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August 30, 2025 12:34 pm

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કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

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श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! भौमासुर का आतंक – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 34” !!-भाग 2 : Niru Ashra

श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! भौमासुर का आतंक – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 34” !!-भाग 2 : Niru Ashra

श्रीकृष्णचरितामृतम्

!! भौमासुर का आतंक – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 34” !!

भाग 2

देवराज इतनें पर ही चुप नही हुए वो आगे भी बोलते गए …………उन कन्याओं का शोषण होता है …..भरपेट भोजन की तो छोड़िये उन्हें जल के भी तडफाया जाता है ………….ओह ! श्रीकृष्ण के नेत्र अब क्रोध से लाल हो उठे थे …….नारी इस सृष्टि की कोमल संरचना है ……..उसका आदर होना चाहिये ……….उसके सम्मान की रक्षा होनी चाहिये !

देवराज ! आप जाओ……..अब भौमासुर का अन्त निकट आगया है ।

श्रीकृष्ण नें इतना कहा ……….और देवराज को विदा कर दिया था ।

सन्ध्या काल पूरा हो गया है ……रात्रि अब आनें वाली थी ………सागर की लहरों को ध्यान से देख रहे हैं श्रीकृष्ण ।

उद्धव ! ये भौमासुर कौन है ?

मुझ से पूछ रहे हैं …….हे विदुर जी ! मुझे हंसी आयी ………आपका ही तो पुत्र है भौमासुर !

मेरा पुत्र ? शून्य में खो गए थे श्रीकृष्ण फिर ।


पृथ्वी का उद्धार करना था …….क्यों की पृथ्वी के बिना सृष्टि रुकेगी कहाँ पर ! इसलिये आवश्यक हो गया था नारायण के लिये भी …….

पर पृथ्वी को तो ले गया है हिरण्याक्ष…….और भी पाताल में ।

वराह रूप धारण किया नारायण नें और पृथ्वी को अपनें दांतों में रखकर भागे …….पीछे हिरण्याक्ष था ……….निकटता मिली पृथ्वी को नारायण भगवान की …..तो एक पुत्र जन्मा ………सुन्दर तो था भौमासुर ………..पीछे आरहा था हिरण्याक्ष ………अब रुक गए और एक मुष्टिक के प्रहार से ही उसको मार गिराया ।

पृथ्वी देवी ये सब देख रही थीं ………….नाथ ! एक वर दे दो ……..पृथ्वी देवी नें कहा ……क्या वर ? तुमतो मेरी अर्धांगिनी हो !

नाथ ! मेरे इस पुत्र को आप मत मारियेगा !

वर यही माँगा था पृथ्वी नें …………ये तमोगुणी अवस्था में जन्मा है …..हिरण्याक्ष को तुम देख रहीं थीं वो हमारे पीछे भाग रहा था हो सकता है ये असुर ही बने …….और पूरे त्रिलोक में हाहाकार मचा दे …तब ? तब भी नही नाथ ! हाँ , जब तक मैं न कहूँ तब तक आप इसका वध न करें !

वराह नारायण नें लम्बी साँस ली थी…..ठीक है …..जैसी तुम्हारी इच्छा !

भूदेवी बड़ी प्रसन्न हो उठीं थी इस वर से ……और जानें अन्जानें में उन्होंने अपनें इस पुत्र को अपनें समस्त रहस्य बता दिए थे ……..तात ! पृथ्वी में अनन्त रहस्य हैं उन सबको समेट कर भौमासुर एक अजित असुर बन बैठा था …..पृथ्वी में ही क्यों उसनें तो स्वर्ग पर भी अपना अधिकार दिखाना प्रारम्भ कर दिया था ।


इसका राज्य कहाँ है ? श्रीकृष्ण नें मुझ से पूछा , उद्धव बोले ।

मैने कहा – प्राग्ज्योतिषपुर ( वर्तमान में इराक ) ।

हूँ ………कुछ देर सोचते रहे श्रीकृष्ण ……….फिर मेरे कन्धे में हाथ रखकर बोले …….पृथ्वी को वर दिया है उसका क्या होगा ?

मैने कहा – नाथ ! लीला करनें में प्रवीण हैं आप ……और आप अभी भी मेरे सामनें लीला ही कर रहे हैं ……….आप नारायण हैं तो आपकी त्रिशक्ति द्वारिका में ही विद्यमान हैं……..श्री शक्ति यानि लक्ष्मी की अवतार रुक्मणी जी, भू शक्ति यानि पृथ्वी की अवतार सत्यभामा , और लीला शक्ति यानि कालिन्दी ।

आप अपनें दास को इतनी महिमा क्यों दे रहे हो !

नाथ ! आप सब जानते हैं फिर भी ! तो सुनिये …..आप सत्यभामा को लेकर जाइये प्राग्ज्योतिषपुर..क्यों की वो पृथ्वी की अवतार हैं..और उनको दिखाइए भौमासुर का आतंक वो वध करनें के लिये जब कहें तभी आप उसका वध कर दीजियेगा । …..मैं इतना ही बोला……. श्रीकृष्ण नें मेरी पीठ थपथपाई…..सखा हो तो उद्धव जैसा …..ये कहकर मेरा सम्मान बढाया………और अपनें महल की और चल दिए थे ।

शेष चरित्र कल –

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