श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! इन्द्रप्रस्थ की ओर – उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 46 !!
भाग 1
कैसे गम्भीर हैं प्रभु !
मैंने आज कुछ ज़्यादा ही गम्भीर श्रीकृष्ण को देखा तो पूछ लिया ।
नहीं उद्धव , कोई विशेष बात नहीं है इतना कहकर भगवान फिर समुद्र की ओर देखने लगे थे ……”उद्धव ! आज दो दूत सभा में आए एक पाण्डवों के यहाँ से और एक जरासन्ध के यहाँ से “ इतना बोलकर फिर शान्त हो गए थे श्रीकृष्ण , ओह ! मैं अब समझा था करुणानिधान के हृदय में करुणा उबल पड़ी थी किन्तु दूसरी ओर पाण्डव भी तो थे उनका सस्नेह निमन्त्रण कैसे ठुकराया जा सकता था । मैं समझ सकता था श्रीकृष्ण के अन्दर चल रहे अंतर्द्वंद्व को ।
महाराज द्वारिकाधीश की जय हो !
आज सभा में जैसे ही बैठे थे द्वारिकाधीश तभी दो दूतों का आगमन हुआ था ।
मुस्कुराए थे उन दूतों को देखते ही श्रीकृष्ण क्योंकि ये दूत कोई अपरिचित नहीं थे उनके अपने प्रिय पाण्डवों के दूत थे , कहो सब कुशल तो हैं मेरे प्रिय पाण्डव ?
कितनें गदगद हो उठे थे पाण्डवों का नाम सुनते ही द्वारकेश ….और हों भी क्यों नहीं पाण्डव भी तो प्राणों से ज़्यादा इन्हें ही मानते हैं ।
मेरी भुआ कैसी है ? युधिष्ठिर कैसे हैं , महाबली भीम ? और नकुल सहदेव , एक एक का नाम पूछ पूछ कर उनकी कुशलता ले रहे थे , पर तात ! अर्जुन का जब नाम लिया तब इनका मुखमंडल ही बदल गया था “अर्जुन” कहते हुये ये दूसरे ही भाव देश में चले गए थे, उद्धव विदुर जी को बोले ।
सब कुशल हैं नाथ ! श्रीकृष्ण को ये कहकर पत्र मेरे हाथों में दूतों नें दिया , उद्धव बोले मैंने पत्र को पढ़ा – क्या लिखा है उद्धव ! मैंने मुस्कुराते हुये वो पत्र श्रीकृष्ण के ही हाथों में दे दिया था ।
जय हो ! इन्द्रप्रस्थ के राजा महाराज युधिष्ठिर और महारानी बनेंगी द्रोपदी , और उनके द्वारा राजसूय यज्ञ होगा ! श्रीकृष्ण गदगद हो गए थे पत्र को पढ़कर , “आपको जब पत्र मिले तभी आप द्वारिका से प्रस्थान करें ये हमारी प्रार्थना है “, उस पत्र में अर्जुन ने ये निवेदन भी किया था ।
“क्यों नहीं, हम कल ही निकल रहे हैं इन्द्रप्रस्थ के लिए …कह दो मेरे प्रिय पाण्डवों को कि कृष्ण दो दिनों में ही राजसूय यज्ञ की सेवा में उपस्थित हो रहा है” , श्रीकृष्ण ने प्रसन्नता पूर्वक कहा और दूतों को विदा किया था।
लेकिन तभी सभा में – “महाराज द्वारिकाधीश की जय हो”
ये क्या ! तभी नये दो दूतों नें फिर सभा में प्रवेश किया था ।
उद्धव ! देखो तो ये दूत कहाँ से आए हैं , मैं दूतों से कुछ पूछता उससे पहले ही वो लोग बोल उठे थे ……..हम शताधिक राजाओं के भेजे हुए दूत हैं , दूतों ने सिर झुकाकर कहा ।
क्या ? मैंने पूछा क्या हुआ शताधिक राजाओं को जिन्होंने संघ बनाकर एक दूत भेज दिया !
दूतों ने मेरी बात का कोई उत्तर न देकर पत्र ही मेरे हाथों में दे दिया था ।
पत्र मैंने पढ़ा , मेरे नेत्र सजल हो गए थे , मैंने वह पत्र द्वारिकाधिश के हाथों में दे दी ।
क्रमशः …
शेष चरित्र कल
