श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! बलराम की बृज यात्रा – “उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 38” !!
भाग 2
हाँ माँ ! सिर झुकाकर अपनी माता से बलराम जी नें कहा ।
रोहिणी नें देखा …….सब रानियाँ घबड़ाई हुयी हैं …….श्रीकृष्ण धरती में पड़े हुये हैं ………..उन्हें देह सुध नही है …रुक्मणी बिलख रही हैं ……रोहिणी माता के नेत्रों से अश्रु बह चले थे …….जब उन्होंने देखा …..श्रीराधा ! श्रीराधा ! रोम रोम से प्रकट हो रहा था श्रीकृष्ण के ।
कौन है राधा ? रोहिणी माता से रुक्मणी नें पूछा ।
पहले अपनें पति को तो सम्भालो रुक्मणी ! रोहिणी माता नें दो टूक कहा ….तब कुछ लज्जित हो श्रीकृष्ण को सम्भालनें लगी थीं ।
दाऊ ! तुम बृज जा रहे हो ! जाओ ! सबको मेरा यथायोग्य प्रणाम बोलना ……और हाँ …जीजी के चरणों को छूकर कहना रोहिणी आपको बहुत याद करती है………..बृजराज बाबा को ढोग कहना …..गोप बालकों को मेरा प्यार देना ……गोपियों को मेरा दुलार देना …..और हाँ , राधा को …….रो पडीं रोहिणी माता …….उनका कण्ठ अवरुद्ध हो गया था …..वो आगे कुछ बोल नही पाईँ ।
रुक्मणी आदि सब रानियों नें ये नाम आज पहली बार सुना था ……सब एक दूसरे का मुख देख रही थीं……..राधा कौन ? ये भी कोई सोलह हजार एक नौ वीं पत्नी हैं क्या ?
तब बलराम जी नें ही आगे बढ़कर कहा –
नही, श्रीराधा पत्नी नही हैं …………श्रीराधा कृष्ण हैं और कृष्ण श्रीराधा हैं……..हे कृष्ण पत्नियों ! पति पत्नी में दूरी है ……पर राधा और कृष्ण में उतनी भी दुरी नही है ………ये एक तत्व, दो बनकर विहार कर रहा है इस सृष्टि में ……. कृष्ण का प्रेम ही आकार लेकर राधा बन गया है ……….पर बलराम जी की बातें इन रुक्मणी आदि के समझ में नही आयी थी ……..अब उन्होंने विचार कर लिया था रोहिणी माता से ही इसके बारे में पूछेंगी ।
दाऊ ! मैं भी चलता बृज वृन्दावन ……….मेरे तो रोम रोम में बृज ही है ………दाऊ भैया ! कोई ऐसा काल नही होगा जिस काल में मुझे वृन्दावन की याद न आती हो ………….वहाँ का प्रेम ! वहाँ की आत्मीयता ! वहाँ का माधुर्य ! यहाँ कहाँ !
दाऊ ! आप जाओ ………..राम कृष्ण एक साथ द्वारिका नही छोड़ सकते ……..जरासन्ध, दन्तवक्र , शाल्व , पौंड्रक ये सब घात लगाये बैठे हैं कि कब बलराम और कृष्ण द्वारिका से निकलें और हम लोग आक्रमण कर दें ……..दाऊ ! आप जाओ …………
श्रीकृष्ण सम्भल गए थे ……….रुक्मणी आदि को अपनें आस पास देखा तो उन्होंने अपनें लिये एकान्त माँगा ……बस बलराम भैया और मैं ।
रानियाँ चली गयीं थीं…………….तब श्रीकृष्ण नें अपनें बड़े भाई बलराम को सन्देश दिया बृज के लिये …………..और अपनें पिता वसुदेव माता देवकी को बुलवाकर बृजवासियों के लिये उपहार भी भिजवाये ।
मुझे पता है उन बृजवासियों के लिये ये सब महत्वहीन हैं ……..वो अपनें आपमें ही समृद्ध हैं …परम समृद्ध हैं……प्रेम – निष्काम प्रेम के प्रतीक हैं वो लोग…..फिर भी……..श्रीकृष्ण इससे ज्यादा कुछ बोल न सके थे ।
वो लोग पूछेंगें कि उनका कन्हैया कब आएगा यहाँ…तब मैं क्या कहूँ ?
दाऊ ! कहना ……..समय आ गया है अब मिलनें का !
इतना बोलकर श्रीकृष्ण चुप हो गए थे ……….रोहिणी माता नें बलराम के पीठ में हाथ रखकर कहा …….बस ! अब जाओ दाऊ !
क्यों की रोहिणी माता ही समझती हैं श्रीकृष्ण के उस बृज छोड़नें की पीर को………..दाऊ बाहर आये और रथ में बैठकर निकल गए थे बृज वृन्दावन के लिये ।
शेष चरित्र कल –


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