श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! महारानी नाग्नजिती – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 26” !!
भाग 1
” सुनो ! सुनो ! कौशल पुर के राजा नग्नजीति की राजकुमारी का स्वयम्वर है……सप्त बृषभों को एक साथ नाथना है…..क्या इस पृथ्वी में कोई वीर बचा नही…..एक वर्ष से चल रहे इस स्वयम्वर में कोई राजा उन बृषभों को नथ न सका….क्या इस द्वारिका में कोई वीर है ” ।
समुद्र के किनारे श्रीकृष्ण आज भ्रमण कर रहे थे…..उनके प्रिय अर्जुन साथ में हैं ……प्रथम बार अर्जुन आये हैं द्वारिका…..द्वारिकाधीश इस बात को लेकर अतिप्रसन्न हैं …………..पर उसी समय कुछ कौशल देश के वन्दी जनों की ये घोषणा श्रीकृष्ण नें सुनी ……….पूरे भारत वर्ष में घूम घूम कर ये कौशल देश की विरदावली गा रहे थे और अपनें राजा की प्रतिज्ञा भी सुना रहे थे ।
मुस्कुराये श्रीकृष्ण ……और अपनें सखा अर्जुन की ओर देखकर बोले ………क्या कहते हो ? चलें कौशल देश ?
अर्जुन को कहाँ आपत्ति है ……..वो तो श्रीकृष्ण के साथ कहीं भी चलनें के लिये तैयार है ………चलिये केशव ! पर हम दोनों ही चलेंगे !
अर्जुन नें कहा ।
……हाँ हम दोनों रहेंगे तभी आनन्द आएगा ! तीसरा सह्य न होगा ।
इतना कहकर बस चल पड़ी थी दोनों नर नारायण की जोड़ी.
……….बड़ी सुन्दरी विश्व सुन्दरी कहो तो अतिशयोक्ति कहाँ …….कौशल पुर की राजकुमारी नाग्नजिती ।
उसी के स्वयम्वर में ये दोनों चल पड़े थे ….सहज और निर्दोष रूप से ।
कौशल पुर .( वर्तमान – छत्तीसगढ़ )……..वहाँ के राजा हैं नग्नजित ………..प्रतापी राजा हैं । उनकी एक ही तो पुत्री है नाग्नजिती …….सुन्दर बहुत है ……….इसलिये स्वयम्वर का आयोजन कर दिया राजा नें …..और उस स्वयम्वर में प्रतिज्ञा की कि उनके यहाँ जो बड़े बड़े बैल हैं …..बृषभ हैं ………..एक दो नही सात बृषभ ……..उनको एक साथ नाथना है…और जो नथ देगा उसे राजा अपनी अतिसुन्दरी पुत्री देंगे………….प्रतिज्ञा की खबर भारत वर्ष में फैलाई गयी थी …. राजा महाराजा आने लगे थे ………..बैल साधारण – सामान्य नही थे ………..कई राजाओं को तो इन बैलों नें मार भी दिया था ……..घायल तो अधिकतर सब ही हो रहे थे ।
एक वर्ष से ये स्वयम्वर चल रहा था …….राजा आते अपनी शक्ति आजमाते …..किन्तु ……………..
एक बड़ा सा क्षेत्र था ……उसमें ही इन बैलों को रखा गया था ……….चारों और कँटीले बाड़ लगाये गए थे …….ताकि आम जनमानस तक ये पहुँच न सकें ……वैसे ये बृषभ सीधे सादे लोगों को क्षति नही पहुंचाते थे ……..हाँ जो इन्हें बाँधनें का प्रयास करता उसे ये छोड़ते नही थे ……….वहाँ का जन मानस इनकी पूजा करता था ……धर्म रूप मानता था इन्हें ………अहंकार की गन्ध इन बृषभों को प्रिय नही थी ।
आम जनमानस खड़े होकर नित्य ये स्वयम्वर देखता था ………उनका मनोरंजन भी होता ………..पर अपनी राजकुमारी को वर नही मिल रहा इस बात का दुःख भी होनें लगा था अब …..क्यों की स्वयम्वर एक वर्ष से चल ही रहा था …..राजकुमारी नित्य आकर बैठती थी ……हाथ में वर माला लिये …….फिर लौट जाती थी ……क्यों की राजा या तो मारे जाते बृषभों के द्वारा या घायल हो जाते थे ।
ओह ! ये पीताम्बरधारी !
क्रमशः…
शेष चरित्र कल –


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