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August 30, 2025 12:35 pm

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કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

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श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! श्रीकृष्णपटरानी “भद्रा” – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 27” !!-भाग 2: Niru Ashra

श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! श्रीकृष्णपटरानी “भद्रा” – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 27” !!-भाग 2: Niru Ashra

श्रीकृष्णचरितामृतम्

!! श्रीकृष्णपटरानी “भद्रा” – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 27” !!

भाग 2

सत्यभामा रूचि लेकर सुन रही हैं ……………..

मैं बचपन में अपनी माता को खूब छकाती थी ……..कुछ भी रूप धर लेती थी……..मेरी माँ मुझे खोजती रहती ………..पर ये बचपन की बातें हैं……….भद्रा कम बोलती हैं………बात कह दी फिर चुप हो गयीं …….जब तक कोई आगे न पूछे वो बोलती नही हैं ।

क्या अब रूप नही बदल सकतीं ? सत्यभामा नें पूछा ……….इस बात पर भद्रा हंसी …………हंसी भी बड़ी सौम्य है इनकी ।

बदल सकती हूँ पर अब उन सिद्धियों में मेरी कोई रूचि नही है !

फिर किसमें रूचि है ? सत्यभामा को कुछ भी कहना है ।

द्वारकाधीश के चरणों में मेरी रूचि है अब ……..मुझे मिल गए वो चरण ……जिसमें समस्त सिद्धियाँ वास करती हैं ……..भद्रा नें ये बात ऐसी कह दी थी कि अब सत्यभामा को चुप होना ही पड़ा ।


वसुदेव के दूर की बहन हैं ………नाम है श्रुतकीर्ति ………उनके पति शीघ्र ही पधार गए ……कैकेय देश के राजा थे ये ……धृष्टकेतु इनका नाम था …….राजा बड़े अच्छे थे ……किन्तु वृद्धावस्था से पहले ही इनका शरीर शान्त हो गया था ………भद्रा इनकी पुत्री थीं ……….भाइयों नें पिता की कमी अनुभव में आनें नही दी ……….भद्रा को जन्मजात ही सिद्धियाँ मिल गयीं थीं …………ये रूप बदल सकतीं थीं ……….किन्तु जैसे जैसे बड़ी होती गयीं …………शान्त और गम्भीर होनें लगीं ………बातें करना तो लगभग इन्होनें छोड़ ही दिया था ।

वासुदेव ! अकेले में आह भरतीं…….रात रात भर जागकर श्रीकृष्ण को अपनें मन की आँखों से निहारतीं ……ओह ! ये प्रेम भी !

और फिर प्रियतम के मादक स्वप्न…….सबकुछ भूल जाती थी भद्रा ।

ऐसी अद्भुत सिद्धि सम्पन्न कन्या तो जिसे हृदय से चाहेगी …..उसे ही वरण करेगी ………वरण तो इसनें कर लिया था …..वासुदेव को ।

अब बस परिवार में कहनें की देरी थी ………तो आज कह भी दिया ।

बहन भद्रा ! कहो तो तुम्हारे लिये स्वयम्वर रख दें ……..या बताओ तुम्हे कोई प्रिय है ? भाई खुले मन के थे …….उन्होंने अपनी बहन भद्रा से पूछना उचित समझा…..क्यों की भद्रा को किसी के भी साथ ऐसे बाँधा नही जा सकता था……..ये अद्भुत सिद्धि सम्पन्न जो थी …..रूप बदल कर भाग गयी तो ।

माँ ! मैं द्वारिकाधीश को चाहती हूँ ………अपनी माँ श्रुतकीर्ति की ओर देखकर बोली थी भद्रा ।

इस बात से इंकार करनें का प्रश्न ही नही था ….माँ भी प्रसन्न थीं ……और भाई भी …………..

तो नारियल भेजा जाए द्वारिका ……..भाइयों नें कहा ।

भद्रा शरमा गयी और अपनें महल में चली गयीं ।

नारियल भेजा गया……..वसुदेव जी मुस्कुराये……..श्रीकृष्ण को बुलाकर पूछा ……तो श्रीकृष्ण नें भी यही कहा ……आप जैसा कहें !

बस बरात गयी थी कैकेय देश ……..बाजे गाजे सब बजे थे ……….और धूम धाम से कन्या लेकर श्रीकृष्ण अपनी द्वारिका आ भी गए थे ।


तुम द्वारिकाधीश के सामनें बिल्ली बन सकती हो ……वो डर जायेंगे !

सत्यभामा के इस सहज कथन पर भद्रा बहुत हंसीं थीं…….बहुत ।

आपनें मुझे बचपन की बात याद दिला दी ……मैं अपनी माँ के सामनें बिल्ली भी बनी हूँ ….और वो मुझे पुरे राज प्रासाद में खोजती फिरीं थीं ………..भद्रा अभी भी हंस रही हैं ।

तभी अन्तःपुर में द्वारिकाधीश आगये ………पर भद्रा की हंसी रूक नही रही ।

क्या हुआ ? द्वारिकाधीश नें पूछा ।

सत्यभामा जीजी बहुत हंसाती हैं ………….भद्रा नें कहा ।

अब मेरे नाथ नई नई वधुओं को लाते हैं तो उन्हें प्रसन्न भी हमें रखना होगा ना ! सत्यभामा नें कहा ……तो रुक्मणी जी नें उसे चुप कराया था ।

शेष चरित्र कल –

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