श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! स्वर्ग में श्रीकृष्ण – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 36” !!
भाग 2

पर कोई तो कारण होगा ! अकारण कौन हंसता है ?
नही तुमनें कहा ना कि हमारे पति देवराज हैं …..हावीर हैं ……उनके समान कोई नही…..पर मेरे नाथ श्रीकृष्ण के पास वो गए थे गिड़गिड़ाये थे और कहा था – हमारी भौमासुर से रक्षा करो ।
शची का मुखमण्डल म्लान हो उठा ………..उनके पास कुछ नही था अब बोलनें के लिये ………..तभी –
ये आपके केश में लगा दूँ ? एक दासी बाहर से फूल लेकर आयी ….. पारिजात के फूल …..नित्य शची लगाती थी पर दासी नें आज सत्यभामा को देखा तो उनके केश में लगाने की बात कही ।
क्या तुम्हे इतना भी पता नही…….ये पुष्प देवों के लिये हैं…..मानवी के लिये नही है……शची क्रोधित हो गयी अपनी दासी के ऊपर ।
पर सत्यभामा को अब आनन्द आरहा था ………स्वर्ग में रहनें वाली ये महारानी कितनें द्वेष ईर्ष्या से भरी हुयी है ……सत्यभामा सोच रही हैं …..दासी जैसे ही पारिजात का वो पुष्प शची के केशों में लगानें लगी …..
लाओ ! मैं ही लगा लेती हूँ ……..दासी के हाथों से लेकर सत्यभामा नें अपने केशों में उन पुष्पों को लगा लिया ।
“मानवी सर्वश्रेष्ठ है..देवों से भी ज्यादा”……मुड़कर शची से कहा सत्यभामा नें…….और ये भी कहा…..हम देवों की कृपा से यहाँ नही हैं अपितु देवों पर हमनें कृपा की है…….सत्यभामा बोलनें में चतुर् हैं हीं…..वो बोलती गयीं …..शची अब बोलनें की हिम्मत नही जुटा पा रही थी ।
महारानी शची ! और महारानी सत्यभामा ! आपको सभा में महाराज नें बुलवाया है ……एक अप्सरा नें आकर कहा ।
चलिये ! मुस्कुराते हुये सत्यभामा शची से बोलीं………शची आगे आगे चली पीछे मुस्कुराती हुयी सत्यभामा ।
आओ सत्यभामा ! ये देखो ! कितना सुन्दर वृक्ष है ना !
श्रीकृष्ण नें अपनी महारानी सत्यभामा को दिखाया ।
और इसके पुष्प ! कितनें सुन्दर और सुगन्धित हैं……..आहा ! पुष्प को लेकर श्रीकृष्ण उसे सूँघ रहे थे ………ये पारिजात वृक्ष है प्रिये !
सत्यभामा नें भी पुष्प को तोड़ा ………….सबके सामनें वृक्ष में से आगे बढ़कर तोडा ……और इतना ही नही ……..श्रीकृष्ण को हंसते हुये वृक्ष के नीचे खड़ा करके उस पारिजात को जोड़ से हिला दिया ….पुष्प श्रीकृष्ण के ऊपर झर रहे थे ……….उस दृश्य को देखकर सब देव गदगद् हो रहे हैं……..किन्तु ! शची ! सत्यभामा शची को देख रही थीं ….और उसको दिखानें के लिये और उसका अहंकार तोड़नें के लिये ही ये सब कर रही थीं ।
अब चलें ?
अपनी प्रिया सत्यभामा के स्कन्ध में हाथ रखते हुए श्रीकृष्ण बोले ।
हाँ , पर ………..सत्यभामा रुक गयीं ……..ये पारिजात अगर द्वारिका में जाकर लगा दिया जाए तो द्वारिका की शोभा बढ़ जाती !
नाथ ! स्वर्ग में आये हैं………..प्रद्युम्न और उनकी पत्नी आदि आदि सब पूछेंगें कि स्वर्ग से क्या लाये ! तब ? सत्यभामा ये सब कहते हुये शची की ओर ही देख रही थीं ।
ये पारिजात तुम्हे प्रिय लगा ? श्रीकृष्ण नें जैसे ही सत्यभामा से पूछा ……..शची सबके सामनें अपनें पति इन्द्र का हाथ पकड़ कर ले गयी …….और दूर ले जाकर बोली ……..स्वर्ग की वस्तु पृथ्वी में नही जानी चाहिये !
अरे देवराज ! इधर आओ …….देखो ! ये पारिजात हम द्वारिका ले जायेंगे ……….श्रीकृष्ण पूरी बात बोल भी नही पाये थे कि ……..
नही …. द्वारकेश ! मैं स्वर्ग की वस्तु को पृथ्वी में नही ले जानें दूँगा ।
हंसे श्रीकृष्ण …..चारों ओर देखा ………समस्त देवों को देखा ……..फिर अपनी सत्यभामा से पूछा …….ले जाना है पारिजात ?
सत्यभामा नें कहा ……हाँ ….ले जाना है ।
इन्द्र ! हम ले जा रहे हैं पारिजात वृक्ष को ……..तुम देवों में अगर शक्ति है तो आगे आओ और मुझे रोको …………..
शची बोलती रही संकेत करती रही इन्द्र को – रोकिये ! रोको !
हाँ, एक बार अवश्य आगे बढ़ा था इन्द्र, किन्तु ……श्रीकृष्ण से कौन टकरा सका है……….उखाड़ा, एक ही बार में पारिजात को उखाड़ कर गरूण में रख स्वर्ग से चल पड़े थे श्रीकृष्ण……..शची को देख रही थीं सत्यभामा वो पैरों को पटकती हुयी कोप भवन में चली गयी थी ।
“अब दोनों में युद्ध होगा”……..ये कहते हुये खूब हंसती रही सत्यभामा …….जब तक द्वारिका नही आया तब तक हंसती ही रही थी ।
शेष चरित्र कल –

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