श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! “मिलेंगी वृषभान नन्दिनी” – उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 72 !!
भाग 1
माता ! रोहिणी माता , द्वार खोलो ………..
कौन ? रोहिणी भी अभी उठी ही थीं ……स्नान भी नही किया था उन्होंने ।
अभी ब्रह्ममुहूर्त भी तो नही हुआ था ….पर इतनी सुबह , कौन आया ।
आवाज मधुर थी , सुनी और पहचानी आवाज लगी रोहिणी माता को ……
कौन ….पूछते हुए अपने महल का द्वार खोला तो ……
कन्हैया !
इस नाम का सम्बोधन आज भी रोहिणी माता ही करती हैं , द्वारिका में श्रीकृष्ण को ये सम्बोधन अपने लिए कभी सुनना हो तो माता रोहिणी के पास ही ये आते हैं ….पर वर्षों के बाद श्रीकृष्ण महल में आए हैं आज रोहिणी माता के ।
आओ …. ! पर अभी तो रात्रि ही है …..रोहिणी माता श्रीकृष्ण को अपने महल में बिठाती हैं ……कृष्ण ! सब ठीक है ना !
पर श्रीकृष्ण इसका कोई उत्तर नही देते , वो रात भर सोए भी नही हैं उनके नयन बता रहे हैं ।
“माता ! आपने पत्र भेज दिया वृन्दावन”….श्रीकृष्ण पूछते हैं ……हाँ और उन दूतों ने आकर सूचना दी है मुझे कि कुरुक्षेत्र में सब बृजवासी आ रहे हैं ।
रोमांच हो गया था श्रीकृष्ण को माता रोहिणी के मुख से ये सुनते ही ।
कृष्ण ! …..माता ! कन्हैया कहो ना , कृष्ण मत कहो , मैं आपके मुख से वही सुनने तो आता हूँ ।
अच्छा , कन्हैया ! रोहिणी माता सिर में हाथ रखती हुई बोलीं ।
एक बात बता , तू हस्तिनापुर जाता रहता है , इन्द्रप्रस्थ तो और निकट है वृन्दावन के …लाला ! वहाँ क्यो नही जाता ….वो लोग पल पल तेरी याद में तड़फते रहते हैं ….क्यो नही जाता ?
माता ! हिलकियों से रो पड़े थे श्रीकृष्ण , कुछ देर तो वो बोल भी न सके , वाणी उनकी अवरुद्ध सी हो गयी थी ।
“कन्हैया वृन्दावन गया तो क्या वो वापस द्वारिका आसकेगा माता”…..श्रीकृष्ण कुछ देर में इतना ही बोले थे ।
माता ! मेरी मैया यशोदा आएगी ना कुरुक्षेत्र में ? कैसी हो गयी होगी वो ! सौ वर्ष का काल कम तो नही होता ……”तुझे देखनें के लिए जीजी अपने प्राणों को संजोकर रखी हैं” रोहिणी माता ने गम्भीर होकर कहा । माता ! उसके हाथों का माखन , उसके हाथों की …..”मार”? रोहिणी माता पूछती हैं । आँसू के साथ हंसी – हाँ माता , मारती भी थी वो मैया मुझे , ये देख ना ! रस्सी से बांध दिया था एक दिन , ये देख माता , मैं नित्य उठकर इन हाथों को देखता हूँ , चूमता हूँ , वो पगली मैया कह रही थी, भूल जाना कन्हैया कि कभी मैंने तुझे रस्सी से बांधा था ….माता रोहिणी ! आप बताओ , भला उस वात्सल्य रस की साकार मूर्ति मैया की उन स्नेह पूर्ण क्रियाओं को मैं भूल सकता हूँ ।
श्रीकृष्ण रोते रहे ….माता रोहिणी भी सुबकती रही थीं ।
मेरे बाबा नन्द , श्रीकृष्ण पूछते हैं बाबा आरहे हैं ना , कुरुक्षेत्र ?
रोहिणी माता हाँ में सिर हिलाती हैं , वो भी बोल नही पा रहीं ।
मेरे बाबा …..वो तो रो भी नही सकते , मैया तो रोकर अपने आपको हल्का कर लेगी , पर मेरे बाबा तो अपने आँसुओं को पी पी कर जी रहे हैं । कुरुक्षेत्र में उनके श्रीचरणों को अपने अश्रुओं से धोएगा उनका ये कन्हैया । श्रीकृष्ण अपने बाबा को याद करते हैं ।
माता ! वो मनसुख ….. श्रीकृष्ण कैसे इस नाम को लेते ही चहक उठे थे ।
मेरा सखा मनसुख , पता नही कैसे रहता होगा मेरे बिना …..हर समय मेरे साथ ही रहता था , मेरा ध्यान रखता था , गैया चराने हम लोग जाते थे , खेलते थे , जब वो देखता था उसका कन्हैया थक गया है ….तो वो मुझे लेकर चला जाता …मुझे अपनी गोद में सुलाता ,और केले के पत्तों से पंखा करता रहता , माता रोहिणी ! किसी में हिम्मत थी जो उस समय आकर मेरी नींद में विघ्न डाल दे ।
कितने चहकते हुए श्रीकृष्ण आज रोहिणी माता को वृन्दावन की बातें बता रहे थे ।
मनसुख आएगा ना कुरुक्षेत्र ?
हाँ , उसी ने ज़िद्द की है बाबा ब्रजराज से , पता है कन्हैया यहाँ से जो पत्र मैं भेजती हूँ ना , उसे मनसुख ही पढ़ता है , जीजी पत्र उसी से पढ़वाती हैं । रोहिणी माता गदगद हो कर बता रही हैं ।
क्रमशः ….
शेष चरित्र कल –


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