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August 30, 2025 6:40 am

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श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! मित्रविन्दा स्वयम्वर- “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 25” !!-भाग 2 : Niru Ashra

श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! मित्रविन्दा स्वयम्वर- “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 25” !!-भाग 2 : Niru Ashra

श्रीकृष्णचरितामृतम्

!! मित्रविन्दा स्वयम्वर- “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 25” !!

भाग 2

अगर नही आये तो ? मित्रविन्दा पूछती है ।

आएगा, मेरा वासुदेव अवश्य आएगा …..उसे भूआ का रिस पता है …..मैं जीवन भर उससे बोलूंगी नहीं …..माता राजाधिदेवी नें कहा ।

हाँ, अगर वो नही आये तो …………शून्य में खो जाती मित्रविन्दा …….

आएगा अवश्य आएगा ……….क्यों नही आएगा ……मित्रविन्दा के सिर में हाथ रखते हुये कह रही थीं उसकी माता ।

मधुर स्वप्न देख रही थी मित्रविन्दा, श्रीकृष्ण को अपनें पति के रूप में देख रही थी…. स्वप्न में खो जाती ……..राजाधिदेवी इस बात से पूर्ण अनभिज्ञ थीं ।


स्वयंवर प्रारम्भ होनें वाला है…………सब देश विदेश के राजा महाराजा आ चुके हैं ……..दुर्योधन, दुःसासन आदि विशेष आये हैं ……बाकी शताधिक राजा और आये …स्वयंवर है …….तो राजा तो आनें ही थे ।

पर श्रीकृष्ण अभी तक क्यों नही आये ………….राजाधिदेवी पूछ रही हैं अपनें मंत्रियों से …….पर वो क्या उत्तर दें ।

माँ ! वो क्यों नही आये ! मित्रविन्दा को उसकी सखियाँ सजा रही हैं ….पर सजनें में उसकी कोई रूचि नही है …….वो क्यों नही आये !

उसका मन चंचल हो रहा है …….उसे अब घबराहट होनें लगी है ।

बेटी ! द्वारिका से आना है ……मार्ग में कई व्यवधान पड़ते हैं ……..माता समझा रही है अपनी पुत्री को …….।

स्वयंवर प्रारम्भ किया जाए ……..दुर्योधन बोल उठा था ।

तभी ……गरुणध्वज रथ दूर से आता हुआ दिखाई दिया……सैनिकों नें जाकर सूचना दी ……माता ! द्वारिकाधीश आगये हैं !

क्या ! उछल पड़ी मित्रविन्दा ……….उसके मुखमण्डल में प्रसन्नता छा गयी थी …………..

हाथ में जयमाला लिये मित्रविन्दा को लाया गया ……….राजा महाराजा सब लोग हैं वहाँ पर …….स्वयंवर के लिये आये हैं ।

सखियों के साथ मित्रविन्दा जयमाला लिये चल पडीं ……चुनाव वर का कन्या को करना था…….शताधिक राजाओं को छोड़ती हुयी मित्रविन्दा चलती गयी …….राजाओं की ओर एक बार भी नही देखा उसनें …..दुर्योधन क्रोध से लाल हो उठा था …….ये क्या है ! हमारा इतना बड़ा अपमान !

पर स्तब्ध सभा तब हो गयी जब मित्रविन्दा नें श्रीकृष्ण के गले में जयमाला डाल दी थी ……..करतल ध्वनि नही हुयी ……राजमाता भी चौंक गयीं ………ये क्या किया मित्रविन्दा नें ? ये तो भाई लगते हैं !

ओह ! आपस में ही विवाह करना था तो हमें क्यों बुलाया ………दुर्योधन चिल्ला उठा ………….ये तो अमर्यादित है ……….वो बोलता गया …….सभा देख रही है श्रीकृष्ण के मुखमण्डल में ।

श्रीकृष्ण नें मित्रविन्दा को देखा …………वो असहाय सी श्रीकृष्ण को ही निहार रही थी ……..आगे बढे श्रीकृष्ण और मित्रविन्दा को अपनी बाँहों में उठाकर चल पड़े …..गरुणध्वज रथ उनका सामनें खड़ा था उसी में ले जाकर रखा मित्रविन्दा को और अपनें बड़े भाई के साथ वो रथ में बैठकर निकल पड़े थे द्वारिका के लिये ।

शेष चरित्र कल –

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Author: admin

Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877

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