श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! “श्रीकृष्ण सुदामा मिलन”- उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 63 !!
भाग 2
कमल नयन के नयनों में अश्रु भर गए थे ये सब सुनते हुए ।
मेरा मित्र कहता है वो अपने आपको ? श्रीकृष्ण ने फिर पूछा ।
हाँ , द्वारपालों ने कहा ।
वो बात बताना ! एक द्वारपाल दूसरे से बोला ।
रहने दे , द्वारपाल ने धीरे से कहा ।
क्या बात है ! बोलो , श्रीकृष्ण उत्सुक हैं ।
वो कह रहा था कि उज्जैन में आप दोनों पढ़े हैं , और चना भी ,
हाँ , हाँ, अश्रु टपक पड़े श्रीकृष्ण के ।
और नाम अपना बता रहा है , श्री कृष्ण बोल पड़े – “सुदामा” ।
हाँ , यही नाम बताया था ।
श्रीकृष्ण दौडे , पीताम्बरधारी की पीताम्बर कहाँ गिरी उन्हें कुछ पता नही , चरणों कि पादुका कहाँ छूटी उन्हें कुछ भान नही , वो दौड़ पड़े थे , अकेले ही दौड़े थे , और केवल दौड़े ही नही थे वो पुकार भी रहे थे – सुदामा ! सुदामा ! सुदामा !
रुक्मणी कुछ समझ नही पा रहीं की ये हुआ क्या ?
बहुत देरी हो गयी , अभी तक महल से वो द्वारपाल आए नही , सुदामा बेचारे बाहर बैठ कर सोच रहे हैं !
चलो सुदामा ! एकाएक उठ गए थे सुदामा , अब कृष्ण राजा है महाराजा है , सुवर्ण नगरी का नायक है , तू क्या है ? पत्नी ने कह दिया जाओ द्वारिका तो लाठी लेकर चल पड़ा तू ।
अब चल अपने गाँव ! सुदामा ने हाथ जोड़े वहीं से और उठकर चल दिए ।
तभी – आगे से चार सैनिक दौड़ते हुए आए , सुदामा ने उनको देखा तो सुदामा को लगा उनको पकड़ने आरहे हैं , सुदामा भागे ,
पर कुछ कदम आगे जाकर वो रुक गए , रुकना पड़ गया , इतने दुर्बल देह से वो सैनिकों से आगे तो दौड़ नही सकते थे ।
पर ये क्या सैनिक सुदामा को पकड़ने नही भागे थे , महल की ओर दौड़े थे ।
सुदामा ने महल की ओर मुड़कर देखा तो उनके कदम ठिठक गए –
आहा ! वो श्यामसुन्दर दौडा आ रहा था सुदामा की ओर , समुद्र की हवा के कारण उसके घुंघराले केश बिखर गए थे , वो अपनी आजानुभुजा फैलाए और “सुदामा सुदामा”कहते हुए ………
ये क्या ! मेरा कृष्ण ! सुदामा ने अपनी लाठी छोड़ दी और वो भी अपने सखा की और दौड़ रहे थे ।
सुदामा !
पास में पहुँचते ही श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने बाहों में भर लिया था , सुदामा आनंदित होकर अपने सखा नीलमणि के हृदय से लग गए थे , श्रीकृष्ण के हृदय में जो आनन्द की धारा बह चली थी वो धारा बहा कर ले जाने के लिए उतावली हो उठी थी दोनों ही मित्रों को । सुदामा ! सुदामा को तो अब कुछ नही चाहिए था , उसके जीवन की साध आज पूरी हो गयी थी , दोनों मित्र अतिआनन्द के कारण अपने अपने नयनों से नीर बहा रहे थे ।
पूरी द्वारिका आज देख रही थी , की ये कौन भाग्यशाली ब्राह्मण है जिसे श्रीकृष्ण अपने बाहों में भर कर आलिंगन दे रहे हैं । किन्तु कोई श्रीकृष्ण से तो पूछे कि भाग्यशाली कौन ? तो श्रीकृष्ण का यही उत्तर होगा – “कृष्ण” । सुदामा जैसा मित्र मिलना ये कृष्ण का भी तो परम सौभाग्य है ।
रुक्मिणी के पास अन्य रानियाँ आयीं ।
महारानी ! सुना , बाहर भीड़ इकट्ठी हो गयी है , श्रीकृष्ण किसी को गले लगाकर भावुक हुए जा रहे हैं !
हाँ , ऐसे दौड़े थे यहाँ से , मैं भी सोच रही थी कौन होगा , जिसके लिए पादुका और अपना उत्तरीय तक भूल गए ।
अट्टालिका में चली गयीं थीं रानियाँ , और वहाँ से जो दृश्य देखा उन लोगों ने ….ओह !
वो दुर्बल ब्राह्मण , फटी बिवाइयाँ , एक धोती तन में बस , उसे द्वारिकाधीश अपने हृदय से लगाए हुए थे ।
ये महाभाग कौन है ? लक्ष्मी स्वरूपा रुक्मणी विचार करती हैं ।
क्या तप किया होगा इस ब्राह्मण ने , सत्यभामा सोच रही हैं ।
हमारे नाथ ने उसे अपने आलिंगन में बांध लिया है , धन्य है धन्य है , कालिन्दी महारानी बोल उठती हैं ।
श्रीकृष्ण सुदामा जब मिले और तब इस दृश्य को द्वारिकावासियों ने जब देखा , तो वो भी जड़वत हो गए थे, उनका मन बचा ही नही था , उनकी बुद्धि कुछ सोचने की स्थिति में ही नही थी , “मैं” भाव समाप्त हो उठा था । यानी इस श्रीकृष्ण सुदामा के मिलन का जिसने भी दर्शन किया वो प्रेम की समाधि में ही चला गया था ।
शेष चरित्र कल –


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