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August 30, 2025 7:50 pm

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श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! श्रीकृष्णपुत्र प्रद्युम्न – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 33” !!-भाग 1 : Niru Ashra

श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! श्रीकृष्णपुत्र प्रद्युम्न – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 33” !!-भाग 1 : Niru Ashra

श्रीकृष्णचरितामृतम्

!! श्रीकृष्णपुत्र प्रद्युम्न – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 33” !!

भाग 1

पूरी द्वारिका आनन्दित है आज …….उत्सव की धूम मची है …..और उत्सव हो भी क्यों नहीं श्रीकृष्ण के प्रथम पुत्र जो हुए हैं ………

आचार्य गर्ग नें नाम रखा है – प्रद्युम्न ।

युवराज प्रद्युम्न की जय हो !

द्वारिका वासी अभी से युवराज घोषित कर दिए थे …….जयजयकार लग रहे हैं इस नाम के ………आचार्य गर्ग नें आनन्दित होते हुये कहा था कामदेव के अवतार और श्रीकृष्ण पुत्र प्रद्युम्न इस विश्व के सबसे सुन्दर व्यक्तित्व होंगें ………….वीरता के साथ साथ अपनें पिता की तरह नाना कलाओं में भी निपुण ……….रुक्मणी बारबार अपनें पुत्र को देखती हैं और गदगद् होती हैं………वक्ष से उनके वात्सल्य झरनें लगा था ।

नामकरण संस्कार के पश्चात्……दान किया स्वयं वासुदेव और रुक्मणी नें……फिर बालक को लेकर रुक्मणी अपनें महल में चली आयीं थीं ।


शम्बर ,

यही नाम था उस असुर का……तप किया इसनें घोर और जब महादेव इसे वर देंने आये तो बोला ……..मैं अमर हो जाऊँ !

महादेव ऐसा वर कैसे दे देते ……….तो इसनें दूसरा वर माँगा …….श्रीकृष्ण पुत्र के सिवा मेरा वध कोई कर न सके ।

द्वारिका में ही दृष्टि लगाकर बैठूँगा …….जो भी पुत्र होगा उसका वध करता जाऊँगा ….ऐसी सोच थी इसकी ………शम्बर ! ये विचित्र असुर था …….महाबली था …….इसकी दृष्टि सदैव द्वारिका में और श्रीकृष्ण में ही रहती थी । क्यों की इसकी मृत्यु इन्हीं से ही तो थी ।

रुक्मणी सो रही है……….उनके बगल में उनका पुत्र जो नवजात था प्रद्युम्न वो सो रहा है …….. सागर से हवा का झौंका सा आया ……और बालक प्रद्युम्न गायब ।

रुक्मणी उठीं ….. बिलखनें लगीं …….श्रीकृष्ण को जगाया …….नाथ ! प्रद्युम्न नही है ! पता नही क्या हुआ ?

श्रीकृष्ण भी इधर उधर दौड़नें की लीला करते रहे …….किन्तु प्रद्युम्न नही मिला …………समय के साथ दुःख कम होता ही जाता है ……यहाँ भी ऐसा ही हुआ था ।


शम्बर नें फेंक दिया था सागर में प्रद्युम्न को …………

पर मृत्यु तो आनी ही है …….इसलिये प्रद्युम्न मरे नही ….मछली नें निगल लिया प्रद्युम्न को …….पर वो बालक मछली के पेट में भी जीवित रहा ……….और कुछ काल के बाद मछली जब मछुआरों के जाल में फंसी तो उसको काटा और काटा तो जीवित बालक निकला मछली के पेट से ।

मायादेवी अपनें राजा के लिये मत्स्य का क्रय करनें के लिये आईँ थीं हाट में, बालक को देखा, अपूर्व सुन्दर ……..तो उस बालक प्रद्युम्न को उन्होंनें रख लिया और पाल पोसकर बढ़ा करनें लगीं ।

मायादेवी जिस राजा के यहाँ कार्य करती थीं वो राजा कोई और नही शम्बर ही था ….शम्बरासुर ।

इधर –

प्रद्युम्न सुन्दर थे और समय के साथ कुछ ज्यादा ही तेजी से बढ़ भी रहे थे …………..मायादेवी का भाव अब बदलनें लगा था प्रद्युम्न के प्रति ।

आज एकान्त में आलिंगन किया जब प्रद्युम्न को मायादेवी नें …….तो प्रद्युम्न नें पूछा …….आपका ऐसा मेरे प्रति भाव क्यों ?

तब मायादेवी नें सारी बात बता दी ………..अपना और प्रद्युम्न का परिचय स्पष्टतः दे दिया था ।

क्रमशः …
शेष चरित्र कल –

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