श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! स्वर्ग में श्रीकृष्ण – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 36” !!
भाग 1
सत्यभामा के साथ भ्रमण में हैं श्रीकृष्ण ……भौमासुर का वध कर उसके यहाँ बन्दी सोलह हजार एक सौ कन्याओं को स्वीकार कर स्वर्ग के लिये निकल गए थे ।
गरूण को क्या देरी लगनी थी , पितृ लोक से होते हुए स्वर्ग में पहुँचा दिया था ………..गरूण जहाँ रुके वहीं पर पुष्प माला लिये देवराज अपनी पत्नी शची के साथ और देवगुरु के साथ उपस्थित थे ।
आइये ! हे द्वारिकाधीश आपका स्वर्ग में स्वागत है ……..
देवराज नें आगे बढ़कर पुष्प अर्पित करते हुये कहा था ।
सत्यभामा को पुष्प का गुच्छा स्वर्ग की सम्राज्ञी शची नें दिया था ।
अन्य देवों नें श्रीकृष्णचरणों में सुमन निवेदित किये ।
हे द्वारकेश ! आपसे माता अदिति मिलना चाहती हैं ………वो आप के प्रति कृतज्ञ हैं …..क्यों की आपनें भौमासुर का वध करके हम देवों का बड़ा उपकार किया है …………इन्द्र और भी बोलनें वाले थे पर ये दिखावे की भाषा हमारे श्रीकृष्ण को कब प्रिय रही ।
माता कहाँ हैं ? सीधे पूछा श्रीकृष्ण नें ।
आप आइये ! इन्द्र लेकर गया ।
मैं आपके चरणों में प्रणाम करता हूँ माता ! सीधे माता अदिति के चरणों में अपना सिर रख दिया था श्रीकृष्ण नें …….ओह ! मेरे वामन ! मेरे उपेन्द्र ! माथे को चूमा अदिति नें ……….माते ! ये आपके कुण्डल ….जो भौमासुर ले गया था ………माता अदिति नें कुण्डल लेकर अपनें पास रख लिया ……..और बड़ी प्रसन्नता में बोलीं ……हे श्रीकृष्ण ! मुझे कुण्डल मिले इस बात की इतनी प्रसन्नता नही है ….जितनी प्रसन्नता तुम मेरे स्वर्ग में आये ……….आह ! भोग की भूमि ये स्वर्ग आज प्रेम से भर गयी है मेरे कृष्ण ! वो बारबार श्रीकृष्ण को देख रही थीं, अपलक देख रही थीं………और उनके नेत्रों से अश्रु भी भावातिरेक के कारण बह रहे थे ।
एक देवता नें आकर देवराज के कान में कुछ कहा …………..
हे द्वारकेश ! आपके लिये समस्त देवों नें मिलकर एक सभा रखी है ………आपका सम्मान और कुछ रंजन ………इन्द्र नें श्रीकृष्ण को चलनें के लिये कहा …………….माता अदित को प्रणाम करके श्रीकृष्ण उठे …………..महारानी शची ! आप रानी सत्यभामा को अपनें महल में ले जाइए …..और स्वर्ग दिखाइए ………….इन्द्र नें अपनी पत्नी शची से कहा …….सत्यभामा नें श्रीकृष्ण की ओर देखा तो श्रीकृष्ण नें नेत्रों के संकेत से कहा …….जाओ ।
शची के साथ सत्यभामा उनके महल में चली गयीं थीं ।
शची में अहं है …………पर है तो है ………..सत्यभामा नें उस ओर ज्यादा ध्यान नही दिया ।
शची नें सत्यभामा को अपनें महल में लाकर नीचे बैठनें को कहा ……
सत्यभामा नें सुनते हुए भी अनसूना कर दिया और शची के सिहांसन में ही जाकर बैठ गयीं ………….शची की इतनी हिम्मत तो थी नही कि सत्यभामा को सिंहासन से उतार सके ।
बड़े वीर हैं हमारे पति देवराज……..उनके समान और कौन होगा ।
शची सत्यभामा को सुना रही थीं……..ये सुनकर सत्यभामा हंसीं ।
हंसती क्यों हो ? शची को अच्छा नही लगा सत्यभामा का हंसना ।
क्यों , हंस भी नही सकते तुम्हारे स्वर्ग में ? सत्यभामा नें आँचल में मुँह छुपाकर हंसते हुये कहा था ।
पर कोई तो कारण होगा ! अकारण कौन हंसता है ?
नही तुमनें कहा ना कि हमारे पति देवराज हैं …..महावीर हैं ……उनके समान कोई नही…..पर मेरे नाथ श्रीकृष्ण के पास वो गए थे गिड़गिड़ाये थे और कहा था – हमारी भौमासुर से रक्षा करो ।
शची का मुखमण्डल म्लान हो उठा ………..उनके पास कुछ नही था अब बोलनें के लिये ………..तभी –
ये आपके केश में लगा दूँ ? एक दासी बाहर से फूल लेकर आयी ….. पारिजात के फूल …..नित्य शची लगाती थी पर दासी नें आज सत्यभामा को देखा तो उनके केश में लगाने की बात कही ।
क्या तुम्हे इतना भी पता नही…….ये पुष्प देवों के लिये हैं…..मानवी के लिये नही है……शची क्रोधित हो गयी अपनी दासी के ऊपर ।
पर सत्यभामा को अब आनन्द आरहा था ………स्वर्ग में रहनें वाली ये महारानी कितनें द्वेष ईर्ष्या से भरी हुयी है ……सत्यभामा सोच रही हैं …..दासी जैसे ही पारिजात का वो पुष्प शची के केशों में लगानें लगी …..
क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –


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