श्रीकृष्णचरितामृतम्
!! “मिथिला में दिव्य प्रेमदर्शन” – उत्तरश्रीकृष्णचरितामृतम् 78 !!
भाग 2
चारों और सुन्दर सुन्दर फूल खिले हैं …….उनमें भौंरों का झुण्ड गुनगुन कर रहा है ।
चाँदनी रात है ..चाँदनी, उस वन में छिटक रही है ..जिससे वन की शोभा और सुन्दरतम हो गयी है ।
दूधमती का जल दूध के समान बह रहा है…हवा शीतल चल रही है ..उस हवा में एक मादकता है ।
“दिव्य और अद्भुत” ……..ऋषि घोर आंगिरस बोले थे ।
हाँ , तो तुम ये मानते हो कि प्रेम ही सर्वोच्च सत्ता है ? ऋषि ने फिर वही बात छेड़ी ।
ऋषि ! मेरे मानने न मानने का प्रश्न नही है ….आप स्वयं ही देखिए प्रेम सर्वोच्च सत्ता है कि नही ।
श्रीकृष्ण अब खुलकर बोलने लगे थे ।
तो क्या ज्ञान से भी बड़ी सत्ता है प्रेम ? ऋषि रुककर पूछने लगे ।
श्रीकृष्ण की ओर देखकर राजा बहुलाश्व हाथ जोड रहे थे , क्यों की श्रीकृष्ण का मुखमंडल दिव्य कान्ति से भर गया था ।
ज्ञान , प्रेम के आगे कुछ नही है ऋषि !
तो प्रमाण दो ……ऋषि ने इतना ही कहा था कि श्रीकृष्ण मुस्कुराए , आपको दर्शन ही करा देता हूँ …..कीजिए दर्शन ऋषि …………..
इधर उधर देखा ऋषि ने पर श्रीकृष्ण वहाँ पर नही थे ………
राजा बहुलाश्व ने भी इधर उधर देखा पर उन्हें भी भगवान श्रीकृष्ण दिखाई नही दिए ।
वो छलिया है राजन ! फिर छल कर गया …….ऋषि हंसे ही थे कि …….
सामने से प्रकाश फैल रहा है …ऋषि और राजा ने देखा ।
ये क्या है ………एक साथ सहस्र भानु उदित हो गए हों येसा लगा ।
पर ताप नही है इस प्रकाश में ….शीतलता है ……घोरआंगिरस तेज चाल से चलते हुए पहुँचे उस प्रकाश के पास राजा भी पीछे ही थे कि ………….
सुन्दर अश्व है …..कामदेव ही अश्व बन गया है आज ।
उसमें सुन्दर नीलमणि श्रीराम दूल्हा बनकर विराजमान हैं ……सेहरा सजा है उनके सिर में…..मोतियों की लड़ी और अद्भुत लग रही है , उनके अधर लाली लिए हुए हैं ….वो बीच बीच में मन्द मन्द मुस्कुराते भी जा रहे हैं …..देव, नर नाग इनकी कौन कहे …ब्रह्मा रूद्र तक मोहित हो रहे थे …वर सुन्दर ही इतना था ……ऋषि अपलक देखते ही रह गए थे …..आहा ! इससे सुन्दर और कौन !
तभी दृश्य बदल गया …..सुन्दर मण्डप है …मण्डप मणि माणिक्य के हैं ….
उस मण्डप पर विराजमान हैं …..श्रीराम …जो दूल्हा बनकर बैठे हैं ।
“सीता” ….ऋषि , दुल्हन बनीं सिया जू को देखते हैं ।
ये तो ……चौंक जाते हैं ऋषि ….ये तो ब्रह्म का जो आल्हाद है …वही हैं ।
ऋषि कुछ समझ नहीं पा रहे …..पर जितना भी समझे वह पर्याप्त था ।
शहनाई बज रही थी ….देव नभ से सुमन बरसा रहे थे …सुन्दर सुन्दर सजी मिथिला की सखियाँ गीत गा रही थीं ….जयजयकार सब लोग बोल रहे थे ।
ऋषि घोर आंगिरस के नेत्रों से आनन्द के अश्रु गिरने लगे …….
राम ब्रह्म हैं ….और सीता उनका आल्हद हैं …..
राम ज्ञान हैं ….तो सीता प्रेम हैं ……..ज्ञान अधूरा है बिना प्रेम के ……….
फेरे शुरू हो गए थे उस विवाह मण्डप में ….सीता राम दोनों युगल फेरे ले रहे थे ।
पर धीरे धीरे ज्ञान पर प्रेम का रंग चढ़ गया था ……प्रेम रूपी सीता ही राम को भी अपने रंग में रंगने के लिए जब आतुर हो उठीं …….तब ।
प्रेम …प्रेम….प्रेम……घोरआंगिरस पुकार उठे ….राजा बहुलाश्व भाव में डूब गए थे ।
तभी ……श्रीकृष्ण प्रकट हो गए ……….
घोरआंगिरस अब कहाँ तपस्वी थे ……उनको श्रीकृष्ण ने प्रेम रंग में रंग दिया था ।
राजा बहुलाश्व भी बोल उठे ….हे नाथ ! आपने मुझे प्रेम का दर्शन कराकर धन्य कर दिया ।
ऋषि घोरआंगिरस अब हज़ारों वर्ष तक के लिए प्रेम समाधि में जा चुके थे ।
शेष चरित्र कल


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