श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! “श्रीकृष्ण सुदामा का हास परिहास” – उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 65!!
भाग 1
ये भाभी हैं ?
अब कुछ सहज हो गए हैं सुदामा महल में , श्रीकृष्ण को अच्छा लग रहा है । सुदामा अभी तक संकोच में ही थे , पर जब श्रीकृष्ण ने हंसते हुये सुदामा से कहा , अपनी भाभी से परिचय नही
करोगे , तब सुदामा कुछ सहज हुए थे । रुक्मणी की ओर देखते हुए सुदामा ने पूछा था ।
ये भाभी हैं ?
श्रीकृष्ण हंसे , तो रुक्मणी भी हंसी, अन्य रानियाँ थीं वो भी हंसीं , सुदामा बेचारे समझ नही पा रहे कि ये हंस क्यों रहे हैं ! फिर भी सुदामा सबका साथ देते हुए हंसे ।
चलो आओ अब , अपना परिचय देते हुए मेरे मित्र से आशीर्वाद प्राप्त करो , श्रीकृष्ण वहाँ खड़ी रानियों को आदेशात्मक भाव से बोले थे ।
देखते देखते ही लम्बी कतार लग गयी , सुदामा के कुछ समझ में नही आया ।
मैं श्रीद्वारिकानाथ की प्रथम धर्मपत्नी , नाम मेरा रुक्मणी देवी है आपके चरणों में मेरा प्रणाम !
सुदामा प्रसन्न हुये और अपने सखा की ओर देखा , श्रीकृष्ण भी मुस्कुराए ,
सुदामा ने अपने दोनों हाथों को उठाकर आशीर्वाद दिया – सौभाग्यवती भवः !
रुक्मणी गयीं , सुदामा श्रीकृष्ण के कान में पूछते हैं , कहाँ से विवाह किया ?
किससे ? श्रीकृष्ण हंसते हुए सुदामा से प्रतिप्रश्न करते हैं । सुदामा कुछ समझ पाते कि उससे पहले ही –
मैं द्वारिकानाथ की द्वितीय धर्मपत्नी , नाम मेरा जाम्बवती है आपके चरणों में मेरा प्रणाम है ।
सुदामा चौंक जाते हैं , अच्छा दो विवाह किया है मेरे सखा ने , हंसते हैं कोई बात नही ।
सुदामा दोनों हाथों को उठाकर आशीर्वाद देते हैं – सौभाग्यवती भवः ।
सुदामा श्रीकृष्ण से झुककर कुछ पूछने ही वाले थे कि – मैं द्वारिकानाथ की तृतीय धर्मपत्नी सत्यभामा , आपको प्रणाम करती हूँ ।
सौभाग्यवती भवः । दोनों हाथ उठाकर आशीष दे दिया था । पर फिर सोचने लगे तीन विवाह ?
मैं द्वारिकानाथ की चतुर्थ धर्मपत्नी कालिन्दी , सुदामा ने श्रीकृष्ण की ओर देखा , तो श्रीकृष्ण मुस्कुराकर इतना ही बोले – आशीर्वाद दो मित्र ! सौभाग्यवती भवः । सुदामा ने इस बार एक ही हाथ से आशीर्वाद दिया था , क्यों हाथ दूखने जो लगे थे ।
सुदामा के पास अब सोचने के लिए भी समय नही हैं , आशीर्वाद एक को देकर पूरा होता नही है कि तुरन्त –
मैं द्वारिकानाथ की आठवीं धर्मपत्नी हूँ , अब तो सुदामा का एक हाथ भी नही उठ रहा , कैसे उठे ! दुर्बल देह , कई दिनों से कुछ खाया पिया भी नही है , फिर कितना चल कर आए हैं इस द्वारिका में , पर बड़ा विचित्र है ये कृष्ण , आते ही बैठा दिया आशीर्वाद देने के लिए । फिर ये तो बढ़ती ही जा रही हैं , सुदामा सिंहासन से उचकते हैं…….मित्र ! सब ठीक है ना ? श्रीकृष्ण पूछ रहे हैं । हाँ , हाँ हाँ सब ठीक है ।
मैं द्वारिकानाथ की पचासवीं धर्मपत्नी , सुदामा बोलते हैं – भवः !
मैं द्वारिकानाथ की इक्यावनवी धर्मपत्नी , सुदामा अब इतना थक गए हैं की “सौभाग्यवती भवः” भी पूरा नही बोला जा रहा । बस अब तो भवः , भवः ही कहते हैं ।
मैं द्वारिकानाथ की पाँचसौवीं धर्मपत्नी , सुदामा के पसीने आ गए हैं । उन्हें अब घबराहट होने लगी है ।
अब तो बस श्रीकृष्ण पत्नियाँ अपना परिचय दे रही हैं , सुदामा सुन रहे हैं बस , कोई आशीर्वाद नही , पंक्ति खतम होने का नाम ही नही ले रही । आती जा रही हैं श्रीकृष्णपत्नियाँ, बस आती ही जा रही हैं ।
अब तो सुदामा से रहा नही गया , श्रीकृष्ण को इशारे से कहा इधर आ , श्रीकृष्ण ने भी हंसते हुए इशारे से ही कहा आशीर्वाद दो ।
थक गया हूँ यार ! श्रीकृष्ण से सुदामा ने ये बात भी इशारे में ही बोली थी ।
श्रीकृष्ण सुदामा के निकट आए ।
कान ला ! सुदामा ने कहा । श्रीकृष्ण ने अपने कान सुदामा के निकट किया ।
अभी और कितनी लम्बी कतार है ? सुदामा धीरे से बोले ।
श्रीकृष्ण खूब हंसे , अभी तो एक सहस्र ही हुये हैं सुदामा ।
“सब अपनी हैं” सुदामा धीरे से फिर पूछते हैं ।
और क्या सुदामा ! श्रीकृष्ण गम्भीर होने का स्वाँग करते हुए बोले ।
क्रमशः …
शेष चरित्र कल-


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