श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! भौमासुर का आतंक – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 34” !!
भाग 1
भगवन् ! सामनें देवराज हैं ………….मैने कहा ।
तात ! सन्ध्या काल में सागर किनारे भ्रमण में थे, मैं और श्रीकृष्ण ।
उद्धव विदुर जी को कह रहे हैं ।
देवराज को सामनें देखते ही मार्ग बदल कर चलनें लगे थे द्वारिकाधीश ……….
नाथ ! आपनें मुझे अभी तक क्षमा नही किया ? देवराज इन्द्र अब नतमस्तक हो गए थे…..वृन्दावन का अपराध क्षम्य नही है ….किन्तु आप तो करुणानिधान हैं…….मुझ जैसे विलासी देव को कहाँ विवेक है !
अच्छा कहो ! क्या बात है…….रुक गए श्रीकृष्ण और देवराज से पूछनें लगे ।
नाथ ! भौमासुर नें आतंक मचा रखा हैं ……….मेरा छत्र मेरी माता अदिति के कुण्डल और तो और देवों का समस्त तेज छीन कर चला गया है …….हे केशव ! अब हमें डर है कि कहीं हमारा स्वर्ग भी न छिन ले………कृपा करो आप ……अब आपका ही सहारा है ………..दीन हीन सा देवराज. …..श्रीकृष्ण नें देखा ……और बोले – हम पृथ्वी के राजा हैं ……….पृथ्वी का आतंक देखेंगे और उसे मिटानें का प्रयास करेंगे ……..देवराज ! अब स्वर्ग की जिम्मेवारी हमारी तो नही ……..कम से कम अपना स्वर्ग तो सम्भालो तुम …..क्या तुमसे इतना भी नही होता ।
दो टूक कह दिया था श्रीकृष्ण नें इन्द्र से………..और जानें लगे ।
नाथ ! सोलह हजार एक सौ कन्या को उसनें कैद कर रखा है ……..वो भी पृथ्वी में ……….वो कन्या स्वर्ग की नही पृथ्वी की है ….मानवी राजाओं की कन्याएं हैं………….इन्द्र नें जाते हुये श्रीकृष्ण के कानों में ये बात डाल दी थी ………….श्रीकृष्ण तो करुणा मूर्ति हैं……….सोलह हजार कन्या ? चौंक गए श्रीकृष्ण …………नाथ ! सोलह हजार एक सौ कन्या ……इन्द्र नें पीछे से कहा ।
हृदय पसीज गया श्रीकृष्ण का ……………मेरी और देखा श्रीकृष्ण नें ….उद्धव नें विदुर जी से कहा ……उस समय उनके नेत्र सजल हो उठे थे ……कन्या ? और इतनी संख्या में ?
पर क्यों ? उन कन्याओं को क्यों कैद कर रखा है देवराज ?
इन्द्र से पूछा श्रीकृष्ण नें ।
एक लाख कन्याओं के साथ वो विवाह करना चाहता है ………..अभी संख्या पूरी नही हुयी है इसलिये उन सबको उसनें कैद में रखा है ।
ओह ! देवराज की बातों से श्रीकृष्ण द्रवित हो उठे ……….कन्या को कष्ट क्यों ? वो तो दया और प्रेम की पात्र हैं ……….नाथ ! यही तो और इतना ही नही उन कन्याओं को नाना प्रकार की यातनाओं से गुजारा जाता है उस भौमासुर के यहाँ ……..वो बस जीवित हैं ।
देवराज इतनें पर ही चुप नही हुए वो आगे भी बोलते गए …………उन कन्याओं का शोषण होता है …..भरपेट भोजन की तो छोड़िये उन्हें जल के भी तडफाया जाता है ………….ओह ! श्रीकृष्ण के नेत्र अब क्रोध से लाल हो उठे थे …….नारी इस सृष्टि की कोमल संरचना है ……..उसका आदर होना चाहिये ……….उसके सम्मान की रक्षा होनी चाहिये !
देवराज ! आप जाओ……..अब भौमासुर का अन्त निकट आगया है ।
श्रीकृष्ण नें इतना कहा ……….और देवराज को विदा कर दिया था ।
क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –


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