श्रीकृष्णचरितामृतम
!! “देखि सुदामा की दीन दशा”- उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 64 !!
भाग 2
नही , सखा ! ऐसे नही बोलते , दुनिया को बुरा लगे सुदामा की बला से । पर मेरे कृष्ण को बुरा नही लगना चाहिए , तेरे बिना कौन है मेरा कृष्ण ! तू स्वयं ही सोच !
“तो चलो मेरे महल में” …….. श्रीकृष्ण ने फिर सुदामा का हाथ पकड़ा और अपने सखा को लेकर चल दिए थे महल की ओर , सुदामा गदगद हैं , उनके आनन्द का आज ठिकाना नही है ।
मणि माणिक्य खचे हुए हैं महल के स्तम्भों में , नीलमणी, पीतमणि इनको मध्य मध्य में इस तरह लगाया गया है , जैसे लगे कि नभ में तारे चमक रहे हैं । द्वार हैं तो काष्ठ के , पर उनमें पत्र चढ़ाया है सुवर्ण का , फिर उनमें जड़े भी थे तो मोती और हीरे ।
झालर लगा था हीरों का , अवनी को देखते हैं सुदामा तो उन्हें अपना मुख दिखाई देता है , दर्पण की तरह है महल की अवनी , हीरों के चूर्ण से अवनी बनाई है विश्वकर्मा के कलाकारों ने ।
सुदामा ने इधर उधर देखा , रानियाँ उतर रही हैं अट्टालिका से , वो रानियाँ ! सुदामा देखते हैं ,
“ये भाभी होगी”। सुदामा रुक्मणी को देखकर सोचते हैं ।
यहाँ बैठो मित्र ! श्रीकृष्ण अपने सिंहासन में सुदामा को बिठा रहे हैं ।
सिंहासन है ये तो , सुदामा कहते हैं ।
तो क्या हुआ सुदामा ! तुम बैठो, श्रीकृष्ण ने कहा और सुदामा को न मानते हुये भी बैठा दिया ।
और स्वयं चरणों में बैठ गए श्रीकृष्ण । अरे ये क्या कर रहे हो ? यहाँ बैठो , अपने साथ बिठाना चाहा सुदामा ने , पर , नही मित्र ! मुझे इन चरणों में ही रहने दो , श्रीकृष्ण ने सुदामा के चरण पकड़ लिए थे । रुक्मणी ! थाल और जल की झारी तो लाओ, रुक्मणी थाल लेकर आयीं झारी भी ।
दीनबन्धु ने सुदामा के चरणों को छुआ , और जब ध्यान से देखा तो रो पड़े थे ।
ये क्या दशा है मित्र ? काँटे गढ़े हुए हैं पाँवों में , काँटों के कारण वो पाँव छिल गए हैं , उनमें से रक्त बह रहा है , और वो फटी बिवाइयाँ ! उफ़ ! रुक्मणी ने झारी से जल डाला श्रीकृष्ण के कोमल कर में सुदामा के चरण हैं , वो जैसे ही मलने लगे , ओह , मेरे कारण ! इन चरणों की ये दशा हुई हैं , मेरे लिए इस सखा ने देह को भी सुखा दिया ।
रुक्मणी स्तब्ध हो गयीं थीं अपने पति की ये दशा देखकर , वो हिलकियों से रो रहे थे ।
और जल डालना तो भूल ही गयी थी रुक्मणी इन मित्रों के भाव में ये भी डूबी जा रही थीं।
चरण धो दिए श्रीकृष्ण ने सुदामा के , पर जल से नही , अपने अश्रु जल से ।
फिर मित्र के चरणोदक को अपने माथे से लगाया था श्रीकृष्ण ने , और अपने महल में भी छिड़काया था ।
शेष चरित्र कल-


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