एक ही भगवान कई रूपों में हमारे सामने आते हैं। भूख लगने पर अन्नरूप में, प्यास लगने पर जलरूप में, रोग में औषधिरूप से, गर्मी में छायारूप में तो सर्दी में वस्त्ररूप में परमात्मा ही हमें प्राप्त होते हैं। परमात्मा ने जहां श्रीराम, कृष्ण आदि सुन्दर रूप धारण किए तो वहीं वराह (सूअर), कच्छप, मीन आदि रूप धारण कर भी लीला की ।
भगवान कभी पुष्प या सुन्दरता के रूप में आते हैं तो कहीं मांस-हड्डियां पड़ी हों, दुर्गन्ध आ रही हो, वह भी भगवान का ही रूप है । मृत्यु के रूप में भी भगवान ही आते है।
अत: जो हमारे मन को सुहाए वह भी भगवान का रूप है और जो नहीं सुहाये, वह भी भगवान का रूप है। जो मन को नहीं सुहाता उसमें भगवान को देखना अत्यन्त कठिन है परन्तु उसके प्रति भी भगवद्भाव आ जाए तो यह भक्त बनने की निशानी है और गीता में कहा गया है कि ऐसे महात्मा दुर्लभ होते हैं।।।


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