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August 30, 2025 2:07 am

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કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

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श्रीकृष्णचरितामृतम्-!!कालिन्दी विवाह – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 24” !!- : Niru Ashra

श्रीकृष्णचरितामृतम्-!!कालिन्दी विवाह – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 24” !!- : Niru Ashra

श्रीकृष्णचरितामृतम्

!! कालिन्दी विवाह – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 24” !!

भाग 2

क्या आप सूर्य पुत्री हो ?

कालिन्दी जब महल में आगयीं……तब स्वागत के लिये ये तीनों रानियाँ वहाँ पहुँच गयीं थीं…..जलपान आदि करके जब बैठीं और परिचय हुआ सबका आपस में……..तब सत्यभामा नें प्रथम प्रश्न यही किया था ।

हाँ, कालिन्दी नें सिर हिलाया – मैं सूर्य पुत्री हूँ ।

फिर कैसे द्वारिकाधीश से मिलना हुआ ……….और सम्बन्ध कैसे जुड़ा ।

सत्यभामा कुछ भी पूछ लेती हैं……….थोडा चंचल स्वभाव है ।

शरमा कर कालिन्दी नें अपनें विवाह के बारे में बताया ।

सूर्य मेरे पिता है ………यमराज मेरे भाई हैं हाँ, भाई तो मेरे शनि देव भी हैं पर मेरा संग उनसे ज्यादा नही हुआ …….क्यों की पिता जी नें उन्हें अपनें से दूर कर दिया था ………..हाँ, यमराज भैया की मैं लाड़ली बहन बनी रही ……..मैं अपनें पिता की भी लाड़ली थी ।

मुझे श्याम रंग प्रिय है………मैं विवाह करूंगी तो श्याम सुन्दर से ।

एक दिन मैने भी कह दिया ।

श्याम सुन्दर ? मेरे पिता और भैया चौंक गए…..

हाँ गोलोक बिहारी श्याम सुन्दर ।

पर वो कैसे मिलेंगे तुम्हे ? भैया यमराज नें कहा ।

क्यों ? तप करूंगी मैं ! मैने भी कह दिया था ।

ओह ! तप के लिये तो तुम्हे पृथ्वी में जाना पड़ेगा ……….क्यों की ऊपर के लोकों में तप का फल मिलता नही है ।

बहन ! अगर सच में तुम श्याम सुन्दर को वर के रूप में पाना चाहती हो तो पृथ्वी में जाओ ……….द्वापर में श्याम सुन्दर गोलोक से अवतार लेकर पृथ्वी में जानें वाले हैं ……वहीं तप करना और जल के रूप में प्रवाहित होती रहना ………..।

फिर ?

इतना कहकर कालिन्दी जब रुकीं तब सत्यभामा नें अपनें कपोल में हाथ रखकर पूछा …….फिर ?

फिर ……..मैं कलिन्द नामक पर्वत में उतरी थी ……वहाँ से जल के रूप बहती हुयी चली ……………….

मैं जब पृथ्वी में आयी थी तो वो दिन था कार्तिक शुक्ल द्वितीया ……..मेरा पृथ्वी में आना और मेरे भैया यमराज का भी मुझ से मिलनें आना ।

अब थोडा जल रूप से बाहर भी आओ बहन ! पृथ्वी में चलना सीखो ……..रूप धारण करो ……..मानवी की तरह बनो ………मेरे भैया नें मुझे बहुत कुछ समझाया …सिखाया ।

मेरे पांव पृथ्वी को छूते नही थे …….मैने बहुत अभ्यास किया ……..जब सफल हुयी तब मैने तप करना प्रारम्भ किया ……..बहुत तप किया श्याम सुन्दर को पति पानें के लिये …..कालिन्दी इतना बोलकर चुप हो गयीं थीं ।

पर द्वारिकाधीश और तुम मिले कहाँ ?

सत्यभामा को मुख्य तो यही जानना था …..सत्यभामा की बात सुनकर रुक्मणी और जाम्बवती हंसीं ….खूब हंसीं ।

चुप , चुप, बता रही हैं …..सुनो ध्यान से ………रुक्मणी जी और जाम्बवती की हंसी रुकवाई और कालिन्दी की बात बड़े ध्यान से सुननें लगीं थीं सत्यभामा ।

मैं तप में लीन थी…….द्वारिकाधीश अपनें सखा अर्जुन के साथ भ्रमण में निकले थे…….वे स्वयम् नही आये मेरे पास अपनें सखा को भेजा ………और इनके सखा नें मुझे तप में देखकर मुझे जगाया ….फिर पूछनें लगे …..कौन हो ? तप क्यों कर रही हो ?

मैने भी अपना परिचय दिया……..मैं सूर्य की पुत्री कालिन्दी हूँ…..

श्याम सुन्दर को पति के रूप में चाहती हूँ …….इसलिये तप कर रही हूँ ।

ये कहते हुये कालिन्दी शरमा रही थीं ।

अरे ! वो तो मेरे साथ हैं …….अर्जुन नें कहा ।

मैं प्रसन्नता से उछल पड़ी …….कहाँ हैं ?

तभी मेरे सामनें मुस्कुराते हुये श्याम सुन्दर खड़े हो गए थे ……

हाय ! मैं तो लजा गयी ……….कुछ नही बोल सकी ।

तभी नभ से मेरे पिता सूर्य उतरे ……..उन्होंने श्याम सुन्दर को नमस्कार किया ……..और हाथ जोड़कर बोले …….मेरी पुत्री को आप स्वीकार करें मैं धन्य हो जाऊँगा……….द्वारिकाधीश नें जब मुस्कुराकर मेरी ओर देखा तब तो मैं आनन्दित हो उठी थी ………….मेरी जन्मों जन्मों की साध आज पूरी हो गयी थी ………..मैं क्या कहूँ ……..मेरे भैया यमराज भी वहाँ पर आये ……..मेरे दूसरे भाई वो कभी मेरे पिता जी के सामनें नही पड़े थे किन्तु उस समय वो भी आये शनिदेव ………सबनें मिलकर मेरा कन्या दान किया …………..मैं बता नही सकती वो क्षण मेरे लिये कैसे थे …………..कालिन्दी इतना ही बोलीं …..और चुप हो गयीं ।

लम्बी साँस ली सत्यभामा नें…..जीजी ! सुनी द्वारिकाधीश की लीला !

हाँ , सुन ली …….अब चलो ! ये थकी हैं और विश्राम भी तो करेंगी ।

रुक्मणी नें कहा और सब जब जानें लगीं तो – उधर से द्वारिकाधीश आरहे थे । सत्यभामा सहजता में ऊँगली में गिनती हुयी जा रही थीं …..एक रुक्मणी जीजी, दूसरी जाम्बवती और तीसरी मैं सत्यभामा और ये चौथी कालिन्दी ……अब और कितनी ? द्वारिकाधीश सहज खिलखिलाकर हंस दिए थे । द्वारिकाधीश को देखा तो सत्यभामा शरमा कर भाग गयीं ।

शेष चरित्र कल –

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