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August 30, 2025 7:48 pm

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કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

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श्रीकृष्णचरितामृतम्-!!रुक्मणी का प्रेम गीत – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 31” !! – भाग 1 : Niru Ashra

श्रीकृष्णचरितामृतम्-!!रुक्मणी का प्रेम गीत – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 31” !! – भाग 1 : Niru Ashra

श्रीकृष्णचरितामृतम्

!! रुक्मणी का प्रेम गीत – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 31” !!

भाग 1

हे श्रीकृष्णपत्नी रुक्मणी आप धन्य हो ! धन्य है तुम्हारी श्रीकृष्ण में तन्मयता ! तभी तो तुम्हे श्रीकृष्ण पत्नी होनें का सौभाग्य प्राप्त है !

उद्धव कहते हैं विदुर जी से – तात ! प्रेमोन्माद मात्र वियोग में ही नही होता संयोग में भी होता है …..रस गीत की सृष्टि उन्माद से होती है और उन्माद संयोग और वियोग दोनों अवस्थाओं में ही प्रकट होता है ।

उद्धव कहनें लगे ……….पूरी रात रुक्मणी अपनें प्रिय की बाँहों में थीं …..उन गदाग्रज की विलिष्ठ भुजाएँ रुक्मणी को सुख प्रदान कर रही थीं …….उस सुरत सुख में डूबे द्वारिकाधीश अब सो गए थे ……….उनको गहरी नींद आगयी थी ……..उनकी सुरभित स्वांस रुक्मणी को रति सुख में और डुबो रही थीं……पर ये क्या तभी……… कुछ पक्षी बोलनें लगे थे …….क्यों की भोर होनें वाली है…….अब मेरे नाथ उठेंगे ……इस कल्पना से ही कितना डर लग रहा था रुक्मणी को ……ये भुजाएँ मुझे छोड़ देंगीं ? ये सुरभित साँसें मुझ से दूर चली जायेगीं !

इनका ये करुणा से भरा हुआ वक्षःस्थल मुझे छोड़ देगा ! ओह ! इस कल्पना से ही काँप गयीं थीं रुक्मणी ।

पक्षी फिर बोल रहे थे …………भोर होनें की खबर दे रहे थे ।

चुप ! चुप !

झरोखे से बाहर देख कर पक्षियों को डाँटनें लगीं रुक्मणी ।

तब भी नही मानें पक्षी तो झरोखे को बन्द कर दिया …….फिर अपनें श्रीकृष्ण की भुजाओं को अपनें ऊपर रखकर आँखें मूंद ली थीं ।

पर पक्षी ! पक्षी भी समुद्र के थे ………जिद्दी …..कोलाहल प्रिय …जैसे इनका समुद्र है …………रुक्मणी को अब रोष आरहा था ।

हे पक्षी ! तुम इतनी शीघ्र क्यों जग गए ! सो जाओ ना !

और ये विलाप क्यों ? क्यों बताओ ? अरी चकवी ! तू क्यों आँखें बन्दकर के प्रणय निमन्त्रण दे रही है…पर किसको दे रही है निमन्त्रण ! ……..क्या हमारे प्रियतम नें तेरे ऊपर भी कोई प्रेम का जादू कर दिया है क्या !

अरे ! हंस ! तुम इतनी शीघ्र उठ गए हो ……….ठीक है पर अभी रूक जाओ ……..मोती अभी मैं तुम्हे दे नही सकती ……क्यों कि मेरे बाँहों में मेरे प्राण नाथ हैं …….और गहरी नींद में सो रहे हैं ……हंस ! तुम तो जानते हो ना मेरे “प्राण-प्रिय” का सुख ही तो मेरा सुख है ।

अच्छा कोलाहल मत करो ……..दूध पीना है ? पर वो भी मैं अभी नही दे सकती …….क्यों हंस ! समझो ना ! ये सुख किसी को प्राप्त नही है सिर्फ मुझे ही है ……….इसलिये तुम भी बाद में आना मेरे पास ….मोती भी चुगाउंगी …..और दूध भी पिलाऊंगी !

क्रमशः …
शेष चरित्र कल –

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