श्रीकृष्णचरितामृतम
!! “देखि सुदामा की दीन दशा”- उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 64 !!
भाग 1
वो कमल की सुगन्ध , मलयागिरी चन्दन की सुगन्ध , कुछ कुछ हिरण की नाभि से फूटी कस्तूरी,
हाँ, वही सुगन्ध तो श्रीकृष्ण के अंग से आरही थी सुदामा को , फिर जिस अंग से लिपटे हुए थे सुदामा वो श्रीअंग तो माखन में मानों नीला रंग मिला दिया हो , ऐसा दिव्य और इतना सुकोमल !
सुदामा देहातीत हो उठे थे ।
होंगे नही ! वो श्रीअंग की दिव्य सुगन्ध , फिर माखन सी कोमलता , माखन से भी कोमल हैं मेरे मित्र के अंग तो , और मेरा देह ! ऐसी भावना हृदय में आते ही एकाएक दूर हट गए थे सुदामा श्रीकृष्ण से ।
मेरी हड्डियाँ , मेरा ये लकड़ी का सा कठोर देह , और मेरे सखा का श्रीअंग ! ये विचार मन में आते ही दूर हट गए थे सुदामा ।
क्या हुआ ? श्रीकृष्ण अपने बाहों को फैलाए अपने सखा से पूछ रहे हैं ?
पर सुदामा कुछ नही बोले , इन्हें लगता है मेरा मित्र सब जानता है फिर कहना क्या !
ओह ! क्षमा करना मित्र ! मेरा देह भारी है और तुम्हारा कृश , तुम्हें कष्ट हुआ होगा । ये कहते हुए अब श्रीकृष्ण ने भी अपनी भुजाएँ नीचे कर लीं थीं ।
अद्भुत भाव है इन दो मित्रों का , आहा ! समस्त सैनिक , द्वारिका के नागरिक जो जो इस दृश्य को देख रहे हैं वो सब कुछ भूल गए हैं , इन दोनों की मैत्री का दर्शन करके सबको रोमांच हो रहा है ।
अब मैं चलूँ ? कुछ देर बाद सुदामा अपने लाठी को उठाते हुए बोले ।
हाँ , अपने प्रेमाश्रु पोंछते हुए श्रीकृष्ण भी बोल उठे थे ।
सुदामा तो मुड़े और वापस जाने लगे ।
सुदामा ! श्रीकृष्ण थोड़ी तेज आवाज में बोले थे , तो सुदामा डर गए , बोले – क्या है ?
कहाँ जा रहे हो यार ! पूर्ण आत्मीयता से श्रीकृष्ण ने पूछा ।
अपने गाँव , अब मिल लिया ना तुझ से, हो गया, अब जाने दे मुझे ।
सुदामा इतना कहकर फिर जाने लगे ।
श्रीकृष्ण ने आगे बढ़कर सुदामा का हाथ पकड़ा और बोले – महल में नही चलोगे ?
सुदामा ने देखा श्रीकृष्ण के मुख की ओर फिर महल को देखा , बोले – मिल लिया ना तुझसे , तुझे देखना था , वर्षों की बात हो गयी थी ना ! हम छोटे छोटे से थे ……सुदामा के नेत्र फिर बह चले ।
ये बातें हम महल में बैठकर भी कर सकते हैं ना ! मित्र ! चलो महल में । श्रीकृष्ण फिर बोले ।
सुदामा खड़े रहे , महल को और अपने इस प्यारे से सखा को देखते रहे ।
फिर बोले – तेरा मित्र बहुत गरीब है , कृष्ण ! इतने बड़े महल में जाने का ये अधिकारी भी नही है , इसलिए मुझे छोड़ दे , मेरी कामना पूरी हो गयी है, तुझे देख लिया अब कुछ नही चाहिए इस सुदामा को ……सुदामा रो पड़े । कृष्ण ! ये आनन्द के अश्रु हैं , अश्रुओं को पोंछ रहे हैं सुदामा।
“मुझे बुरा लगेगा” – श्रीकृष्ण इतना बोलकर सुदामा से मुँह फेर लेते हैं ।
नही , सखा ! ऐसे नही बोलते , दुनिया को बुरा लगे सुदामा की बला से । पर मेरे कृष्ण को बुरा नही लगना चाहिए , तेरे बिना कौन है मेरा कृष्ण ! तू स्वयं ही सोच !
“तो चलो मेरे महल में” …….. श्रीकृष्ण ने फिर सुदामा का हाथ पकड़ा और अपने सखा को लेकर चल दिए थे महल की ओर , सुदामा गदगद हैं , उनके आनन्द का आज ठिकाना नही है ।
क्रमशः …
शेष चरित्र कल-


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