श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! हास्य विनोद – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 29” !!
भाग 2
रुक्मणी इसका क्या उत्तर दें !
ओह ! तुमनें सोचा होगा …….हाँ , हाँ तुमनें मुझे लिखा भी था पत्र में …..हे भुवन सुन्दर ! मैं सुन्दर ? श्रीकृष्ण व्यंग में हंसे ………वृन्दावन वाले मुझे श्याम सुन्दर कहते हैं ……..कृष्ण ! काला ……..मैं काला हूँ …………..फिर मुझ से विवाह क्यों ?
श्रीकृष्ण कुछ देर के लिये चुप हो गए ……और रुक्मणी के मुख को देखनें लगे …..कही कुछ क्रोध के चिन्ह ! पर नही ….रुक्मणी चरणों की ओर ही दृष्टि टिकाये हुए हैं ………….
अच्छा ! अच्छा ! तुम सोच रही हो …………मैं वीर हूँ ……….यही तुमनें पत्र में लिखा भी था कि हे परम वीर ! मैं वीर ? अरे ! मैं तो डरपोक हूँ ….समुद्र के बीच में आकर रह रहा हूँ ….जरासन्ध नें मथुरा से हमें भगा दिया तो हम भाग आये ………..कृष्ण तो वीर भी नही है …….फिर मुझ से विवाह क्यों ? शिशुपाल वीर था ………….उद्धव बोले ……अब अपनी चर्चा में शिशुपाल को ले आये थे ताकि रुक्मणी को कुछ तो क्रोध आये ……..पर नही …रुक्मणी बाहर से शान्त बनीं रहीं………पर उनका हृदय चीत्कार कर रहा था …..कि नाथ ! ये अब मत बोलो !
हे भीष्मक नन्दिनी ! तुमनें अगर ये सोचकर विवाह किया कि आप महाराज वसुदेव जिनके पिता सूरसेन बड़े प्रतापी थे ….और महाराज वसुदेव की कीर्ति को कौन नही जानता ! श्रीकृष्ण रुक नही रहे हैं आज बस बोले जा रहे हैं …………….तो मैं वसुदेव का ही पुत्र हूँ इस बात का प्रमाण क्या ? कोई तो मुझे बृजराज नन्द का पुत्र भी कहते हैं ….मेरा नाम लोगों को नन्दनन्दन भी प्रिय है ……………कोई कहता है माता देवकी हैं श्रीकृष्ण की …..तो कोई कहता यशोदा का लाला !
हंसे श्रीकृष्ण ……जिसके माता पिता का पता नही ……….उससे विवाह क्यों ? रुक्मणी अभी भी शान्त हैं …….श्रीकृष्ण इतनें पर ही नही रुक रहे थे ……..देवी ! क्या बोलूँ ! दुनिया मेरा नाम लेती है ! नही …..मेरा नाम वही लोग लेते हैं जो दुनिया से ठुकराये हुये होते हैं सम्पन्न लोग मेरा नाम क्यों लेंगे ?
तभी रुक्मणी के गर्म आँसु श्रीकृष्ण के चरणों में गिरे …….चौंक नें का नाटक किया द्वारकाधीश नें……..और उठ बैठे ……क्या हुआ ! रो रही हो ?
सिर हिलाया और हिलकियों से रो पडीं रुक्मणी …..श्रीकृष्ण नें रुक्मणी के मुख को देखा और अंतिम बात बोल दिए …….दुःख हो रहा है ? ऐसे कृष्ण से विवाह करके ? तो अभी भी कुछ बिगड़ा नही है !
इतना कहना था श्रीकृष्ण का …..कि रुक्मणी मूर्छित हो गयीं ।
श्रीकृष्ण स्तब्ध हो गए ….ये क्या हुआ ? क्रोध नही किया और मूर्छित हो गयीं ..। द्वारकाधीश को चतुर्भुज बनना पड़ा ……….दो भुआओ से उठाया प्रिया रुक्मणी को और एक एक भुजा से पसीनें पोंछनें लगे और वयार करनें लगे ………..रुक्मणी ! रुक्मणी ! पुकार रहे थे श्रीकृष्ण ……मैं विनोद कर रहा था प्रिये ! बस विनोद था ये ……..श्रीकृष्ण बोले जा रहे हैं ।
रुक्मणी को कुछ समय बाद होश आया ……………..
शेष चरित्र कल –


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