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August 30, 2025 12:31 pm

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કેતન પટેલ પ્રમુખ ए ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસપ્રદેશ કોંગ્રેસ સમિતિ, દમણ અને દીવ દ્વારા ૨૫/૦૮/૨૦૨૫ ના રોજ પ્રફુલભાઈ પટેલને પત્ર લખ્યો છે દમણ જિલ્લાને મહાનગર પાલિકામાં અપગ્રેડ કરવાનો પ્રસ્તાવ

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श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! तब यज्ञ पूर्ण हुआ – उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 51 !!-भाग 2 : Niru Ashra

श्रीकृष्णचरितामृतम्-!! तब यज्ञ पूर्ण हुआ – उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 51 !!-भाग 2 : Niru Ashra

श्रीकृष्णचरितामृतम्

!! तब यज्ञ पूर्ण हुआ – उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 51 !!

भाग 2z

आप जैसा कहें , आप की जो आज्ञा हो वाल्मीकि वही करेगा , मर्यादा तोड़ कर बिना आज्ञा लिए वो अपनी कुटिया की और भागा था , महाराज युधिष्ठिर जानते हैं ये भावुक है , इसलिए हंसते हुए अपने महल में आगए थे ।

सुनती हो ! अरे सुनो तो !

वाल्मीकि के आनन्द का आज कोई ठिकाना नही था , वो झूम रहा था। और ऐसे झूम रहा था जैसे किसी दरिद्र व्यक्ति को सुवर्ण का कोई दबा हुआ ख़ज़ाना मिला हो ।

“श्रीकृष्ण आ रहे हैं” पत्नी का हाथ पकड़ कर नाच उठा था ये वाल्मीकि ।

क्या सच ! वो भी झूम रही थी , बालक भी माता पिता को इस तरह आनंदित देखकर प्रसन्न थे ।

श्रीकृष्ण आगए थे इन्द्रप्रस्थ , वाल्मीकि ने दूर से दर्शन किया था तब ये देह भान भी भूल गया ।

ये जब जब अवसर मिलता श्रीकृष्ण को निहार ही लेता , श्वपच था इसलिये पास में जाने को कोई देता नही और इसे जाना भी नही था ये प्रसन्न था इसी बात में कि “झाड़ू लगाकर मैं अपने आराध्य की ही तो सेवा कर रहा हूँ , हाँ , इसे क्रोध आया था , तब बहुत क्रोध आया था इसे , जब बाहर इसने सुना कि शिशुपाल भीतर सभा में उसके आराध्य को गालियाँ दे रहा है , पर श्रीकृष्ण ने उसका मस्तक धड़ से अलग कर दिया चक्र से, ये सुनकर वो बहुत प्रसन्न हुआ था , श्रीकृष्ण चंद्र जू की जय जय जय । यही बोलता रहा था ये वाल्मीकि।

भोजन हो रहा है , बाहर बैठा है वाल्मीकि , जब सब का भोजन हो जाएगा तब मैं झाड़ू लगाऊँगा और जूठन उठाकर खाऊँगा , श्रीकृष्ण का जूठन मिलेगा ? मेरे भाग्य में कहाँ ! फिर भी शायद मिल जाए , भूखा है आज वाल्मीकि , सुबह से ही भूखा है , इसकी पत्नी ने कहा भी बालभोग आया है खा लो , पर वाल्मीकि कहाँ खाता , वह तो गदगद है , बाहर बैठा है , कृष्ण , कृष्ण , कृष्ण , कृष्ण , अद्भुत वो नाम ले नही रहा उसके रोम रोम से ये नाम प्रकट हो रहा है ।

उसे श्रीकृष्ण के सिवा अब कुछ भान नही है ।


बाहर निकले श्रीकृष्ण , किसी सत्पुरुष ने भोजन नही किया है ! कौन है वो ?

अकेले ही बाहर आ गए थे श्रीकृष्ण , चारों और दृष्टि घुमाई , बाहर भीड़ लगी है भिक्षुकों की जो वो माँग रहे हैं कर्ण उनको देते जा रहा है , दूसरी और देखा श्रीकृष्ण ने , कलाकार आम प्रजा को अपनी कला दिखाकर मुग्ध कर रहे हैं , नहीं श्रीकृष्ण जिसे खोज रहे हैं वो इनमें नही हैं ।

तभी – कूड़े का ढेर है , गन्दा नाला बह रहा है बराह श्वान आदि उधर ही घूम रहे हैं , श्रीकृष्ण उधर ही गए , वाल्मीकि बैठा है , शांत भाव से बैठा है , उसके रोम रोम से इन्हीं पीताम्बर धारी का ही नाम निकल रहा है , उसे कुछ भान नही है , उसके सामने श्रीकृष्ण खड़े हैं ये भी उसे कहाँ पता !

तुरन्त लौट पड़े राजमहल की और श्रीकृष्ण ।

भीम ! बाहर जाओ , एक सत्पुरुष बैठा है भूखा है उसे जब तक भोजन नही कराओगे तब तक राजसूय यज्ञ सफल नही होगा , जाओ ! बड़ी जल्दी जल्दी ये बात बोले थे श्रीकृष्ण ।

भीम बाहर गया , इधर उधर देखा पर कोई उसे दिखाई नही दिया ….वो लौटकर आगया था ।

बाहर कोई नही है , भीम ने कहा ।

तुम्हें वो वाल्मीकि दिखाई नही दिया ? श्रीकृष्ण अब स्पष्ट बोल रहे थे ।

वो श्वपच वाल्मीकि ? भीम ने नाक भौं सिकोड़ी ।

क्यों भीम ? क्या गलत काम करता है वो , तुम लोगों की गन्दगी साफ़ करता है , गन्दे तुम हो हम हैं गन्दगी हम फैलाते हैं पर ये तो हमें स्वच्छ समाज देते हैं ,

श्रीकृष्ण बोले ! भीम , याद रखो सत्पुरुष कोई वर्ण व्यवस्था से पैदा नही होता , जिसने सत्य की आराधना शुरू कर दी है वही सत्पुरुष है , जिसके जीवन में सत् तत्व का ही एक मात्र आकर्षण है असत् के प्रति उपेक्षा है वही सत्पुरुष है , कितने भाव से ओतप्रोत है वो वाल्मीकि , जाओ , दर्शन करो उसके , तुम्हें शान्ति मिलेगी और इस राजसूय यज्ञ को सफल करना है तो उसे आदर सहित लाकर भोजन कराओ ! श्रीकृष्ण इतना कहकर मौन हो गए थे ।

भीम गए बाहर , वाल्मीकि ध्यानस्थ है , उसे उठाया भीम ने , वाल्मीकि जब उठे तब वो भीम को सामने देखकर बहुत घबड़ाए , भीम महाराज ! आपने मुझ शूद्र को छू दिया ।

भीम उसकी क्या सुनते , वो तो बस वाल्मीकि का हाथ पकड़ कर महल में ले जाने लगे ,

महाराज ! गलती हो गयी क्या ? अपराध बन गया क्या मुझ से !

वो गिड़गिड़ा रहे हैं वाल्मीकि ! उन्हें लग रहा है उनसे कोई अपराध बन गया ।

पर जैसे ही भीम ने उन्हें श्रीकृष्ण के सामने खड़ा किया , वो तो देह भान भूल गए थे , अपने सामने अपने आराध्य को पाकर उनकी तो समाधि ही लग गयी थी , श्याम सुन्दर ! आहा !

द्रोपदी ! बनाओ इनके लिय भोजन , सुस्वादु पकवान , कृष्णा ! यह प्रसन्न होंगे तभी ये राजसूय यज्ञ सफल होगा । श्रीकृष्ण ने कहा , द्रोपदी तुरन्त पाक बनाने चली गयी ।

बैठो वाल्मीकि ! भोजन करो , देह भान जब हुआ वाल्मीकि को तब श्रीकृष्ण ने वाल्मीकि को बड़े प्रेम से बैठा – भोजन करने के लिए कहा , द्रोपदी पकवान बनाकर ला चुकी थी और थाल में सजा दिया था ।

ये क्या है ? वाल्मीकि कुछ समझ नही पा रहे थे , पर सामने अपने आराध्य को पाकर वो भी सब कुछ मानने लगे थे ।

आप का प्रसाद है ? बस अपने आराध्य श्रीकृष्ण से एक बार वाल्मीकि ने पूछा था ।

हाँ ,

इतना ही कहा श्रीकृष्ण ने, वाल्मीकि तो श्रीकृष्ण का प्रसाद है सुनते ही टूट पड़े थे उस पकवान में।

तभी – शंख बजा , सब लोग आनंदित हो गए वाल्मीकि के भोजन करते ही शंख बज उठा था ।

पर – शंख एक ही बार बजा , क्यों ? भीम ने श्रीकृष्ण से पूछा ।

श्रीकृष्ण ने शंख से जाकर फिर संवाद स्थापित किया और पूछा , तुम्हें बजते रहना चाहिए था पर एक ही बार बजकर चुप क्यों हो गए ?

हे केशव ! ये प्रश्न द्रोपदी से कीजिए ! क्यों की वाल्मीकि के भोजन करने से वो प्रसन्न नही हैं ।

शंख की बात सुनकर श्रीकृष्ण द्रोपदी के पास गए वो रसोई में थी ,

क्यों द्रोपदी ! वाल्मीकि को भोजन कराने से तुम प्रसन्न नही हो ? श्रीकृष्ण ने रोष में पूछा था ।

ये वाल्मीकि भक्त है , और सच्चा सत्पुरुष एक भक्त ही होता है , क्यों की वो असत् तत्व में विभक्त नही होता इसलिए तो वो भक्त है ।

द्रोपदी ने हाथ जोड़कर कहा , हे कृष्ण ! मैं आपकी सखी हूँ और इतना तो समझती ही हूँ कि वाल्मीकि एक परमभक्त हैं , इसलिय तो मैंने इनके लिए पकवान बनाए थे , बड़े भाव से बनाए थे पर ! पर क्या ! श्रीकृष्ण ने पूछा । इन्होंने किसी पकवान का स्वाद नही लिया सबको एक साथ मिलाकर खा लिया , बस मुझे इस बात का दुःख हुआ था ।

श्रीकृष्ण द्रोपदी का हाथ पकड़ कर वाल्मीकि के सामने ले गए और बोले – वाल्मीकि ! तुमने ये क्या किया ? डर गये वाल्मीकि , क्या अपराध हुआ नाथ मुझ से ? वाल्मीकि पूछने लगे ।

इतने प्रेम से बनाया था द्रोपदी ने तुम्हारे लिए पकवान , पर तुमने सब कुछ मिला दिया ….और बिना स्वाद लिए खा गये !

श्रीकृष्ण आगे कुछ और कहते उससे पहले ही वाल्मीकि के नेत्रों से अश्रु बह चले थे – नाथ ! मैंने भोजन करने से पहले आपसे पूछा था , प्रसाद है ये ? आपने कहा – हाँ ……तो मैंने खाना शुरू किया था , प्रभु ! जब प्रसाद ही है तब अलग अलग स्वाद क्या लेना ? प्रसाद में अगर पकवान की भावना हो गयी तो अपराध हो गया ना ! मेरे लिए अगर ये पकवान है तो त्याज्य है पर अगर ये प्रसाद है तो फिर सब ही प्रसाद है , ये कहते हुए वाल्मीकि के नेत्र बरस रहे थे श्रीकृष्ण ने द्रोपदी कि और देखा तो वो वाल्मीकि के भाव से गदगद थीं

और तभी शंख बज उठा । और बजता ही रहा ………

भक्त वाल्मीकि के कारण राजसूय यज्ञ पूर्ण हुआ था आज ।

ऋषियों ने जयजयकार किया उस समय।

शेष चरित्र कल-

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