जय श्री कृष्ण
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आज तुलसीदासजी को सादर समर्पित श्रद्धा सुमन।
तुलसीदास जी की हस्तलिपि अत्यधिक सुन्दर थी ।लगता है जैसे उस युग में उन्हें कैलोग्राफी की कला आती थी।
उनके जन्म-स्थान राजापुर के एक मन्दिर में श्रीरामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड की उनकी हस्तलिखित एक प्रति अभी भी सुरक्षित रखी हुई है। उसी प्रति के साथ रखे हुए एक कवि मदनलाल वर्मा 'क्रान्त' की हस्तलिपि में तुलसी के व्यक्तित्व व कृतित्व को रेखांकित करते हुए निम्नलिखित दो छन्द भी उल्लेखनीय हैं जिन्हें हिन्दी अकादमी दिल्ली की पत्रिका इन्द्रप्रस्थ भारती ने सर्वप्रथम प्रकाशित किया था।
इनमें पहला छन्द सिंहावलोकन है जिसकी विशेषता यह है कि प्रत्येक चरण ( पंक्ति) जिस शब्द से समाप्त होता है उससे आगे का उसी से प्रारम्भ होता है। प्रथम व अन्तिम शब्द भी एक ही रहता है। काव्यशास्त्र में इसे अद्भुत छन्द कहा गया है। कुशल कवि ही इस छंद में रचना कर पाते हैं। यही छन्द एक अन्य पत्रिका साहित्यपरिक्रमा के तुलसी जयन्ती विशेषांक में भी प्रकाशित हुए थे वहीं से उद्धृत किये गये हैं
तुलसी ने मानस लिखा था जब जाति-पाँति-सम्प्रदाय-ताप से धरम-धरा झुलसी।
झुलसी धरा के तृण-संकुल पे मानस की पावसी-फुहार से हरीतिमा-सी हुलसी।
हुलसी हिये में हरि-नाम की कथा अनन्त सन्त के समागम से फूली-फली कुल-सी।
कुल-सी लसी जो प्रीति राम के चरित्र में तो राम-रस जग को चखाय गये तुलसी।
आत्मा थी राम की पिता में सो प्रताप-पुन्ज आप रूप गर्भ में समाय गये तुलसी।
जन्मते ही राम-नाम मुख से उचारि निज नाम रामबोला रखवाय गये तुलसी।
रत्नावली-सी अर्द्धांगिनी सों सीख पाय राम सों प्रगाढ प्रीति पाय गये तुलसी।
मानस में राम के चरित्र की कथा सुनाय राम-रस जग को चखाय गये तुलसी।
पहला छंद माता हुलसी व दूसरा छंद पिता आत्माराम को समर्पित है।
कवि वर रहीम ने भी तुलसी की माताजी को एक दोहे में स्मरण किया है।
प्रसंग यह है कि
एक निर्धन ब्राह्मण को विवाह करना था उसके लिए आर्थिक मदद चाहिए थी। तो तुलसीदास जी ने उसको रहीम कवि के पास भेजा । और दोहे की एक यह पंक्ति लिख करके दी।
” सुरतिय ,नरतिय,नागतिय, यह चाहत सबकोय। “
सुरतिय अर्थात लक्ष्मी, धन ।नरतिय अर्थात् पत्नी। और नागतिय अर्थात मणि ।
इसको सब चाहिये।
रहीम ने उसको पर्याप्त धन प्रदान किया और इस दोहे की दूसरी पंक्ति लिखकर दोहा पूर्ण किया ।
” गोद लिए हुलसी फिरे, तुलसी सो सुत होय।।”
आशीर्वाद भी दिया और संकेत यह भी दिया कि जिस प्रकार माता हुलसी को तुलसीदास जैसा पुत्र उत्पन्न हुआ वैसा इसको भी तुलसीदास जैसा पुत्र उत्पन्न हो और उसकी पत्नी उसे प्रसन्नता पूर्वक गोद में ले।
जय श्री कृष्णा जी।
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