श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! सोलह हजार एक सौ – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 35” !!
भाग 1
प्रिये !
सत्यभामा के महल में गए आज श्रीकृष्ण । रात्रि हो गयी थी सत्यभामा नें सोचा भी नही था कि आज उसके नाथ महल में पधारेंगे !
भोजन किया, सत्यभामा के हाथों से भोजन किया …….श्रृंगार रस में पूरे डूबे हुये लगे सत्यभामा को…….भोजन करनें के बाद हस्तप्रक्षालन फिर प्रेम से बैठ गए थे …..सत्यभामा को अपनें निकट बिठाकर …..चिबुक में हाथ रखकर बोले थे ……
प्रिये !
हाँ नाथ ! सत्यभामा भी गदगद् ।
क्या मेरे साथ तुम्हारी कहीं भ्रमण की इच्छा नही होती ?
आपकी होती है ? सत्यभामा भी सीधी कहाँ हैं ………उसका भी प्रतिप्रश्न तैयार था ।
हाँ , पर अकेले तुम और मैं ?
सत्यभामा आनन्दित हो उठीं ……….फिर ये सौभाग्य इस दासी को कब मिलेगा ?
दासी न कहो ……..तुम तो हमारे हृदय में वास करनें वाली हो …….ये कहते हुये अपनें हृदय से भी लगा लिया था ।
आप नें उत्तर नही दिया ? कब आप और हम भ्रमण में जायेंगे ?
अभी ! श्रीकृष्ण नें बोले ।
अभी ? सत्यभामा चौंकी ।
नही , क्या अभी नही ? श्रीकृष्ण नें पूछा ।
हाँ , हाँ क्यों नही ………सत्यभामा बोली ……पर !
पर क्या ?
रथ में जायेंगे ना ? नही, हम जायेंगे गरूण में ………..श्रीकृष्ण के इतना कहते ही गरूण बाहर आँगन में आकर खड़े भी हो गए ।
चलो ! गरूण आगये हैं …….श्रीकृष्ण नें सत्यभामा का हाथ पकड़ा और गरूण की ओर ले चले ……पर ! मैं कुछ सज संवर तो लूँ …….तुम ऐसी ही अच्छी लगती हो………बिना सजे संवरे …………..
सत्यभामा का हृदय आनन्द सिन्धु में गोता लगा रहा है ……..गरूण में दोनों बैठे हैं………और गरूण उड़ चला था ।
ये क्या है ? बड़ा सुन्दर देश है ………..सत्यभामा नें देखा प्राकृतिक रूप से सम्मृद्ध एक देश ………”प्राग्ज्योतिषपुर” ……..श्रीकृष्ण गरूण में बैठे हुए उस देश को देख रहे हैं ।
प्रवेश करनें लगे उस देश में ……किन्तु ये क्या !
अग्नि की ज्वाला धधक रही है ………….श्रीकृष्ण हैं और वाहन उनका आज गरूण है ……पार कर लिया था उस अग्नि के किले को ।
यहाँ का राजा कौन है ?
भौमासुर, श्रीकृष्ण नें उत्तर दिया सत्यभामा को ।
अपार जल राशि आगे दिखाई दी ……..पर उसे भी पार कर लिया था गरूण नें ……..
नाथ ! चिल्लाई सत्यभामा ……..श्रीकृष्ण नें पीछे मुड़कर देखा तो एक असुर बड़ी सी चट्टान लिए मारनें के लिये आरहा था ।
सुदर्शन चक्र का आव्हान किया और उस असुर का वहीं वध कर दिया ।
आश्चर्य ! देवों नें पुष्प बरसाए ……देवराज नें गदगद् होकर नाम रखा श्रीकृष्ण का “मुरारी” …….नाथ ! ये “मुर” नामक असुर भौमासुर का पुत्र था …….ये कम नही था अपनें पिता से ……आप ही इसका उद्धार कर सकते थे ।
आपकी जय हो , आपकी जय हो .
…….आज से आपका नाम “मुरारी” हुआ ।
देवों नें जब ये कहकर पुष्प वृष्टि की ….तब सत्यभामा बोली ……..आप किसी विशेष कार्य के लिये आये हैं ! या मुझे ?
सत्यभामा ये प्रज्योतिषपुर है ……….तुम्हे भी जानकर बड़ा दुःख होगा कि इस स्थान पर हजारों कन्याओं को कैद कर रखा है यहाँ के राजा नें ….. गरूण उड़ते जा रहे थे और श्रीकृष्ण बताते जा रहे हैं सत्यभामा को …….एक बड़ी सी खाई थी …..चारों और पर्वत है……..पर पर्वत के पास जाना भी कठिन था ……..क्यों कि उससे पहले नदी थी जो बड़ी उफान में थी…….उस खाई में देखो सत्यभामा ! श्रीकृष्ण नें दिखाया …………………
ओह ! हजारों कन्याएं ………कैद में हैं ….उनके अत्यन्त कोमल देह को बड़ी बड़ी सांकरों से बाँधा गया है ………..बोलो – “तुम्हारा पति भौमासुर है”……..और उनको ये कहकर पीटा जा रहा है……..नही कह रही हैं वो ये सब …….भूख से तड़फ़ रही हैं पर उन्हें कुछ नही दिया जा रहा ।
क्रमशः …
शेष चरित्र कल –


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