श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! सोलह हजार एक सौ – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 35” !!
भाग 2
ओह ! हजारों कन्याएं ………कैद में हैं ….उनके अत्यन्त कोमल देह को बड़ी बड़ी सांकरों से बाँधा गया है ………..बोलो – “तुम्हारा पति भौमासुर है”……..और उनको ये कहकर पीटा जा रहा है……..नही कह रही हैं वो ये सब …….भूख से तड़फ़ रही हैं पर उन्हें कुछ नही दिया जा रहा ।
सत्यभामा के नेत्रों से अश्रु बह चले……..वो अत्यन्त दुःखी हो गयीं ।
नाथ ! ये सब क्या है ? ये कौन हैं ? और यहाँ क्यों हैं ?
गरूण में बैठे हुए श्रीकृष्ण गम्भीर होकर बोले…….हे सत्यभामा ! भौमासुर एक लक्ष कन्याओं से विवाह करना चाहता है ………ये राजकन्याएँ हैं ……….सब सुसंस्कृत सुसंस्कारी कन्या होनी चाहियें …..ये शर्त भी है इसकी ………….।
श्रीकृष्ण बोलते जा रहे हैं ……..सत्यभामा कानों से सुन रही हैं पर उनकी दृष्टि उन असहाय कन्याओं पर ही टिकी है ।
भौमासुर ! ये नाम मुख में आया था सत्यभामा के …………वो इस नाम से ही कांपनें लगी थीं क्रोध से …………
तभी भौमासुर आगया वहाँ ….उसका भी अपना विमान था …….विमान से वह नाना प्रकार के अस्त्र शस्त्र का प्रयोग करनें लगा ……..वो चिल्लाता था और शस्त्र श्रीकृष्ण के ऊपर छोड़ रहा था ……….वो विस्फोट कर रहा था अपनें पर्वतों पर ….ताकि श्रीकृष्ण को क्षति हो ….वो तलवार भी चला रहा था तो वो धनुष से बाण भी छोड़ रहा था ………श्रीकृष्ण अपना केवल बचाव कर रहे थे ……….वो प्रहार नही कर रहे …..क्यों की तात ! जब तक भूदेवी नही कहेंगीं तब तक भौमासुर का नारायण भी वध नही कर सकते ……..और भूदेवी सत्यभामा हैं ………श्रीकृष्ण उन्हीं के कहनें की प्रतीक्षा ही तो कर रहे थे ।
एक विशाल पर्वत उठाकर मारा था भौमासुर नें ……….वो पर्वत तो दूसरी तरफ गिरा पर उसके कुछ टुकड़े श्रीकृष्ण को लग गए थे ……आह ! श्रीकृष्ण जानबूझ कर सत्यभामा को सुनानें के लिये बोले ।
नाथ ! उठाइये सुदर्शन चक्र और वध कीजिये इस भौमासुर का ………
आवेश आगया था सत्यभामा को ……वो भूदेवी के रूप में ही बोलीं थीं ……..प्रसन्न होकर उठे श्रीकृष्ण , आव्हान किया सुदर्शन चक्र का ………..तभी देखते ही देखते भौमासुर का मस्तक धड़ से अलग होकर दूर जाकर गिरा ।
देवराज नें पुष्प बरसाए …….जय जयकार किया …….स्तुति गाई ।
बन्धन मुक्त किया जाकर उन कन्याओं को श्रीकृष्ण और सत्यभामा नें ।
वो कन्यायें अपलक भुवन सुन्दर को देखती रहीं………..इतना सुन्दर ! और सुन्दर ही नही करुणा से भरे हुये इनके विशाल नेत्र !
वो सब अब बन्धन मुक्त हो चुकी थीं ………उनके सामनें श्रीकृष्ण खड़े थे वो दौड़ पडीं और श्रीकृष्ण चरणों में गिर गयीं ।
चलो सत्यभामा ! चलो ! अपनें चरण छुड़ाते हुये श्रीकृष्ण सत्यभामा को बोले …………..
क्या कह रहे हैं आप ? ये आपके चरणों में गिरी हुयीं हैं और आप ?
हाँ तो ये जाएँ ना अपनें घरों में …………वहाँ जाकर विवाह करें किसी राजकुमार से…..श्रीकृष्ण रूखे स्वर में बोले थे ।
नाथ ! इनसे कोई राजकुमार अब विवाह करेगा ?
तो मैं क्या करूँ ? श्रीकृष्ण सत्यभामा से सीधे बोले ।
नाथ ! इनके सामनें अब दो ही मार्ग हैं…..एक या ये मर जाएँ …या ये गलत मार्ग का चयन करके अपनें देह को बेच दें !
सत्यभामा स्पष्ट बोलीं ।
तुम कहना क्या चाहती हो ? श्रीकृष्ण नें पूछा ।
नाथ ! बहुत बड़ा उपकार होगा बहुत बड़ी कृपा होगी आपकी इनके ऊपर ………इतिहास आपका गुणगान गायेगा ……..सन्त सज्जन पुरुष आपकी जयजयकार करते रहेंगे युगों युगों तक ……….और फिर इन सबसे आपको कोई प्रयोजन भी न हो तो इनका घर बस जायेगा ……..इनको पति नाम मिल जायेगा ……ये कितनी खुश होंगी ……….सत्यभामा बोलती गयीं …..
सत्यभामा के कन्धे में हाथ रखकर श्रीकृष्ण नें कहा ……क्या कहना चाहती हो …….मैं इन सबसे विवाह करूँ ?
हाँ, हाँ नाथ ! हाँ ……….सत्यभामा बोलीं ………..
मुस्कुराये श्रीकृष्ण……….तात ! वो यही सुनना चाहते थे सत्यभामा के मुख से ……….ये दीनवत्सल, करुणा सिन्धु ……..ऐसे कैसे इन कन्याओं के दुःख पर द्रवित न होते ………उद्धव नें विदुर जी से कहा ………..तात ! भौमासुर के ही विमान में उन कन्याओं को बिठाकर द्वारिका भिजवा दिया था ……..कन्याएं सोलह हजार एक सौ थीं ………और जब वो स्वयं द्वारिका गए तो उन्होंने सबके साथ विधि विधान से विवाह किया ………एक साथ विवाह किया था ।
किन्तु ! अभी श्रीकृष्ण द्वारिका नही गए ……….सत्यभामा नें जिद्द की कि मुझे आप भ्रमण करानें लाये थे ……..भ्रमण तो हुआ नही ……तो श्रीकृष्ण नें हंसते हुये कहा…….चलो अब तुम्हे हम स्वर्ग दिखाते हैं ……गरूण ! स्वर्ग चलो ……अपनी प्रिया को हम स्वर्ग दिखायेगे ……….गरूण तीव्र गति से स्वर्ग की ओर उड़ चले थे ।
शेष चरित्र कल –


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