श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! श्रीकृष्णपटरानी “भद्रा” – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 27” !!
भाग 1
भद्रा नाम है इस नई वधू का ……..ये सातवी पटरानी हैं अपनें श्रीकृष्ण की …..द्वारिका में आजकल भद्रा का नाम आम जन के मुख पर है ।
भद्रा ! तुम जादू जानती हो ? सत्यभामा किसी को कुछ भी कह देती हैं………नही, जादू नही …..पर हाँ , मुझे सिद्धि प्राप्त है …..भद्रा नें सत्यभामा से कहा ।
सिद्धि मतलब ? क्या तुम पुरुष भी बन सकती हो ?
छि ! आप कुछ भी बोलती हैं…भद्रा को ये बात अच्छी नही लगी थी ।
हटो ! क्यों परेशान कर रही हो बेचारी नव वधू को ……रुक्मणी जी आगयीं थीं और सत्यभामा को डाँटनें लगीं ।
जीजी ! मैं तो बस पूछ रही थी ………..सत्यभामा नें भद्रा की ओर देखकर कहा …………
हाँ, ये पूछ रही थीं…..मुझे बुरा नही लगा ।…..भद्रा शान्त हैं सौम्य हैं ।
मुझे सिद्धि प्राप्त है …..पर कैसे मिली ये सिद्धि मुझे पता नही …..भद्रा अपनें बारे में बता रही हैं ।
कहते हैं – मन की एकाग्रता सिद्ध हो …..तो कोई भी कार्य असम्भव नही होता …….मेरा मन पूर्ण एकाग्र है, भद्रा नें कहा था ।
सत्यभामा रूचि लेकर सुन रही हैं ……………..
मैं बचपन में अपनी माता को खूब छकाती थी ……..कुछ भी रूप धर लेती थी……..मेरी माँ मुझे खोजती रहती ………..पर ये बचपन की बातें हैं……….भद्रा कम बोलती हैं………बात कह दी फिर चुप हो गयीं …….जब तक कोई आगे न पूछे वो बोलती नही हैं ।
क्या अब रूप नही बदल सकतीं ? सत्यभामा नें पूछा ……….इस बात पर भद्रा हंसी …………हंसी भी बड़ी सौम्य है इनकी ।
बदल सकती हूँ पर अब उन सिद्धियों में मेरी कोई रूचि नही है !
फिर किसमें रूचि है ? सत्यभामा को कुछ भी कहना है ।
द्वारकाधीश के चरणों में मेरी रूचि है अब ……..मुझे मिल गए वो चरण ……जिसमें समस्त सिद्धियाँ वास करती हैं ……..भद्रा नें ये बात ऐसी कह दी थी कि अब सत्यभामा को चुप होना ही पड़ा ।
वसुदेव के दूर की बहन हैं ………नाम है श्रुतकीर्ति ………उनके पति शीघ्र ही पधार गए ……कैकेय देश के राजा थे ये ……धृष्टकेतु इनका नाम था …….राजा बड़े अच्छे थे ……किन्तु वृद्धावस्था से पहले ही इनका शरीर शान्त हो गया था ………भद्रा इनकी पुत्री थीं ……….भाइयों नें पिता की कमी अनुभव में आनें नही दी ……….भद्रा को जन्मजात ही सिद्धियाँ मिल गयीं थीं …………ये रूप बदल सकतीं थीं ……….किन्तु जैसे जैसे बड़ी होती गयीं …………शान्त और गम्भीर होनें लगीं ………बातें करना तो लगभग इन्होनें छोड़ ही दिया था ।
वासुदेव ! अकेले में आह भरतीं…….रात रात भर जागकर श्रीकृष्ण को अपनें मन की आँखों से निहारतीं ……ओह ! ये प्रेम भी !
और फिर प्रियतम के मादक स्वप्न…….सबकुछ भूल जाती थी भद्रा ।
क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –


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