिलना चाहता है ! द्वारपालों ने कहा ।
नाथ ! उसके मन में कोई कामना नही है , बस एक ही कामना लेकर वो आया है द्वारिका में , कि मैं द्वारिकाधीश से मिलूँगा , नाथ ! वो आपको द्वारिकाधीश भी नही कहता , आपका नाम लेता है । द्वारपालों ने ये बात सिर झुकाकर की ।
श्रीकृष्ण उठकर खड़े हो गए , तुमने पूछा नही क्यों नाम ले रहा है मेरा , मैं तो इस द्वारिका का राजा हूँ ! हमने उससे कहा तो वो कहता है , “आप उसके बचपन के मित्र हो” ।
श्रीकृष्ण चौंक गए , उनके देह में रोमांच होने लगा था । मेरा मित्र !
देखने में कैसा है वो ब्राह्मण ?
द्वारिकानाथ ने द्वारपालों को पकड़ लिया था , वो भी श्रीकृष्ण का स्पर्श पाकर गदगद हो उठे थे , रुक्मणी महारानी ये देखकर चकित हो रही थीं ।
बताओ ! कैसा है वो ब्राह्मण ! बताओ ! झकझोरने लगे थे द्वारपालों को ।
हे भगवन् ! उस ब्राह्मण का देह अत्यंत दुर्बल है , हमें आश्चर्य होता है कि वो चल फिर कैसे रहा है , उसके देह को देखकर लगता है उसने कई दिनों से अन्न का दाना भी नही खाया होगा ।
उसके देह की समस्त हड्डियाँ , कोई भी गिन सकता है , वो जब उठता है और चलता है तब ऐसा लगता है कि अब गिरा की तब गिरा । उसके पैरों की विवाहियाँ फटी हुई हैं उनमें से रक्त भी निकल रहा है ।
द्वारपाल आगे बोले – पर भगवन् ! भाल पर दिव्य तेज दिखाई देता है , इतने पर भी वो दुखी नही है वो बहुत प्रसन्न है। हाँ आपके महल को चकित होकर देख रहा है , बस आपके बारे में सुनना चाहता है वो , आपके विषय में ही बोलना चाहता है वो ।
कमल नयन के नयनों में अश्रु भर गए थे ये सब सुनते हुए ।
मेरा मित्र कहता है वो अपने आपको ? श्रीकृष्ण ने फिर पूछा ।
हाँ , द्वारपालों ने कहा ।
वो बात बताना ! एक द्वारपाल दूसरे से बोला ।
रहने दे , द्वारपाल ने धीरे से कहा ।
क्या बात है ! बोलो , श्रीकृष्ण उत्सुक हैं ।
वो कह रहा था कि उज्जैन में आप दोनों पढ़े हैं , और चना भी ,
हाँ , हाँ, अश्रु टपक पड़े श्रीकृष्ण के ।
और नाम अपना बता रहा है , श्री कृष्ण बोल पड़े – “सुदामा” ।
हाँ , यही नाम बताया था ।
क्रमशः …
शेष चरित्र कल –


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