श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! श्रीकृष्णपुत्र प्रद्युम्न – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 33” !!
भाग 2
इधर –
प्रद्युम्न सुन्दर थे और समय के साथ कुछ ज्यादा ही तेजी से बढ़ भी रहे थे …………..मायादेवी का भाव अब बदलनें लगा था प्रद्युम्न के प्रति ।
आज एकान्त में आलिंगन किया जब प्रद्युम्न को मायादेवी नें …….तो प्रद्युम्न नें पूछा …….आपका ऐसा मेरे प्रति भाव क्यों ?
तब मायादेवी नें सारी बात बता दी ………..अपना और प्रद्युम्न का परिचय स्पष्टतः दे दिया था ।
महादेव की तपस्या भंग करनें के लिये कामदेव गया …….बड़ी कोशिश की …….बड़े प्रयास किये किन्तु असफल ……….बाद में जब पूरी ताकत लगाकर पुष्पधन्वा नें अपना अंतिम बाण छोड़ा तो प्रलयंकर के तीसरे नेत्र खुल गए थे और कामदेव जल कर भस्म ।
रति कामदेव की पत्नी रोती हुयी आयी…..और महादेव के चरणों में गिर गयी …………बहुत गिड़गिड़ाई …….महादेव नें कहा…….कामदेव मरा नही है …..हाँ उसका देह नही रहेगा अब ….वो बिना देह के समस्त में व्याप्त रहेगा ………पर मुझे तो सदेह पति चाहिये …विदेह नही ….रति नें अपनी बात रखी ।
करुणावतार महादेव नें कह दिया – ठीक है फिर जाओ ……..द्वापर के अन्त में श्रीकृष्ण के पुत्र बनकर तुम्हारे पति कामदेव जन्म लेंगे ।
रति प्रसन्न हो गयी …….वो समय काटनें लगी …..द्वापर आनें की प्रतीक्षा करनें लगी …..पर एक दिन ………देवर्षि नें रति को देखा तो कह दिया द्वापर युग आगया है ……अब तुम जाओ द्वारिका ……..फिर कुछ सोच कर बोले ……शम्बर तुम्हारे पति को समुद्र में फेंकेगा ……सोचनें लगे देवर्षि फिर बोले ………एक काम करो …..शम्बर के यहाँ ही दासी बनकर रहो ………तुम्हारा पति वहीं तुमको प्राप्त होगा ।
“मायादेवी” ये नाम रखकर रति शम्बर के यहाँ भोजन बनानें का काम कर रही थीं ।
हे नाथ ! आप कामदेव हैं …..मैं आपकी पत्नी रति हूँ ………मुझे देवर्षि नें बताया कि आप ही मेरे पति हैं ………..अब नाथ ! ये विद्या है आप जानिये और शम्बर का वध कर दीजिये …………
रति जो मायादेवी के रूप में थीं उन्होंने प्रद्युम्न को विद्याएँ सिखाईं जिससे प्रद्युम्न शम्बर का वध कर सकें ……..विद्या सीखनें में चौदह दिन लगे प्रद्युम्न को …उसके बाद शम्बर का वध किया प्रद्युम्न नें …..और द्वारिका लौटकर चले आये थे ………….।
ये कौन है ?
सुधर्मा सभा में बैठे श्रीकृष्ण नें प्रद्युम्न को आते देखा तो पूछ लिया ।
प्रद्युम्न कुछ बोलते उससे पहले ही नभ से देवर्षि उतर आये थे ।
पहचानिये नाथ ! देवर्षि मुस्कुराये ………
श्रीकृष्ण बस मुस्कुराते रहे ……..
ये आपके पुत्र प्रद्युम्न हैं …………देवर्षि नें कहा ।
क्या ! सभा चौंक गयीं थी ………वर्षों बीत गए थे उस बात को सब भूल भी गए थे प्रद्युम्न को तो ………
श्रीकृष्ण नें रति की ओर देखकर पूछा ….ये कौन है ?
देवर्षि बोले ….आपकी बहु …….आपका लाला बहु भी ले आया है ।
श्रीकृष्ण खूब हंसे ……..तो एक विनोद देवर्षि नें भी कर दिया ।
आपका पुत्र है …….संस्कार तो आपके ही हैं ……इस बात पर समस्त सभा के सभासद ठहाका लगाकर हंसे थे ।
रुक्मणी अपनें पुत्र और पुत्रवधू को पाकर आनन्दित हो उठीं थीं ।
शेष चरित्र कल –



Author: admin
Chief Editor: Manilal B.Par Hindustan Lokshakti ka parcha RNI No.DD/Mul/2001/5253 O : G 6, Maruti Apartment Tin Batti Nani Daman 396210 Mobile 6351250966/9725143877